संदेश

#अंजलि लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बाकी है ©अंजलि 'जीआ'

 नमन माँ शारदे नमन लेखनी नाकामयाबी का मुझमें  असर बाकी है, शायद मेहनत में थोड़ी  कसर बाकी है। शानो- शौकत में है परिंदो का नया जहां, कुछ नहीं बस  एक बूढ़ा शजर बाकी है। जाने सब आते वक्त के नक्शे बनाए इंसाँ, ना जाने तो बस की कितनी उमर बाकी है। गहरात से सजे हो अल्फ़ाज़ मोहब्बत के, इश्क़ मीरा-सा पाक अब किधर बाकी है। राहों में मेरी  बुझता चिराग जल जाता है, 'जीआ' उस डमरू वाले की नज़र बाकी है। ©अंजलि 'जीआ'

ग़ज़ल ©अंजलि

 नमन मां शारदे नमन लेखनी ज़माने की भी अलग ही रवायत है सब कुछ है  फिर भी शिकायत है। ज़रा संभल कर रहो इस ज़माने में, हुकुम नहीं साहब बस हिदायत है। दुनिया की भीड़ में वो साया अपना माँ महज़ एक शब्द नहीं इनायत है। भरे जो पेट, अपना पसीना बहाकर, मिलती उसे ब्याज  पर रिआयत है। ढूँढ लेता ज़माना छिपी कमियाँ भी, अजी  आदत नहीं ये तो  वसायत है। ©अंजलि 

कविता- शिव विवाह ©अंजलि

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी महिना है फागुन का, दिन तेरस का आये बन वर पक्ष के अध्यक्ष नारद विवाह का न्यौता देने जाए। पंडित बने है ब्रह्मा, विष्णु कैलाश सजाएं, भस्म लगाकर तन पर भोले गौरी ब्याहने जाए। मुस्कुरा रहा शीश पर चंदा, जटाओं में गंगा नाचे गाये, पुष्प से सजा है नन्दी वासुकी हर्ष मनाए। चंद्राणी, ब्रह्माणी बन बहनें, रीति रिवाज रही निभाए, भूत प्रेत देवता दानव, बारात लिए सजाए। नाच रहे है बाराती, गण डमरू रहे बजाए, होकर नंदी पर सवार, शिव शक्ति ब्यहाने जाए। पहुंच गई बारात गौरी द्वार, नारद संदेश दिया पहुंचाए, उत्साहित गौरी की सखियां, गौरी का दूल्हा देखन आए। देखकर शंभू की काया, सखियां गई घबराएं, जाकर राजा रानी को सारा प्रसंग रही सुनाए। भाई मैनक द्वार खड़ा, शिव स्वागत की विधि कराए, पहुंच अन्तर्यामी गौरी की नगरी, गौरी को कैलाश ले जाने आए। मैना रानी महादेव को देखने की इच्छा जताए, देखने को शिव की काया, द्वार की ओर कदम बढ़ाए। धरकर विराट सा कुरूप, प्रभु मैना सबक सिखाए, करे रानी भोले की निंदा, नारद शिव महिमा गाये। बन गए भोले तेजस्वी युवक, मुकुट लिया सर पर सजाए, संसार बनाने वाले, खुद का संसार बसाने आ...

मोहब्बत ज़िंदगी से ©अंजलि

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी कभी बारिश की बूँदों को, सूखी जमीं पर गिरते देखा है? महक सी जाती है ना उसका आना भी ऐसा ही था। पहली बार उसे देखा, उसकी आँखों में खो सी गई, उसकी बातों में मानो मैंने नई खुद को पा लिया। वो गिटार बजाता, पुराने गाने गाता, लोगों के हुजूम में, अलग सा नजर आता। धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा  वो मुझे जानने लगा, मुलाकातें बढ़ने लगी और मेरी चाहत दोस्ती में बदलने लगी। वो मेरे साथ अपने सुख-दुख बाँटता, मुझे मेरी गलतियों पर डाँटता, मैं सोचती कि वक्त बस यहीं थम जाए, हम साथ हो और जिंदगी गुजर जाए। पर कहते है न कि वक्त किसी के लिए नहीं रुकता, और जो किस्मत में न हो, वो चाहकर भी नही मिलता। एक दिन उसने मुझे अपनी मंज़िल अपनी मोहब्बत से मिलवाया, सारे ख्वाबों को मानो एकदम  हक़ीक़त की ज़मी पर ले आया। मोहब्बत अधूरी रह गई  पर दोस्ती हरदम पूरी रही, माना स्याह काली रात थी, पर आने वाली नई शुरुवात थी। दिमाग ने दिल को एक बात बताई, जिंदगी सफ़र है, बात समझाई, जरूरी नही जो चाहो वो मिल जाए, पर जो मिले उसमे सुकून से जिया जाए। ©अंजलि

