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धीरता ©अनिता सुधीर

 धीरता की नित परीक्षा धैर्य डरता कब धमक से ज्ञानियों की भीड़ कहती अब सहें आलोचना क्या तीस मारे ख़ाँ सभी हैं बुद्धि दूजी सोचना क्या मिर्च लगती जब अहं को झूठ कहता फिर तमक से।। सीख जब भी रार करती भिनभिनाती मक्षिका है पीर रोती फिर बिलख कर क्रोध करती नासिका है चीखता सा घाव रोया  मात्र चुटकी भर नमक से।। हैं मनुज की जातियाँ दो सीखतीं या फिर सिखातीं मर्म गहरा लुप्त होता ये क्रियाएं जग चलातीं अनवरत धर धीरता को मुख दमकता फिर चमक से।। ©अनिता सुधीर आख्या

परिचय ©अनिता सुधीर

 अपना परिचय लिख रही,दोहों में ही आज । दो अक्टूबर जन्म है,लकी नाम है राज ।। जन्म नवाबों के शहर ,माता शीला नाम । प्रथम सुता रविन्द्र की ,जन्मी उनके धाम ।। अनिता की पहचान है ,विद्यालय का नाम । शास्त्र रसायन से मिला,जीवन को आयाम ।। शोध क्षेत्र औषधि रहा ,शौक रहा विज्ञान । गहराई में डूब के, किया पूर्ण अभियान ।। शुभ बंधन है प्रीत का, पति का नाम सुधीर। दो संतति के रूप में,जीवन रंग अबीर ।। जीवन की जब साँझ में ,लगा व्याधि अरु रोग। पृष्ठ किये रंगीन तब ,मिला कलम का योग ।। ज्ञान नहीं लय शिल्प का,पता न मात्रा भार । छन्द सृजन कैसे करें , नहीं शब्द भंडार।। अल्प आयु की है कलम, आख्या अब उपनाम । यात्रा मंगल दायिनी, आये नहीं विराम ।। साथ मिला साहित्य का, मिला नया परिवार। दोहा लिख सम्मान में, प्रकट करें आभार ।। सत्य मार्ग का अनुसरण, जीवन का सिद्धांत। विद्या उत्तम दान कर, पूर्ण करे वृत्तांत ।। ©अनिता सुधीर आख्या

गीतिका ©अनिता सुधीर

 शूल को पथ से हटाने का मजा कुछ और है। वीथिका को नित सजाने का मजा कुछ और है।। व्यंजना या लक्षणा में भाव हृद के व्यक्त हों छंद को फिर गुनगुनाने का मजा कुछ और है।। क्लांत बैठा हो पथिक जब जिंदगी से हार कर पुष्प उस पथ में बिछाने का मजा कुछ और है।। पंख सपनों को लगाकर दूर बाधा को करें मुश्किलों के पार जाने का मजा कुछ और है।। चाल चलकर काल निष्ठुर ओढ़ चादर सो रहा लालिमा में चहचहाने का मजा कुछ और है।। पीर की सामर्थ्य क्यों अवसाद को नित जोड़ती वेदना में मुस्कुराने का मजा कुछ और है।। कौन हूँ मैं क्या प्रयोजन द्वंद्व अंतस ने लड़ा  लक्ष्य को फिर से जगाने का मजा कुछ और है।। ©अनिता सुधीर

मेरे गगन तुम ©अनिता सुधीर

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 मैं धरा मेरे गगन तुम अब क्षितिज हो उर निलय में दृश्य आलिंगन मनोरम लालिमा भी लाज करती पूर्णता भी हो अधूरी फिर मिलन आतुर सँवरती प्रीत की रचती हथेली गूँज शहनाई हृदय में।। धार इठलाती चली जब गागरें तुमने भरीं है वेग नदिया का सँभाले धीर सागर ने धरी है नीर को संगम तरसता प्यास रहती बूँद पय में।। नभ धरा को नित मनाता फिर क्षितिज की जीत होती रंग भरती चाँदनी तब बादलों से प्रीत होती भास क्यों आभास का हो काल मृदु हो पर्युदय में।। ©अनिता सुधीर Click Here For Watch In YouTube

