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गद्य- प्रियतम ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी  प्रियतम, हम तो इस संसार में नहीं हैं किंतु कण-कण में बसा हमारा अमरप्रेम आज भी यहां गुंजायमान है। स्मरण में है क्या, जिस क्षण हमारा प्रथम मिलन हुआ था व जिस क्षण आप पर दृष्टि पड़ते ही मेरी सृष्टि में प्रेम तरंग की वृष्टि हुई थी। कितना असीम अनुभवपूर्ण क्षण था, जब आपके पग मेरी ओर बढ़े थे। मेरे आंतरिक व बाह्य तंत्र व तंत्रिकाएं तो शिथिल पड़ गये। किंचित ही संभव हो जब एक मनुष्य मेरे इतने निकट आया और मेरा हृदय स्पंदन तीव्रतम सीमा पर जा पहुंचा, इश्वर जाने मैं क्यों थर्रा उठी और स्वेद पूर्ण हो गयी। दर्शित नहीं हुआ होगा किंतु मेरी दशा केवल मुझे ज्ञात है। मस्तिष्क शून्य हो कर भी कोलाहल से पूर्ण था। प्रथम दृष्टि का अनुराग संभवतः इसी प्रकार को होता होगा। नवयौवन की सरिता के तट पर खड़े आप, अपने श्याम व मनमोहक वर्ण, मखमल कपोल, तिस पर चंचल चतुर तीक्ष्ण नयनों से जब मेरी ओर सम्मुख हुए, अंबर की समस्त तड़ितों ने हृदय पर त्वरित कड़े आघात कर दिए। निस्संदेह प्रतीत नहीं हुआ किंतु जो व्यतीत हुआ वही तो जीवन गीत हुआ। आपके पंकज समान ओष्ठ से बाहर निकली माधुर्य से लथपथ वो कर्णप्रिय लावण्...

ग़ज़ल ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी अनोखे शौक़ हैं जो भी जँचा वो चाहिए उनको, हमें तो नाम तक मालूम ना जो चाहिये उनको। न ऐसी चीज़ की ख़्वाहिश सजा कर जो सज़ा दे दे  अजी जो ठान लेते हैं ,मज़ा सो चाहिए उनको। जिन्हे मालूम ही ना हो के मेहनत चीज़ ही क्या है , ज़रा पैसे उड़ाने का सुकूं तो चाहिए उनको । ज़माना नाचता फिरता रहे जिनके  इशारों पर , रिवायत या रियायत ,ज़िद्द कह लो चाहिए उनको । यहां शेरों पे तारीफ़ें नहीं मिलती हमें रानी, वहां तारीफ़ सारी एक ही को चाहिए उनको ।  ©रानी_श्री

गीत- मधुमास ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी आधार छंद- विजात (मात्रिक) चार चरण, प्रति चरण 14 मात्रा,  दो-दो चरण समतुकांत, पहली व आठवीं मात्रा लघु अनिवार्य। मिलन को मान भी जाओ, तनिक मिलने चले आओ।  मचलते हम बजे सरगम, सजा मधुमास का मौसम।। करोगे आज आलिंगन, यही विश्वास है साजन। हृदय में चित्र अंकित है, तुम्हारा प्रेम संचित है। हृदय का आज हो संगम, सजा मधुमास का मौसम।। खुशी से झूमता तन-मन, सुनहरा प्रेम मनभावन।  गगन में चांद तारे हैं, लगे जैसे हमारे हैं। नयन कर चार लो प्रियतम, सजा मधुमास का मौसम।। ©रानी श्री

गीत- श्रीकृष्ण ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  सदा मटकी फोड़ जाए, वस्त्र ग्वालिन के चुराए, गोपियों के संग कान्हा, रास कैसा यह रचाए। रास रचते हैं लुभावन। आ गए हैं देखो मोहन। पंख मस्तक पर लगाए, बाँसुरी सुंदर बजाए, बैठ यमुना के किनारे, श्यामसुंदर मुस्कुराए। हो रही है मधुर गुंजन, आ गए हैं देखो मोहन छुपके-से माखन को खाए, माँ यशोदा को सताए, हैं सभी लीलाएँ नटखट, तभी लीलाधर कहाए। संग ले मासूम बचपन, आ गए देखो हैं मोहन। कंस का वह काल लाए, तर्जनी पर गिरि उठाए, दीनबंधु बने हैं कान्हा, भक्त को दुख से बचाए। बने रक्षक नंदनंदन, आ गए हैं देखो मोहन। आस्था हिय में जगाए, मुख में रखते जग समाए, अति ललित मुस्कान धरकर, राधिका जी संग आए। है प्रफुल्लित देख यह मन, आ गए हैं देखो मोहन। ©रानी श्री

