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गीत- एकल ©लवी द्विवेदी

प्रेम का संगीत गाकर, नेह की वीणा बजाकर। प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। मान ले यदि दोष मेरा,  तज चले, करके बसेरा।  किंतु एकल उस निलय को, देख बीहड़ क्यों बुहारा ? गेह स्मृतियां पुरानी,  थी अधूरी, पर कहानी। स्मरण करके कभी क्या,  अन्न ले करके पुकारा ? गुनगुनाता चहचहाता,  उड़ रहा था खग यहीं पर। दो दिवस बीते, नहीं वो.. दिख रहा क्यों, है कहीं, पर.... है कहाँ? यदि कर सके उपकार यह ना, खग वहाँ कैसे उड़ेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा।। नैन यदि शृंगार करके, रो पड़ें भी व्योम भरके। पीर जिनकी आपदा बन, आँधियाँ भी सींच सकती। मर्मभेदी यातनाएं,  शांत हिय की वेदनाएं। यदि हुई विकराल हिय में,  गर्जना को भींच सकती। दामिनी हिय की भड़क यदि,  जाए तो घबरा उठेंगे। दंभ रूपी वृक्ष जो ना.. झुक सकें वो भी झुकेंगे।  किंतु मन में मन दबाकर, मर रहा जो, चैन से क्या मर सकेगा ? प्राण में बसकर हमारे, क्या पता था, प्राण प्यारा प्राण लेगा। वक्ष ने विश्वास बोया, और फिर क्या क्या न खोया। प्रेम में परिहास बनकर, रह गया हर एक...

हरिगीतिका छंद ©लवी द्विवेदी

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी छंद- हरिगीतिका चरण- चार (दो-दो या चार चरण तुकांत) कवने दिवस यदुनाथ मुदित महा कृपा बरसाइहौ,  निर्जन कुटी महु रंक की कवने दिवस ते आइहौ। प्रभु गेह पूज्य पदारविंद सहाय हो कब लाइहौ, कब नाथ जानि अनाथ मोको मानि सुत अपनाइहौ। मैं दीन कलुषित पातकी का विधि कृपा तिन गाइहौं,  मन मैल वस्त्र कषाय ले का विधि शरण तिन आइहौं।  यदि हो कृपा यदुनाथ की मझधार मैं तरि जाइहौं  व्यभिचार हो आचार यदि यदुनाथ आशिष पाइहौं। मृदुनैन नौकाकार जिन उन नैन काजर पारिहौं,  निज हाथ से बिनि आसनी चौपर्ति कै भुइ डारिहौं।  जल शुद्ध नहि, दृगधार से चरणारविंद पखारिहौं, लै राइ नून उतार अभल कुदृष्टि, प्रभु हिय वारिहौं।  प्रभु मात्र एकल बार दृष्टि बहोरि अपनी दीजिए, प्रभु देख लो यक बार मो इतनी कृपा हरि कीजिए।  सर्वस्व से तुम रीझते यक बार मोसे रीझिए,  कितना रहोगे दूर हरि अब और मत प्रभु खीझिए। ©लवी द्विवेदी "संज्ञा"

गीत- प्रसून ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी मैं प्रेम में रँगी हुई फिरूँ, तू प्रेम को नकारता फिरे। मैं प्रेम भाव वारती फिरूँ, तू भाव खाय भागता फिरे। मिलिंद रूप व्यग्र गोपिका, प्रसून श्याम रंग ढूँढती, अरण्य पूर्ण खोज, हारकर, शिथिल पड़ी, धरा टटोलती। मैं आस जो समेटती फिरूँ, तू आस वो कचोटता फिरे। अनेक पुष्प जोह जोहकर, मालिका बनाई नेह की। परन्तु रे कठोर क्यों कभी, डेहरी न लाँघी गेह की। मैं द्वार नित बटोरती फिरूँ, तू नित कषाय फेंकता फिरे। कैसी है विडंबना किशन, माँग मेरी पूरी न करे। नाम है हरी परन्तु क्यों, अपनी प्यास को भी न हरे। मैं प्रेमपात्र माँगती फिरूँ, तू प्रेम पात्र ढूँढता फिरे। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