वृद्धावस्था ©अनिता सुधीर

 नींव रहे , ये सम्मानित बुजुर्ग मजबूत हैं इनके बनाये दुर्ग छत्रछाया में जिनके पल रहा   सुरक्षित आज का नवीन युग.. परिवर्तनशील जगत में  खंडहर होती इमारतें  और उम्र के इस पड़ाव में .. निस्तेज पुतलियां,भूलती बातें पोपला मुख ,आँखो में नीर  झलकती व्यथा ,अब करती सवाल है ... मेरे होने का औचित्य क्या .. क्या मैं जिंदा हूँ .... तब स्पर्श की अनुभूति से अपनों का साथ पाकर दादा जी जो जिंदा है बस वो थके जीवन में  फिर जी उठेंगे .... वृद्धावस्था अंतिम सीढ़ी  सफर  की समझें ये पीढ़ी जतन से जब जीर्ण शीर्ण काया मे क्लान्त शिथिल हो जाये मन तब अस्ति से नास्ति का जीवन  बड़ा कठिन । अस्थि मज्जा की काया में सांसो का जब तक डेरा है तब तक  जग में अस्ति है फिर छूटा ये रैन बसेरा है ।" जो बोया काटोगे वही  मनन करें  सम्मान  दे इन्हें पाया जो प्यार इनसे ,  शतांश भी लौटा सके इन्हें ये तृप्त हो लेंगे..  ये फिर जी उठेंगें ... ©अनिता सुधीर

लव जिहाद ©अनिता सुधीर आख्या

 प्रेम जाल में फाँस कर फिर तितली पर वार करें पंखों पर जब पुष्प उगे सूरज लेने दौड़ी थी मस्ती ने थैले में फिर भरी न कोई कौड़ी थी पदचिन्हों की ताली भी खुशियों पर अधिकार करे।। बाज उसाँसे भर-भर कर झूठे दाने फेंक रहा मीन फाँस कर मुख में रख नाम धर्म का सेंक रहा रक्त सने मासूमों पर शोषण को हथियार करे।। तभी सियासी जामे ने प्रेम गरल का रूप धरा भीड़ तंत्र ने कुचला जो प्रीत भाव फिर कूप गिरा मित्र बना दीपक ही क्यो जीवन को अंगार करे।। ©अनिता सुधीर आख्या

छठ©अनिता सुधीर

 करें सूर्य आराधना, आया छठ का पर्व। समरसता के भाव में, करे विरासत गर्व।। कार्तिक मास सदा उर भाए।       त्योहारों में मन हर्षाए।।  शुक्ल पक्ष की षष्ठी आई।        महापर्व की खुशियाँ छाई।।  सूर्य उपासन आराधन का।       पर्व रहा संस्कृति गायन का।।  छिति जल पावक गगन समीरा।           पंच तत्व को पूज अधीरा।। जुड़े धरा से सबको रहना।         यही पर्व छठ का है कहना।।  सूप लिए जब चले सुहागन।          प्रकृति समूची लगे लुभावन।।  ईखों से जब छत्र सजे हैं।          अंतर्मन के दीप जले हैं।। सूरज डूबा जब जाएगा।           नवल भोर ले फिर आएगा।। अर्थ निकलता त्योहारों से।            जुड़े रहे सब परिवारों से।। परंपरा की नींव में,जीवन का है सार। गूढ़ अर्थ समझे सभी,मना रहे त्योहार।। ©अनिता सुधीर आख्या

लघुकथा पोशाक ©अनिता सुधीर आख्या

चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी।  वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी  राजेश! क्या हुआ आरती पत्नी को झकझोरते हुए बोला.. आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए. किस पर विश्वास करें और सगे भी ? पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे. कहते हुए बेटी के कमरे की ओर चल दी... © अनिता सुधीर आख्या