ग़ज़ल ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  बहर - 1222 1222 1222 1222 कहीं पर अर्ज हो जाए,ग़ज़ल की शाम क्या कीजे। मुहब्बत कर्ज हो जाए, तुम्हारे नाम क्या कीजे। कभी इतनी वफा भी मत निभाना जान ले ले जो, मुकदमा दर्ज हो जाए, लगे इल्ज़ाम क्या कीजे। कि जिसपर जान से ज़्यादा भरोसा कर लिया हमने, वही खुदगर्ज हो जाए, मिले अंजाम क्या कीजे। गजल गर चांद पर या रात पर हो इक नशीली सी, बहकता तर्ज हो जाए, छलकता जाम क्या कीजे। छिपाते रह रहे ख़ुद को कि ज़िम्मेदार बनने से, निभाना फर्ज हो जाए, तो दूजा काम क्या कीजे। दुआ में घोलकर सारा ज़हर हमको दगा मत दो, दवा ही मर्ज हो जाए, कहीं आराम क्या कीजे। लिखे थे प्यार के वो ख़त,कभी जो प्यार से 'रानी', अगर वो हर्ज हो जाए, लिखा पैगाम क्या कीजे। ©रानी श्री 

ग़ज़ल ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे  नमन लेखनी 2122 2122 212  ज़िंदगी का इक मज़ा दे दे मुझे, गर गलत हूँ तो सज़ा दे दे  मुझे। नज़्म कुछ लिख दूं तुम्हारे नाम के, लिखने की थोड़ी रज़ा दे दे मुझे। मेरे हिस्से ज़िंदगी गर हो नहीं, कत्ल कर मेरी कज़ा दे दे मुझे। पेश करती हूँ लिखे कुछ शेर मैं  तू ज़रा बस हब्बज़ा दे दे मुझे। तोड़ कर ख़ामोशियां कुछ बोल दे, कह रही मैं, तू जज़ा दे दे मुझे। है ज़रा से हौंसले मुझमें अभी, हिज़्र में कोई अज़ा दे दे मुझे। जोश में चिंगार है कि अब जले, तू कहीं से भी फ़ज़ा दे दे मुझे। इश्क़ का दे इल्म रानी जो तुझे  मुकतज़ा वो मुर्तज़ा दे दे मुझे। ©रानी श्री

गीत ©रानी श्री

  मैं कहीं पर भी जाऊँ,  ख़ुद में ही तुझको पाऊँ। तुझे ख़्वाबों में बसा कर, तुझमें फना हो जाऊँ। ये लबों की मुस्कराहट, मेरी जां निकालती हैं । के वफ़ा की ये अदाएं, मुझको संभालती हैं। तू जो सामने खड़ा है,  मेरे होश मैं गवाऊँ। तुझे ख़्वाबों में बसा कर,  तुझमें फना हो जाऊँ। है सहर सा मेरे दिल के,  शब स्याह का सनम तू। मेरे साथ जीने मरने, की जो ले ले ये कसम तू। तुझे पलकों पे सजाऊँ,  तुझे रूह में बसाऊँ। तुझे ख़्वाबों में बसा कर , तुझमें फना हो जाऊँ। ©रानी श्री