ग़ज़ल ©लवी द्विवेदी

  यकीं तुम करो, हम नहीं दूर जाते। मुक़द्दर से तुमको अगर छीन पाते। सफ़र में नहीं सर्द तन्हाई होती, कहीं से हँसी धूप हम ढूँढ लाते। वो मज़हब को लेकर सुलह जो कराता, कसम से ख़ुदा को ज़मीं पे बुलाते। ये इल्ज़ाम सर जो लगा जा चुके हो, अगर सच पता होता, आ तुम मनाते। वफ़ा की कसक सिर्फ़ तुमको नहीं है, नहीं पास हो वरना गाकर सुनाते। मिला तोहफ़ा है, ख़बर सबको होती, खिली धूप में फूल रख गर सुखाते। सितमगर कहा है तो मालूम होगा, अदब से सितमगर नहीं पेश आते। ©लवी द्विवेदी

ग़ज़ल ©लवी द्विवेदी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  हमारे पास अच्छा घर नहीं है। हमें ज़िल्लत ज़बीं का डर नहीं है। निकलते पाँव हो बेखौफ़ बाहर,  शुकर है एक भी चादर नहीं है। तुम्हारा शौक़ है अन्दाज़-ए-उल्फ़त,  तुम्हे लगता लगी ठोकर नहीं है। वफ़ा को कर दिया बाजार जिसने, वो शातिर घर में है, बाहर नहीं है। इसे बाहर कहीं मदफ़न में ढूँढों, मेरा दिल अब मेरे अन्दर नहीं है। अदब से आदमी कमतर है, बेशक, ज़ुबाँ से कोई भी कमतर नहीं है। तन्हाई को बनालो जीस्त "संज्ञा", जो पीछे चल सके लश्कर नहीं है। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

चामर छंद- लेखनी ©लवी द्विवेदी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी छंद-  चामर चरण- ४(चार चरण समतुकांत) मात्रा- २३ वर्ण- १५ विधान रगण जगण रगण जगण रगण  भाव भृंग भावना विचार सार लेखनी, रम्य ओज वाहिनी स्वराग तार लेखनी। भव्य मालिका प्रमाणिका प्रकार लेखनी पीत, श्याम ,गौर वर्णिका तुषार लेखनी। गीत प्रीत रीति भीति मुक्त द्वार लेखनी, नेह पार्थ मित्र कृष्ण रश्मिहार लेखनी। ओज अद्विका विभिन्न व्यंगकार लेखनी, गीतिका सुजीत वीथिका विहार लेखनी। दर्श हर्ष वर्ष पर्व पूज्य वार लेखनी, प्रेम भावना प्रवीणता अपार लेखनी। प्रीति व्यंजना विशेषता विचार लेखनी, नौमि ईश रिक्त वंदना पुकार लेखनी। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

मेरे कविवर ©लवी द्विवेदी

  आज दुखी कविता ने देखा,  मुझसे कहती कहो छुआ क्या। चाह रहे थे अंबर छूना, अंबर तेरा नहीं हुआ क्या? पहले हर क्षण अंबर छूकर, तुमने अपने पंख पसारे।  अब जब उड़ना सीख चुके हो, फिर क्यों बैठे हारे हारे।  क्यों अंतस में है कोलाहल ? मेरे कविवर। तुमने मेरा वरण किया था,  तब से गेह तुम्हारे बैठी। मन मस्तिष्क कुँवारे थे जब,  उस क्षण हो रतनारे बैठी।  नई वधूटी जो जो करती,  मैने नित नव रचना की थी।  नित्य नए सृजनानंदों में,  नाम तुम्हारे की थी वीथी।  पर तुम ही हो बैठे घायल, मेरे कविवर।  यशोगान, सम्मान, प्रतिष्ठा, क्या क्या तुमको नहीं दिलाया। हर क्षण मान प्रतिक्रिया ने तो, नहीं कदाचित गरल मिलाया? क्षण क्षण दुर्बल होते जाते,  ऐसा क्या विषपान कर लिया।  नहीं रह गई कोई आशा,  कितना संयम अंक भर लिया।  या फिर हार गया है संबल, मेरे कविवर।  नहीं चाहिए मान तुम्हे अब, मुझको तुम बस पढ़ना चाहो।  कभी कभी अँधियारा पाकर, थोड़ा सा ही रचना चाहो... लेकिन नहीं रचा जाता है,  जाते छोड़ अधूरी रचना। कहीं दूर बैठी रचना को,  गाती न...