दो अक्टूबर ©अनिता सुधीर

 रेख बड़ी हो या छोटी हो, रखती दोनों अलग महत्व।  आजादी के आंदोलन में, सबका अपना है अमरत्व।।  गांधी व्यक्ति नहीं था कोई, गांधी था तब एक विचार।  लाल बहादुर साथ खड़े थे,जनता को देने अधिकार।। दो अक्टूबर धन्य रहा है, जन्में भारत के दो लाल। इतिहास गवाह सदैव रहा, इनके जैसी नहीं मिसाल।।  इन अमर सपूतों के कारण, भारत देश हुआ आजाद। त्याग समर्पण रग-रग में भर, करते वंदे माँ का नाद।।  असहयोग में गांधी कहते,करो मरो से कर लो प्रीति।  मरो नहीं तुम मारोगे अब, लाल बहादुर की थी रीति।। वर्षों का संघर्ष रहा था, देश हुआ था तब आजाद।  और विभाजन बनी त्रासदी, सपनों को करती बर्बाद।। रामराज्य का सपना देखे, गाँधी ने जब त्यागे प्राण। लाल! जवान किसान लिए फिर, करते भारत नव निर्माण।। ऋणी रहेंगे भारत वासी, जिनके कारण दिन ये आज। उच्च विचार रहा जो जीवन, लाभान्वित हो नित्य समाज।। लाठी चश्मा और सादगी, आज माँगती है उपहार। पूर्ण करो आजाद स्वप्न को, रामराज्य पर कर अधिकार।। -© अनिता सुधीर आख्या

आधार छन्द मंगलमाया ©अनिता सुधीर आख्या

 जीवन का मनुहार, तुम्हारी आँखों में। परिभाषित है प्यार, तुम्हारी आँखों में।।। छलक-छलक कर प्रेम,भरे उर की गगरी। बहे सदा रसधार, तुम्हारी आँखों में।। तुम जीवन संगीत, सजाया मन उपवन भौरों का अभिसार, तुम्हारी आँखों में।। पूरक जब मतभेद, चली जीवन नैया खट्टी-मीठी रार, तुम्हारी आँखों में।। रही अकिंचन मात्र, मिला जबसे संबल करे शून्य विस्तार, तुम्हारी आँखों में।। किया समर्पण त्याग, जले बाती जैसे करे भाव अँकवार, तुम्हारी आँखों में।। जीवन की जब धूप, जलाती थी काया पीड़ा का उपचार, तुम्हारी आँखों में।। © अनिता सुधीर आख्या

कठपुतली ©अनिता सुधीर आख्या

 आँख में अंजन दांत में मंजन  नित कर नित कर नित कर नाक में ऊँगली कान में लकड़ी  मत कर मत कर मत कर".. कितनी सरलता से हँस-हँसकर  जीवन का पाठ पढ़ाती थी वो दूसरों के हस्त संचालन से नाचती काठ की कठपुतली थी वो... जिज्ञासा थी बालमन में कैसे डोर से बंधी ये नाचती होगी.. पर्दे के पीछे कमाल सूत्रधार का  जो उंगलियों से उन्हें नचाता होगा... जिज्ञासा अब शांत हो रही  अब डोर है कितने अदृश्य हाथों में... काठ के तो नहीं   भावनाएं है कुछ सपने  कुछ आकांक्षाएं है.. निपुणता से संचालन करते हैं लोग  परिवार धर्म मर्यादा रिश्तों के नाम पर कितनी बखूबी से नचाते है लोग.. वो काठ की कठपुतली थी दूसरों के इशारे पर नाचती थी वो  और अब... © अनिता सुधीर आख्या

सावन ©अनिता सुधीर आख्या

 धानी चूनर ओढ़ के,धरा रचाये रास। बागों में झूले पड़े ,सावन है मधुमास ।। कुहू कुहू कोयल करे,वन में नाचे मोर। भीगे सावन रात में,दादुर करते शोर।। बूँदों का संगीत सुन ,मन में है उल्लास। प्रेम अगन में तन जले,साजन आओ पास।। बदरा बरसे  नेह के ,सुनकर राग मल्हार। कजरी सुन हुलसे हिया, मनें तीज त्योहार। धीरे झूलो कामिनी, चूड़ी करती शोर । मन पाखी सा उड़ रहा,पकड़े दूजा छोर।। शंकर आदि अनंत हैं,पावन सावन मास। पूजे सावन सोम जो ,पूरी हो सब आस ।। मंदिर मंदिर सज गये,चलें शम्भु के  द्वार। काँवड़ ले कर चल रहे,श्रद्धा लिये अपार ।। माला साँपों की गले,कर में लिये त्रिशूल। सोहे गंगा शीश पर ,शिव हैं जग के मूल।। डमरू हाथों में लिये,ओढ़े मृग की छाल। करते ताण्डव नृत्य जब,रूप धरें विकराल।। महिमा द्वादश लिंग की ,अद्भुत अपरम्पार। चरणों में शिवशम्भु के,विनती बारम्बार ।। © अनिता सुधीर आख्या

