गद्य- प्रियतम ©रानी श्री
नमन, माँ शारदे नमन लेखनी प्रियतम, हम तो इस संसार में नहीं हैं किंतु कण-कण में बसा हमारा अमरप्रेम आज भी यहां गुंजायमान है। स्मरण में है क्या, जिस क्षण हमारा प्रथम मिलन हुआ था व जिस क्षण आप पर दृष्टि पड़ते ही मेरी सृष्टि में प्रेम तरंग की वृष्टि हुई थी। कितना असीम अनुभवपूर्ण क्षण था, जब आपके पग मेरी ओर बढ़े थे। मेरे आंतरिक व बाह्य तंत्र व तंत्रिकाएं तो शिथिल पड़ गये। किंचित ही संभव हो जब एक मनुष्य मेरे इतने निकट आया और मेरा हृदय स्पंदन तीव्रतम सीमा पर जा पहुंचा, इश्वर जाने मैं क्यों थर्रा उठी और स्वेद पूर्ण हो गयी। दर्शित नहीं हुआ होगा किंतु मेरी दशा केवल मुझे ज्ञात है। मस्तिष्क शून्य हो कर भी कोलाहल से पूर्ण था। प्रथम दृष्टि का अनुराग संभवतः इसी प्रकार को होता होगा। नवयौवन की सरिता के तट पर खड़े आप, अपने श्याम व मनमोहक वर्ण, मखमल कपोल, तिस पर चंचल चतुर तीक्ष्ण नयनों से जब मेरी ओर सम्मुख हुए, अंबर की समस्त तड़ितों ने हृदय पर त्वरित कड़े आघात कर दिए। निस्संदेह प्रतीत नहीं हुआ किंतु जो व्यतीत हुआ वही तो जीवन गीत हुआ। आपके पंकज समान ओष्ठ से बाहर निकली माधुर्य से लथपथ वो कर्णप्रिय लावण्...