छंद ©लवी द्विवेदी

बाँवरी विभावरी वियोग प्रेम अश्रु धार,  पादुका पखार आस आसनी दई तुषार। तर्जनी ललाम श्याम डोलती करे विहार, पंख मौर सौम्य देख वक्ष हर्षिता अपार।  डोलते अनेक प्रश्न किन्तु शिल्पजा विहीन,  कंज रूप लुप्त प्राय हस्त, पंखुड़ी विलीन।  वाग वंदिता अचार्य हास्य मंत्रणा प्रवीन,  चंचला अपार किन्तु बैन श्याम को महीन। वक्ष वाग हो अधीन भावना रही हिलोर,  पूछती विनम्र कल्पना लजा रही चकोर। भाव भंगिमा सप्रेम प्रेम पाश प्रेम डोर, प्रश्न ले प्रमोद नाचते अनेक ओर छोर। चाल वक्र, ढाल वक्र, मोर पंख वक्र वाम, नाम वक्र, बाँकुरे किशोर साँवरे प्रणाम।  श्याम रंग, श्याम केश, श्याम नैन, श्याम नाम, श्याम बैन देख देख जीय ना रिझात श्याम? ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

सपना ©लवी द्विवेदी

 घर में भीषण आग लग गई जो बुझने का नाम ही नहीं ले रही थी और उसमें ऊपर से इस गर्मी की मार.. धूप की भयंकर तपिश और उस अग्नि ने इतना भयंकर रूप ले लिया था कि मानो सब कुछ जलकर राख हो जाएगा..... सब इधर उधर भाग रहे थे.... चीखते चिल्लाते रोते सिहरते.... कई घंटे इसी मंजर में बीते.... फिर अचानक मेरी नजर आसमान की ओर पड़ी जैसे वो मुझे कह रहा हो कि कुछ देर रुको सब ठीक हो जाएगा..... मैंने उसकी एक न सुनी बस रोती रही सब जलता देख.... कुछ देर बाद अचानक से आसमान का पीला रंग सफेद होने लगा.. मैंने फिर ध्यान नहीं दिया बस घटनास्थल का मंजर देख ही रही थी कि कुछ धीरे धीरे हवाएं चलकर मेरे पास आ मेरे बहते पसीने को शीतलता देते हुए धीरे से कान में बोली...मत रो...... मैंने फिर भी ध्यान नहीं दिया.....बस एकटक देखती सिहरती जा रही थी.. धीरे धीरे आसमान का सफेद रंग पूरा काला हो गया.... हवाएं और तेज चलने लगी जैसे मुझे बहलाने की कोशिश कर रहीं हों...लेकिन मैं उस ओर ध्यान ही नहीं दे रही थी क्योंकि उन हवाओं की ये बेखयाली उस आग को और फैलने में मदद कर रहीं थी....... तभी अचानक बादल गड़गड़ा उठे..... जैसे उन्हें मेरा यह व्यवहार प...

प्रतीक्षारत ©लवी द्विवेदी

  प्रतिदिन की प्रेम पिपासा, निज की निज को अवगत है। मन म्लान हृदय की पीड़ा, कल थी आहत, आहत है।   तटबंध तोड़ आती नित, लहरे उछाह भरती हैं।  क्रंदन निष्ठुर तृष्णा की,  हिय ओर छोर फिरती हैं। एकांत निलय में निशदिन,  भरती हुँकार प्रत्याशा।  अधरों की स्मित डोले, खेले नैनों में आशा।  हैं किन्तु बाण भेदी सर,  बहु चले हुए वर्षों के।  नासूर हुए तन-मन सब, हैं छले हुए वर्षों के।  पर, प्रेम लुटाते आए, चाहे हो लुटिया फूटी। पर का जूठन व्यंजन है, निज की मचिया, पर टूटी।  निज जब परहित की आशा,  निज ही चाहे, निज मरकर।  निज स्वार्थ दिखेगा पर को,  चाहे जाएँ तन तजकर। हैं किन्तु प्रेम जिन निज के, निज ना होकर परहित ही। क्षण क्षण तोड़ेंगे आशा,  परहित के हित निश्चित ही। निज मान स्वयं का खोकर, अपमान घृणा घट पाए। वो क्यों संगम अब चाहें, जो संयम रख मर जाए। जो हृदय प्रहत वर्षों से, आशा नित ले संतत हैं। वो नैन प्रतीक्षारत थे, वो नैन प्रतीक्षारत हैं। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