तुरपन ©अनिता सुधीर आख्या

  याद आती है  माँ की वो हिदायतें जो वो  दिया करतीं थीं... तुरपन इतनी महीन करना  दूसरी ओर दिखे न धागा.. मैं ग़लतियाँ करती रही सुई कई बार ऊँगलियों में चुभी   टीस उठती रहती  धागा दूसरी और दिखता ही रहा ... अब  जीवनके पन्ने पलट कर  देखते हैं  तो सोचते हैं  माँ तुम्हारी आकांक्षाओं पर  तब तुरपन सही थी या नहीं  पर अब माँ  इन महीन धागों से महीन तुरपन कर अधरों को सी रखा है ... माँ अब .. दूसरों को दिखता नहीं धागा  रिश्तों को बाँध रखा है  सहेजने में टीस उठती है  कुछ दिल में चुभती है  इस सहेजने  बाँधने में तुरपन टूटने का देर रहता है  पर माँ बहुत मेहनत से  आपने जो तुरपन सिखाई थी  उसका मान  रखना है न माँ ...     © अनिता सुधीर आख्या

महर्षि पतंजलि ©अनिता सुधीर

 पावन भू पर जन्म लिए,मुनि भारत गौरव गान लिखे। दर्शन योग पतंजलि का,ऋषि धातु रसायन मान लिखे।। योग विधान प्रसिद्ध हुआ,परिभाषित सूत्र महान लिखे।। भाष्य विवेचन सार लिखे,वह संस्कृति का अवदान लिखे।। अष्ट प्रकार सधे तन ये,छह दर्शन में उत्थान लिखे। औषधि वैद्य पितामह थे,तन साधन का तप ज्ञान लिखे।। जो उपचार किए मन का,मन चंचल का वह ध्यान लिखे। रोग विकार मिटा जग का,वह भारत की  पहचान लिखे।।                   अनिता सुधीर आख्या

सैनिक ©अनिता सुधीर

सोच रही शब्दों की सीमा,कैसे लिख दूँ सैनिक आज। कर्तव्यों की वेदी पर जो,पहने हैं काँटों का ताज।। वीरों की धरती है भारत,थर थर काँपे इनसे काल। संकट के जब बादल छाए, रक्षा करते माँ के लाल।। रात जगी पहरेदारी में, देख रही है सोया देश। मित्र बना कर बारूदों को,वीर सजाते फिर परिवेश।। रिपु को धूल चटाना हो या,नागरिकों का रखना ध्यान। विपदा कैसी भी आ जाए,हँस कर देते हैं बलिदान।। हिमकण की ओढ़ें चादर या ,तपती बालू का शृंगार। देश बना जब इनका प्रियतम, नित्य ध्वजा से है मनुहार।। भू रज मस्तक की शोभा है,शौर्य समर्पण है पहचान। फौलादी तन मन रख सैनिक ,करते कितने कार्य महान।।                                    ©अनिता सुधीर

आल्हा छन्द ©अनिता सुधीर

 तिथि तृतीय बैशाख मास की, पक्ष उजाला शुभ दिन मान। हरि लक्ष्मी पूजन फलदायी,विधि विधान से करिये दान।। पावन मनभावन शुभ दिन है, अक्षय तृतीय का त्योहार। जन्मोत्सव भृगुनन्दन का है,अक्षत हो जग घर परिवार।। त्रेता युग में ऋषि घर जन्में, पीताम्बर के छठ अवतार। परशुराम हर युग में आए ,करने मानव का उद्धार। ब्राह्मण कुल में जन्म लिए थे,कर्म किये क्षत्रिय अनुसार। अस्त्र परशु शंकर का रख कर,करते दुष्टों का संहार।। शास्त्र निपुण थे राम अनंतर,पाए अक्षय का वरदान। भार्गव कुल के आज्ञाकारी, कहलाये ऋषि मुनि भगवान।। रक्त शिराओं में धधका था,करने अन्यायी का नाश। वैदिक संस्कृति चारो दिश हो,फैले भू पर ज्ञान प्रकाश।। सत्य सनातन के थे रक्षक,कब सहते थे वो अपमान। ध्वज वाहक बन आरम्भ किया,नारी जागृति का अभियान।। त्रेता द्वापर हर युग में थे,अब कलयुग में लें अवतार। शास्त्र ज्ञान जन जन को दें अब,जग का मिट जाए अँधियार।।                                          ©अनिता सुधीर आख्या