पञ्चचामर छंद - महादेव ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी   छंद - पञ्च चामर  चरण - 4 (दो दो चरण समतुकांत) वर्ण - 16 मात्रा - 24 जगण रगण जगण रगण जगण गुरु महेश्वरं शिवं भवः शिवा पतिं कृपानिधिं, जटाधरं कठोर भैरवं प्रजापतिं विधिं। गिरीश वीरभद्र भर्ग सोम चारुविक्रमः, दिगंबरं हविं अनीश्वरं अजः नमो नमः। सदाशिवं भुजंगभूषणं च नीललोहितं, मृडं हरिं हरं अनंत सः वृषांक मोहितं। सहस्त्र पाद शाश्वतं त्रिकाल सर्व तारकं, सदा शिवं कपालि श्री महामुनिं  त्रियंबकं। गणादि नाथ व्योमकेश भर्ग देव अव्ययं, अनादि आदि शुद्धविग्रहं विभा भजं वयं। नमामि वैद्यनाथ मल्लिकार्जुनं त्रिलोचनं, भजामि विश्वनाथ सोमनाथ पांशुचंदनं। उमेश कालकंठ कल्पवृक्ष कालभैरवं, अमोघ अंबरीश पिंगलाक्ष शेखरं भवं।  कलाधरं पुरंदरं प्रभाकरं दिगंबरं, कपालपाणि एकलिंग भूतनाथ ईश्वरं।  अतीव सुंदरं दृगं, ललाट चक्षु शोभितं, सुनासिका प्रकाशमान भांति चंद्र लोभितं। कपोल शोभनं शिवस्य ओष्ठ भांति पाटलं, समान दंत दाड़िमं कपाल भांति उत्पलं। ललाट भस्म साज संग कंठ रूद्र भावनी, त्रिशूल हस्त वस्त्र व्याघ्र छाल पाद पावनी । नदीश्वरी जटा सुसज्जितं शशांक मस्तके, शिलादनं...

ग़ज़ल ©रानी श्री

बहर- बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूरफ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल वज़्न- 122 122 122 12 नज़र जो किसी से.....मिलाते नहीं,  ख़बर में किसी ओर.....आते नहीं।  मुखातिब हुए आज जिस ओर हम, कदम उस तरफ़ फ़िर  बढ़ाते नहीं।  ज़रा सी वफ़ा सीख लेते.....अगर,  ख़ता कर नज़र ये......चुराते नहीं।  समझते मुहब्बत का अंजाम...गर, वफ़ादार दिल को..... रुलाते नहीं। नये ज़ख़्म मिलते कहीं जो....हमें, कहानी पुरानी सुनाते.........नहीं। खबर कौन देता हमें मौत...... की,  अगर तुम हमें ये बताते....... नहीं।  गुज़रती नहीं ज़िंदगी........  दर्द में, अगर हम किसी से... जताते नहीं। सफ़र साथ तय जो किये थे कभी, वही साथ अब क्यों निभाते  नहीं। जवानी नहीं  ये भटकती....अगर, जवां दिल किसी से...लगाते नहीं।  जुदा हो गया जो हमीं से....  यहाँ, ख़ुदा फ़िर उसी को ..बनाते नहीं। बताते कि 'रानी' यही... जीस्त है, कभी रूह को.....आजमाते नहीं। ©रानी श्री

आ गये कैसे ©रानी श्री

 वज़्न- 1222 1222 1222 1222 हमें परहेज़ सबसे थी, खबर में आ गये कैसै। अभी तो रात पूनम थी,सहर में आ गये कैसे। बहारें दूर से बस लौट आती छोड़कर जिसको, ख़िज़ां में फूल ये देखो,शजर में आ गये कैसे। किसी ने भी नहीं देखा, किसी को इश़्क फरमाते, ज़माना ही बता दे फ़िर,नज़र में आ गये कैसे। न थे उस्ताद ही ऐसे कि सबको मात  दे दें हम, ख़ुदा जाने,न जानें हम, असर में आ गये कैसे। उन्हें तो गांव के दिन रात भाते थे कभी 'रानी', कि अब तू  देख ले उनको, शहर में आ गये कैसे। ~©रानी श्री