ग़ज़ल ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी बहर- बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन २२१ २१२१ १२२१ २१२ लिक्खा हसीन आसमाँ जब जब कही ग़ज़ल, हमने तो चाँद टाँक के हर दिन बुनी ग़ज़ल। वो जो गए हैं ढूँढने महताब में निशां, खोजें, जमीं पे चाँद ने कितनी लिखी ग़ज़ल? ला 'इल्म, कैसे वो गिने सिक्के नसीब के, शौकत चुरा न ले ये कोई, सोचती ग़ज़ल। ताउम्र कैद में रहे खामोश लफ्ज़ जो, होकर रिहा न कह सके सच, मर गई ग़ज़ल। महफ़िल सजी तो क्या सजी? हों गर जहीन सब, इक सरफिरे अदीब को बस ढूँढती ग़ज़ल। काँटों की फ़ितरतें 'लवी' इस कदर हैं छिपी, फूलों को ना ख़बर हुई कैसे चुभी ग़ज़ल। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

हिन्दी ©लवी द्विवेदी

 है हिंदी नमन प्रथम तुमको।। रस छंद अलंकृत शोभा तुम,  तुम स्वर रामायण गीता हो।  तुम अविरल मधुर मनोहरतम,  वर्णो की प्रथम पुनीता हो। हो चार चरण की प्रतिभा तुम,  दो समतुकांत लयबद्ध गीत। लघु गुरु भाई, सरिता सी यति,  रूपक का जैसे यमक मीत। गति रुष्ठ कभी ना हो पाती,  है ज्ञात रोष में नम तुमको।  है हिंदी नमन प्रथम तुमको।। सोलह मात्रा चौपाई में,  गण आठ गिनाए सुंदरतम। मनभावन दोहा नृत्य गान, सोरठा सुजान मनोहरतम। कुंडलिया छप्पय उल्लाला,  अनुप्रास छटा दर्शाती है। चामर, प्रमाणिका, तोटक लय,  जब सरल सिंधु हो जाती है,  तोमर, भुजंग, कृति नमन करे... ब्रज, खड़ी, बघेली, क्रम तुमको। है हिंदी नमन प्रथम तुमको।।  तुम शिल्प काव्य तुम चंदन सम, तुम शिलालेख तुम पत्र रूप। तुम शब्द समागम सुंदरता हो तुम अजेय अनुपम अनूप। तुम सभ्य शिल्प में रमीं हुई,  तुम रूप अलौकिक माता हो। व्यंजन के क्रम में सधी हुई स्वर की स्नेहिल दाता हो। हे भाषा भाव धारिणी माँ,  मैं मानू श्रेष्ठ परम तुमको।  है हिंदी नमन प्रथम तुमको।।     ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा

कविता- विहीन ©लवी द्विवेदी

नमन, माँ शारदे   नमन लेखनी  छंद -पद्धरि छंद (सम मात्रिक ) चरण - चार, मात्रा -१६ यति १०,६ या ८ ,८  चरणांत जगण( । ऽ ।  ) हिय पीर करे, कब तक विहार।। आकाश द्रवित रुग्णित समीर, घन करुण नाद हिय कर्ण भीर। तारक गण क्षण क्षण हों अधीर,  शशि का वियोग दे हृदय चीर।  आभा कुरूप संयम कुठार,  दामिनी व्यग्र करती प्रहार। पीड़ा कठोर दे अंधकार, भीरुता कौन देखे अपार। हिय पीर करे कब तक विहार।। तम वक्ष दीप्ति बिन है विहीन, घृत शुष्क मौन बाती महीन।  पीड़ा अभिलाषा में विलीन,  हो कब विहान प्रात: नवीन। मस्तक रेखाएं द्वार द्वार,  बन भिक्षु लगाती हैं गुहार,  प्रिय प्राण दीप रह गृह बिसार,  दीपक प्रशमन करते बयार। हिय पीर करे कब तक विहार।। रुग्णित धमनी में रक्त व्यग्र  प्राणों की प्रत्याशा समग्र।  केंद्रित होकर एकांत अग्र,  मन ले विचार दे छोड़ नग्र। हिय के समीप जन के विचार,  यदि प्रेम समर्पण दें नकार।  कर देय तिरस्कृत पिय पुकार। निश्चित है अंतिम संस्कार।  हिय पीर करे कब तक विहार।। ©लवी द्विवेदी 