गजल ©अनिता सुधीर

 काफिया    ऐ रदीफ़       भी  खूब थे  रतजगे वो इश्क़ के भी खूब थे  दिलजलों के अनकहे भी खूब थे ख़्वाब पलकों पर सजाते जो रहे इश्क़ तेरे फ़लसफ़े भी खूब थे  अश्क आँखो से बहे थे उन दिनों अब्र क्यों तब बरसते भी खूब थे  कब तलक हम साथ यों रहते यहाँ दरमियाँ ये फासले भी खूब थे । जी रहे तन्हाई में हम क्यों यहाँ आप के तो कहकहे भी खूब थे                  @अनिता सुधीर आख्या

गीतिका ©अनिता सुधीर

 1222,1222 1222 1222 रखें उत्तम गुणों को जो,रहें सबके विचारों में। मनुजता श्रेष्ठतम उनकी,चमकते वो हज़ारों में। सभी लिखते किताबें अब,बचे पाठक नहीं कोई। पढ़ेगा कौन फिर इनको,पड़ी होंगी किनारों में।। हवा की बढ़ रही हलचल,समय आया प्रलयकारी नहीं जो वक़्त पर चेते, उन्हें गिन लो गँवारों में।। लगी है भूख दौलत की,हवा को बेचते अब जो सबक तब धूर्त लेंगे जब, लगेंगे वो कतारों में ।। अटल जो सत्य था जग का,भयावह इस तरह होगा गहनता से इसे सोचें, मनुज मन क्यों विकारों में।। ठहरता जा रहा जीवन,सवेरा अब नया निकले दुबारा हो वही रंगत,महक हो फिर बहारों में।।                                               @अनिता सुधीर आख्या

होली उल्लाला छन्द में ©अनिता सुधीर

 उल्लाला उल्लाल है,फागुन रक्तिम गाल है। कहीं लाज से लाल है,कहीं बाल की खाल है।। भंग चढ़ा कर आज से,छाया क्या उल्लास है। संगी साथी मग्न हैं,रंग भरा परिहास है।। पिचकारी हो प्रेम की,जीवन होली रंग हो। दहन कष्ट का हो सभी,नहीं रंग में भंग हो।। रूप धरे विश्वास का,आया अब प्रह्लाद है। अंत बुराई का सदा,यही गूँजता नाद है ।। होली की इस अग्नि में,राग द्वेष सब भस्म हो। कर्म यज्ञ हो जीवनी,जीवन की ये रस्म हो।                      @अनिता सुधीर आख्या

पवनपुत्र ©अनिता सुधीर

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 चैत माह की पूर्णिमा, प्रकट भक्त हनुमान । राम नाम उर मे धरे ,करें राम का ध्यान ।। मारुति नन्दन वीर हैं ,रुद्र शिवा अवतार। रामदूत  हनुमान जी ,करते बेड़ा  पार ।। जपे नाम हनुमान का, मिटते सारे रोग । भवसागर से तार दें ,उत्तम जीवन भोग।। मूरत  तेरी  देख  कर , दूर  भागता   काल। दया करो मुझ दीन पर ,हे अँजनी के लाल ।। भक्तों के दुख दूर हों,संकट मोचक आप। प्रभु अपना आशीष दो, मिटे जगत का ताप ।। ज्येष्ठ मास मंगल रहा,लखनऊ का कुछ खास । पवन पुत्र हनुमान जी,पूरी  करिये आस ।। तुलसी तुलसी घाट पर,पूर्ण किये थे ग्रंथ। इष्ट देव हनुमान जी,सदा दिखाए पंथ।।                                     @अनिता सुधीर आख्या