प्रेम और प्रेमविवाह ©रानी श्री

 हमें बचपन से ही सबसे प्रेम करना सिखाया जाता है लेकिन जब बात प्रेम विवाह पर आती है तो क्यों हम पीछे हट जाते हैं? क्यों तब जाति, धर्म, लिंग, उम्र, समझ और नासमझी मध्य में आने लग जाते हैं? क्यों बड़े लोगों को लगता है कि प्रेम विवाह का परिणाम केवल कलह और विनाश ही होगा।  बचपन से ही मन में सजातीय विवाह की धारणा मन मस्तिष्क में कील की भांति ठोक दी जाती है और चाह कर भी कुछ प्रेम कथाएं पूर्ण नहीं हो पातीं। और दैव संयोग अगर गलती से प्रेम विवाह कर भी लिया तो उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है जैसे कितना बड़ा पाप कर दिया हो उन्होंने।  जिन्हें प्रेम का अर्थ नहीं पता वो क्या समझेंगे कि प्रेम, उसकी सीमाएं व पराकाष्ठा क्या है? हमारी दृष्टि में ये गलत है कि बच्चे अनभिज्ञ लोगों से बात करें लेकिन ये सही है कि बच्चे किसी अंजान से विवाह कर लें और जीवनपर्यंत उनके संग रहें।  यही कारण है कि प्रेमी युगल को छिप कर और डरकर रहना पड़ता है। ये किस प्रकार की धारणा है कि यदि कोई प्रेम कर बैठे तो वह पतित है और यदि प्रेम विवाह कर ले तो उससे बड़ा पापी कोई नहीं। क्यों यह समाज व हमारी संस्कृति उसे अपना न...

देना! ©रानी श्री

 मुझे तुम तोहफ़े में एक ख्वाबों का शहर देना, ज़रा सी धड़कनों से इश्क़ की तुम जान भर देना। हज़ारों ख्वाहिशों की मांग रब से क्यों करूं बोलो, तुम्हीं को मांग लेती हूं,कि पूरी मांग कर देना। अभी अपनी नज़र से ये ज़माना देखती हूँ मैं, कि ख़ुद को भी ज़रा देखूं, मुझे अपनी नज़र देना।  कई सारे अधूरे लफ़्ज़ हैं मेरी कलम में यूं, मुझे पूरी ग़ज़ल करने,ज़रा तुम इक बहर देना। कई अब हो चुकी बातें दिमागी खेल की 'रानी' नहीं कुछ सोचना तुम आज,दिल अपना अगर देना। ~©रानी श्री

सफ़र : ज़िंदगी से मुलाकात करने को ©रानी श्री

 तारीख 5 फरवरी सरस्वती पूजा का दिन। जब एक मैसेज आया कि मेरी यूनिवर्सिटी हमारे सेशन की लड़कियों को कैमपस बुला रही है। बस एक मैसेज ने हमारे ग्रुप्स में तहलका मचा दिया। पता चला शाम को उसके लिये एक मीटिंग रखी गयी है। सभी बहुत खुश जैसे न जाने क्या मिल गया हो। शाम को फेकल्टी के साथ मीटिंग हुई और सारे रूल्स और रेगुलेशंस समझा दिये गये। हम सभी बड़े खुश क्योंकि जहाँ उम्मीद नहीं थी कि कभी अपने कॉलेज के दर्शन कर पाएंगे भी या नहीं वहाँ इस मीटिंग का होना हम सबके लिए बहुत मायने रखता था। माँ शारदे की पूजा वाले दिन ही ऐसी खुशखबरी मिलेगी ये तो ख़ैर किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। सभी बहुत खुश थे कि अंततः हम एक दूसरे से मिलेंगे। मैं भी खुश थी और शायद सबमें सबसे ज़्यादा खुश थी क्योंकि जहाँ सबके पास कैमपस आने की इकलौती खुशी थी, वहीं मेरे पास दो वजहें थीं खुश होने की। एक तो यही कि चलो अब तो उस कॉलेज के दर्शन होंगे जिसमें पढ़ तो रहे हैं मगर जिसकी शक्ल सूरत नहीं देखी अब तक। और दूसरी ये जो उससे भी खास वजह थी मेरी ना रोके जाने वाली खुशी की,और वो ये कि आख़िर किसी से मिलना हो सकेगा। कितने दिन से इस दिन का इ...