ग़ज़ल ©अंजलि

तेरे ज़िक़्र के कफ़स में कैद तेरी याद होगी, मिलेगी रिहाई जब तुझसे मुलाकात होगी। कशिश से सजे हैं तेरे मक़तूबों के अल्फा़ज, देखा जिस पल नज़र भर,क्या सौगात होगी। तेरे बिना बेचैन,अकेली लगती है स्याह रातें, तू जो हुआ साथ अगर क्या हसीं रात होगी। इंतजार में हूँ हमारी मोहब्बत की बरसात के ‌, तू जो छू ले ख़ालिस उल्फत सी बरसात होगी। अक़ीदत के असास से साथ गुज़रेगी जिंदगी, रूख्सती के बाद भी आख़िरत तेरे साथ होगी।  ©अंजलि

वो ©अंजलि

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  हर किसी का पहला अपना,सब जग विधाता है वो, प्रीत निभाए शिव सी, धर्म कृष्ण सा निभाता है वो। कहीं पहाड़, झील,झरने,कहीं ऊँची इमारतें विशाल जगमग  सितारों से हर गली कूचे को सजाता है वो। ज़्यादा बरसे बाढ़ ले आए, कम हो तो सूखा पड़ जाए ज़्यादा-कम में संयम दे ज़िंदगी जीना सिखाता है वो। हारे का बनता सहारा, भाग्य लिखे को बदल देता है, जो याद करे कोई दिल से बिगड़े काम बनाता है वो। कृष्ण बन कर्म का पाठ पढ़ाए, भक्ति का मर्म बताए, सिखाने सृष्टि को मर्यादा का पाठ राम बन आता है वो। ©अंजलि 

शिव ©अंजलि

 जचे विकराल रूप भयानक जचे रूप मनहर में, जचे है भस्म सर्प चंदा जचे कैलाशी बाघंबर में। जटाओं में सजी है गंगा ,त्रिशूल सदैव रहे कर में, तेज़ मुख पर उतना जितना साथ सौ दिनकर में। रीझे आक धतुर श्रीफल पर पिए भांग खप्पर में, भाव शिव का रहे एक सा दरिद्र धनी के अंतर में। महाकाल बन रहे उज्जैन,रहे ऊंचे कैलाश सुंदर में, रहे वहांँ जहाँ मिले भक्ती प्रेम वास बना ले खंडर में। बसे शिव में है सब इकाई, हर शून्य बसे शंकर में, बसे 'जीआ' की हर श्वास में,बसे हर कण कंकर में। ©अंजलि

लगता है ©अंजलि

 दिल में बसा रूह के करीब लगता है, तेरा दिया  मुझे मेरा नसीब लगता है। भूत-पिशाच, गंधर्व सबसे यारी तेरी, प्यारा तूझे हर निर्धन गरीब लगता है। आया माँ सती को सादापन रास तेरा, पिता को पर्वतवासी बेतरतीब लगता है। शूलपाणी, जटाओं में धारण की है गंगा कंठ बसा वासुकी खुशनसीब लगता है। हर लिया घट-घट में था जो विष भरा, शंकर  तू हर मर्जं का तबीब लगता है। ©अंजलि

लेखनी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ काव्य पाठ एवम मिलन समारोह ©अंजलि

 लेखनी परिवार उस कुम्हार के मिट्टी के घड़े के जैसा है जिसे मेहनत के साथ-साथ प्यार, विश्वास और परिवार के सफ़र की रूपरेखा देकर घड़ा गया है, इसीलिए सभी सदस्यों को अमूल्य ही प्यारा है। इसी वर्ष लेखनी परिवार ने दो वर्षों का सफ़र तय किया है इसी उपलक्ष्य पर ये मेरी प्रस्तुती है- मुझे इस परिवार का हिस्सा बनाने के लिए हृदयतल आभार🙏 © अंजलि Video 1:    Video 2: Video 3:

हो गए ! ©अंजलि

 आपसे ही हुआ दर्द, आप मुस्कान हो गए, ख्वाब आपके कैसे हमारे अरमान हो गए। ये दिल हमारा अब घर हो गया है आपका, हम मेहमान  इसके आप  मेज़बान हो गए। नहीं लगी हमें ऐसे आदत  कभी किसी की, आपसे हुई जिंदगी, कैसे आप जान हो गए। चाहत थी लफ़्ज़ों में पिरों दे ये इश्क अपना, नज़रें जो मिली आपसे हम बेजुबान हो गए। अकेले थे शर्मो-हया फक़त अक्स थे हमारे, शरीक बने आप,हम आपसे शैतान हो गए। नहीं रहा इल्म मुझे ज़माने की रिवायतों का, ये जहान हुआ आपसे, आप जहान हो गए।     © अंजलि

अधूरा इश्क़ ©अंजलि

 पाक-सा शक्स मिला एक अफसाने में, खोला जो खुद का ये दिल अनजाने में। मैं नहीं जानती थी सुकून उसके दिल का, पर दिल लगा रहा उस दिल को बहलाने में। हर्फ-दर-हर्फ सजाए जो अपने जज़्बात, अब मज़े लेती थी तन्हाई उन्हें दोहराने में। इर्द-गिर्द बेतरतीब छाई थी यादें उसकी, सुनती थी उसी की आहट मैं विराने‌ में। रस्म-ए-आशिकी निभाई उसके इंतज़ार में, बहुत वक्त लगा फिर एक नई सुबह आने में।                                                                @ Anjali