पग धूल ©लवी द्विवेदी

 भटककर आ रही हूँ द्वार तेरे हरि शरण दे दो। मुझे बस चाहिए पग धूल, मृण में आवरण दे दो।। मुझे ना श्वास की आशा न आशा आत्म तर्पण की,  न तुझसे चाहिए ऐश्वर्य, वैभव, डोर तोरण की।  पखारूँ अश्रुओं से पग प्रभू अपने चरण दे दो।  मुझे बस चाहिए पग धूल, मृण में आवरण दे दो।। कृपालू श्वास मेरी रुँध रही वातावरण कैसा?  मुझे पहचानने में देर क्यूँ इसमें कृपण कैसा?  प्रभू इतना करो बस व्यय प्रणय के आभरण दे दो।  मुझे बस चाहिए पग धूल, मृण में आवरण दे दो।।  विदारण भक्ति होती जा रही जीवन मरण रण में,  तुम्हारी वेणु के स्वर कर्ण तक आते न विचरण में।  प्रभू मेरे दृगों को हरि दरश के जागरण दे दो। मुझे बस चाहिए पग धूल, मृण में आवरण दे दो।। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

कविता - साक्ष्य ©लवी द्विवेदी

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  दीप्ति निष्ठा सँग प्रवाहित हो रही सत्यार्थ पथ पर,  मौन तज कर प्रज्ज्वलित क्या हो सकेगी गीतिका भी।  आज से आरम्भ हो या अंत अविरल अर्घ का हो,  नित्य नूतन की पिपासा क्या सहेगी? वीथिका भी।  सेतु स्वर्णिम जो हुआ था राम युग में पत्थरों से,  क्या वही सागर सहेगा युग पुनः दृढ़ मेरु पथ को।  सर्व सुरभित सत्य सरिता शब्द के आवागमन में,  क्या महाभारत की गीता दे सकेगी लक्ष्य रथ को।  और क्या होगा प्रवाहित फिर रुधिर उर धमनियों में,  क्या पिपासा विरहिणी अब शांत होगी क्षण वलय में।  शोर खग का क्या पुनः, अम्बर विभा में लीन होगा?  क्या अतिथि सत्कार होगा ?या कसक होगी निलय में।  भूप क्या संघर्ष को ही चेतना का सार देगा,  या निरंकुश हो रहे सनमार्ग को साहस मिलेगा।  क्या शिथिलता सारगर्भित प्रष्ठ पर हँसकर मिलेगी,  क्या प्रशंसा शब्द धारक रोष आशंकित तजेगा।  सर्व बाधित भावनाओं का पुनः पाषाण बनकर,  दृढ़ नियति ने तुंग पथ को सारगर्भित कर दिया है।  हो भले जनहित में शासक संशयों की दीर्घा में, ...

कवि विहंग ©लवी द्विवेदी

 अक्षर भी साथ नयन की ज्योति तूलिका,  आ बैठ बिछा नव शब्दों के आसन को।  कछु निरख कछुक पुनि भाव लिये गगरी में,  उर कवि विहंग बन चला प्रकृति दर्शन को।  हो घोर तिमिर अल्हण भावुक रजनी से वो घूमा हास्य मधुप मदिरा के मद में,  थे ठाठ कहीं था रुदन अकिंचन विस्तृत,  देखा जग में लघु दीर्घ विचारक पद में।  वो बैठ अकेले पकड़ शांति प्रिय कोना,  हो लिया कभी बृह्मण्ड कभी धरणी पर।  हो बाग-बाग दौड़ा पोखर सागर क्षण,  आ लौट गिरा कछु व्यथित व्यग्र करणी पर।  ले प्रश्न परस्पर प्रीत भरे उत्तर हों,  थी खूब कल्पना प्रभु का वर्णन कीन्हा।  कछु बिछरे आंगन डोल गए कछु आसित,  कछु दारुण दुख कर्तव्य विमुख कर दीन्हा।  भावों की भेंट अनन्य रूप शब्दों से,  पर तनिक विचारे हो का भ्रांति  निराशा।  थे मिले बहुत संगी पर संगिनि कविता,  है एक कवी क्या कुल उसका क्या आशा।  ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

पञ्चचामर छंद ©लवी द्विवेदी

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  छंद- पञ्चचामर चरण- 4( समतुकांत)  वर्ण- 16 मात्रा- 24 जगण रगण जगण रगण जगण+S ISI SIS ISI SIS ISI S प्रभू किशोरचंद्र वृंद वन्दना करूँ हरे,  नमामि राधिका नमामि नंदना करूँ हरे।  सुवर्ण भाँवती समेत कल्पना करूँ हरे,  शिरोमणी हरी प्रणाम अर्चना करूँ हरे। सुधा स्वरूप रूप श्याम वेणुधारि वृंद हैं,  वही सुकाम नंदलाल व्योम प्रेम नंद हैं। सनेह माधुरी वही प्रभा शुभा प्रकंद हैं,  वही विराट शैल, वो प्रवाह मंद मंद हैं।  नमामि वल्लभं नमामि माधवं हरी नमो,  नमामि नंदनं नमामि केशवं हरी नमो।  नमामि कृष्णकांत रूप राघवं हरी नमो, नमामि प्रेमवृन्द श्याम अल्पवं हरी नमो। ©लवी द्विवेदी 'संज्ञा'