छंद- श्रीकृष्ण ©रानी श्री

चित्र
 अदित्य नंदलाल विष्णु अच्युतं प्रियं भवं लला यशोमती च नंद श्याम वर्ण केशवं। हिरण्यगर्भ देवकी सुतं च देव नंदनं अनंतजीत माधवं नमामि प्रेम वंदनं। प्रियं मुखं प्रियं सुखं अनंत संग गोपिका  गृहं तु गोकुलं अनंतजीत राज्य द्वारिका। कलिंदजा तटे प्रमोद ग्वाल संग मोहनं चतुर्भुजं च धेनु दृश्य एक एव शोभनं।  कलादि षोडशं प्रवीण कृष्ण कांति सुंदरं मयूर पंख साज वेणु वाद रुक्मणी वरं। बकासुरं च पूतना च कंस काल तारकं निपात कालिया च पर्वतं कनिष्ठ धारकं। समीर अंबरं च पावकं जलं धरा सदा करं शुभं सुदर्शनं,सरोज,शंखकं गदा। वदामि सारथी रथं उपेन्द्र अर्जुनं कथा नमामि त्वं भजामि त्वं इदं परम् सुखं प्रथा। ©रानी श्री Click Here For Watch In YouTube

छंद- महादेव ©रानी श्री

 छंद - पञ्च चामर  चरण - 4 (दो दो चरण समतुकांत) वर्ण - 16 मात्रा - 24 ISI SIS ISI SIS ISI S महेश पर्वते विराज धारणी महा प्रभा  प्रचंड चंड भूतले त्रिलोचनं मुखे विभा। भविष्य भूत वर्तमान काल चक्र सर्वदा विराजिता महा कपर्दिनी शिवा सती सदा l पिनाक हस्त नाग कंठ भस्म साज वंदनं विनाश तांडवं शिवं भजे शिलादनंदनं। हिमांशु सज्जितं नदीश्वरी जटे प्रवाहिता अखंड ज्योति पुंजिता मुखे धरा समाहिता। ©रानी श्री

ग़ज़ल- क्या चीज़ है ©रानी श्री

 2122 2122 2122 212 गीत लिखने के हुनर को, मौसिकी क्या चीज़ है, बेवफ़ाई को समझ क्या, आशिकी क्या चीज़ है। फ़र्क क्या है इश्क दोबारा अगर हो जो कभी,  इश्क तो है इश्क़ पहला, आख़िरी क्या चीज़ है। वो करे जो तंज हर पल, बिन समझ हर शेर पर, अब उसे हम क्या बताएं, शायरी क्या चीज़ है। अनकही कोई कहानी, कह रही है खामुशी, कब समझ होगी उसे ये, बेरुखी क्या चीज़ है।  जो फ़िदा हैँ खूबसूरत, हुस्न के अंदाज़ पर, आज उनको हम दिखा दें, सादगी क्या चीज़ है। दर्द उनको क्या पता हो, प्यार के हर वार का, दिल लगा कर देख लें वो, दिल्लगी क्या चीज़ है। प्यार काली रात से बस, दाग जिनके चांद में, कौन उनको ये दिखाए, चांदनी क्या चीज़ है। है ख़ुदा भी हार बैठा, इश्क की हर जंग में, जब ख़ुदा भी ना बचा तो, आदमी क्या चीज़ है। आज रानी क्यों लगे सब, कुछ तुझे भी बेवजह, गर सभी कुछ बेवजह तो, लाज़मी क्या चीज़ है। ~©रानी श्री

लाज़मी सा था ©रानी श्री

 1222 1222 1222 1222 फ़कत तन्हा दिलों को आशियाना लाज़मी सा था, बिना मंज़िल सफ़र से लौट आना लाज़मी सा था। जवानी थी बुलंदी पर कई अरमाँ मचलते थे, तज़ुर्बे के लिये तो दिल लगाना लाज़मी सा था। लगी जो आग दिल में थी बुझा ना हम सके उसको, जलाती घर अगर तो लौ बुझाना लाज़मी सा था। कफ़स में रह चुका जो एक अरसा उस परिंदे का, रिहा हो हाथ में ख़ंज़र उठाना लाज़मी सा था l ख़ुदा चाहे मुसीबत में हमें बस बेवफ़ाई दे, वफ़ा फ़िर भी उसी से ही निभाना लाज़मी सा था। समझ आती नहीं थी हर्फ़ की कोई ज़ुबां उनको, ज़ुबां खामोशियों की ही सुनाना लाज़मी सा था। बुरी है शायरी तेरी भरी है दर्द से  'रानी', खबर फ़िर मौत की अपनी बताना लाज़मी सा था। ©रानी श्री

ग़ज़ल ©रानी श्री

 हर बार सामने तुम्हारे अपना वही टूटा दिल लाती हूँ, मगर तुम्हें पसंद नहीं है इसलिए तुम्हें नहीं बताती हूँ। सोचती हूँ तुम्हें लिख दूँ, मगर लिखने को तरसती हूँ, लिखना सीख लिया मैंने और लिख भी नहीं पाती हूँ। मुझे मंज़िल  क्या ख़ाक  मिलेगी मेरी ऐसी चाल पर, दो कदम आगे बढ़ी नहीं और मैं हूँ कि लौट जाती हूँ। एक तुम हो जो मुझको समझने में ऐसे झिझकते हो, ये समझती हूँ फ़िर भी मगर ख़ुद को ही समझाती हूँ। लोग कहते हैं कुछ मुस्कान खरीद लूँ तुम्हारे नाम की मैं अपने नाम से अश्क किश्तों पर उधार ले आती हूँ। आस नहीं विश्वास है कि मौत से पहले तुम आओगे, सो मौत से पहले मैं अपनी कई ज़िंदगियां बचाती हूँ। तुम्हें लगता होगा के बेवजह रानी खुश क्यों है इतनी, यकीं मानों वैसी खुश नहीं जैसी ख़ुद को दिखाती हूँ। ©रानी श्री

आसान नहीं एक बेटी का बाप होना। ©रानी श्री

आसान नहीं एक बेटी का बाप होना।    दुनिया के तानों  का अभिशाप ढोना। आसान नहीं एक बेटी का बाप होना। अधिक प्रेम करने पर भी तंज सहना, कम प्रेम में भी तो सबके रंज सहना। उसके संग खेलना, रूठने पर मनाना, हंसते हुए भी कांटे जैसा कंज सहना। उसके  जन्म से ही  पैसे बचत करना, खिलौनों की जिद का भी जाप ढोना। आसान नहीं एक बेटी का बाप होना। बेटी बड़ी हो रही, उसे सब सिखाना, सभी की बुरी नज़रों से उसे छिपाना। ऊंगली न उठने पाए मान सम्मान पर बिटिया अब तू ही मेरी लाज बचाना। जवान निर्दोष  बेटी से छेड़खानी पर, तब अपनी बदनामी का संताप ढोना। आसान नहीं एक बेटी का बाप होना।  कभी उसे पढ़ाने के लिये यत्न करना, तो कभी शादी के लिये प्रयत्न करना। जिस अनमोल रत्न को नाज से पाला, किसी और को  दान वही रत्न करना। और अगर वो शादी टूट जाए तो फ़िर,  चुपचाप उस अपमान का छाप ढोना। आसान नहीं एक बेटी का बाप होना। डोली  सजाने के लिये अंग अंग देना, आंसुओं से सींचके जीने के ढंग देना। ससुराल में अत्याचार से पीड़ित बेटी जब मर जाए  तो फ़िर क्या रंग देना। आंखों के सामने उसका शव देखकर, जीव...

कविता ©रानी श्री

 संगीत की सुमधुर लय में, तम से उत्पन्न आतुर भय में,  हर प्रकार से समीक्षा में रहूंगी  मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहूंगी। भूत भविष्य के तय में,  हर दृश्य के जय-पराजय में, जीवन की हर अग्नि परीक्षा में रहूंगी  मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहूंगी। मेरी कविताओं के विषय में,  बहती सरिताओं के आशय में, तुम्हें प्राप्त होती दीक्षा में रहूंगी  मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहूंगी। पथप्रदर्शक सम नय में,  लोलक सम क्षय-अक्षय में, हर संभव अन्वीक्षा में रहूंगी  मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहूंगी। लोकप्रिय लोक त्रय में, दाख-धिय मय में,  तुम्हारी स्वीकृति की संप्रतीक्षा में रहूंगी  मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में रहूंगी। © रानी श्री