ग़ज़ल ©लवी द्विवेदी

बहर बहरे रमल मुसम्मन सालिम फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन  2122 2122 2122 2122  आस मुज़रिम यार हो जब ख़्वाहिशे भी रूठती है,  कोशिशों के दौर में याँ ज़िंदगी भी लूटती है।  हम नही क़ाबिल, हमारी हैसियत क्या आज जानें,  आख़िरी उम्मीद भी होकर अना घर ढूँढती है।  जिक्र है, बे-रब्त है, फिर भी यकीं बेज़ार है क्यों?  रम्ज़ अक्सर रार सहकर बेतहाशा कोसती है।  लुत्फ़ इशरत का फ़रेबी, खैर जाने दो यहाँ से,  हम तकल्लुफ़ क्यूँ उठाए, बेकरारी रोकती है।  आज हम नादाँ नहीं जो बंदिशों को आजमा लें,  फ़िर यहाँ पर कैद हो क्यों आजिजी गम जोहती है।  देख ये राहत, किताबें पढ़ रही जो आब हैं क्या?  इल्म है फिर भी गुमाँ है, जख़्म हैं वो शरबती है।  ©लवी द्विवेदी

गीत- प्रतिकार ©लवी द्विवेदी

 कितनी उलझी, तब असमय आक्रोशित हो,  शांत निलय अपना डमरू स्वर लेती है।  कर एकत्रित कवि द्वारा अनदेखे क्षण,  कविता भी प्रतिकार ग्रहण कर लेती है।  जब चाहा नव विकसित रचना रच डाली,  जब समसि शब्द संचार हृदय में होता है।  शिरा शिरा विचलित होती विचलित तन मन,  तब पृष्ठों पर विस्तार विषय में होता है।  मौन शांत हो आ तो जाती नव जग में,  किंतु वचन प्रतिभा जब क्षण भर लेती है कविता भी प्रतिकार ग्रहण कर लेती है।  सुख में मुदित हृदय वाली प्रमुदित कविता,  असहनीय दुख में दुविधा की छवि रोचक।  अमिट प्रमादी शब्द शब्द से निकल विकल,  कभी कठिन क्षण विस्मय नेत्र निलय अपलक।  भावों के भंडार किंतु बैरी मन से,  जब जब तृष्णा प्रेम प्रणय हर लेती है,  कविता भी प्रतिकार ग्रहण कर लेती है।  विचलित मन वाले पंथ हीन प्रेमी कवि से,  वो असमय विलग मूक पथ को अविरल पाती।  कविता वो करुण पिपासा है जो निश्छल है,  किंतु दंभ के चलते स्वयं छली जाती।  जब मिलता नहीं कवितवर से मन शब्दों का,  शंका के चुन चुन रख कंकर लेती है।...

दिवस ©लवी द्विवेदी

 निष्ठुर भी होते हैं, दारुण होते हैं। दया, कुशलता, निश दिन ढांढस ढोते हैं। किन्तु हृदय की असहनीय पीड़ा लेकर, दिवस विवश एकांत निलय में रोते हैं। संघर्षों की माला नित दृष्टांत नवल, नित नूतन क्यारी मृदु युक्त पुष्प कोमल। किन्तु विलग रस हीन पुष्प उच्छिन्न प्राय, याम व्याल संग लिपटे ज्यों शीतल संदल। असमंजस अध्यात्म हृदय के कण कण में, विह्वल श्वास अरण्य सघन उत्तर प्रण में। विषधर व्याप्त शीत चंदन उर यमुना यदि, वार मृत्यु को पाते दंश उरग रण में। शील हुए निर्मोही भी दिन बहु भ्रामक, निरख निरख अन्याय, विलग दुविधा कारक। श्वेत वर्ण के सुख दुख अधम छद्म रण में, विजय पताका किंतु संग रक्तिम सायक। ये कैसा पर्याय नियति के आँगन में, सरगम है यदि, नहीं श्वास क्षमता तन में। दिन प्रतिदिन ही ज्ञात अपरिचित होते है, मित्र कुशल दारुण, गुण अवगुण जीवन में। © लवी द्विवेदी