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लघुकथा - प्यार दोस्ती है ©शैव्या मिश्रा

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी   प्यार दोस्ती है, अक्सर मेरी इन तन्हा रातों को तुम्हारी कही हुई ये बात और भी तनहा करती है रेहान। यूँ तो तुमसे जुड़ी हर बात मेरे ज़ेहन किसी फ़िल्म के फ़्लैशबैक जैसी चलती ही रहती है मगर एक जगह जहाँ आकर मेरी रील अटक जाती है जब तुमने अपनी मुहब्बत का इज़हार किया था, तुमने मेरे माथे को चूमते हुए मुझसे वादा किया था कि एक दिन तुम मुझे हमेशा के लिए अपना बना लोगे!  पर अफ़सोस रेहान ये वादा तो वादा ही रह गया। मैं तुमको क़सूरवार ठहराने से पहले ये साफ़ कर देना चाहती हूँ, मैंने जिस दिन से तुम्हें चाहा था, उस दिन से ये भी जाना था, मेरा और तुम्हारा मिलना, एक हो जाना केवल दुनिया में तमाम तरह की रुसवाइयाँ ही लाता, ये भी कि ये जो तुम्हारी और मेरी हैसियत का फ़ासला था उसे नाप पाना हमारी मुहब्बत के लिए लगभग नामुमकिन था।  कहाँ मैं खान इंडस्ट्रीज के मालिक राशिद ख़ान की इकलौती बेटी कहाँ तुम एक मुलज़िम के बेटे। ये सब जानते हुए भी मुझे तुमसे इश्क़ हो गया। मेरे वालिद को भी तुम्हारे हुनर, तुम्हारी क़ाबिलियत का अन्दाज़ा था, इसीलिए बचपन से ही उन्होंने तुम्हें हमारे स...

कहानी- "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी" ©शैव्या मिश्रा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी, अभी तो यहीं था किधर गया जी" निशा ने अपने अलिंगन में बंधे अविनाश के कान में गुनगुनाया। अविनाश ने धीरे से उसके माथे को चूम लिया।  “अवु आज गाना पूरा नहीं करोगे क्या?“ अचानक अविनाश को ख़ुद से अलग करते हूए निशा ने गहरी आवाज़ में पूछा?   "किसी की आदाओं पे मर गया जी, बड़ी बड़ी अंखियों से डर गया जी।" निशा ने हँसते हुए कहा तो अविनाश अचकचा-सा गया। उसने जब निशा को देखा तो उसकी चीख निकल गई और भागते हुए कमरे से बाहर आया, पीछे से उसके कानों में निशा के हँसने की डरावनी आवाज़ आती रही। कमरे से बाहर आकर भी वो चीखा, "ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा नहीं हो सकता!" उसकी आवाज़ सुन कर उसके घर वाले भी दौड़कर बाहर आ गये!  शादी का घर था। घर रिश्तादारों से भरा पड़ा था, आज ही निशा और अविनाश की शादी हुई थी। कुछ देर पहले ही विवाहोपरान्त होने वाली सारी रस्में निपटा कर दुल्हन को कमरे में बिठाया गया था। अविनाश भी आज के लिए अति उत्साहित था! हो भी क्यों ना, निशा बिलकुल परियों के जैसी ख़ूबसूरत थी, उसका दूध में केसर-सा घुला गोरा रंग, बड़ी-बड़ी काली...

कुछ बातें ©शैव्या मिश्रा

चंद बातें कही नहीं जाती,  बिन कहे भी रही नहीं जाती l कोरे काग़ज़ पे ये लिखीं नज़्मे... हर किसी से पढ़ी नहीं जाती l रोज़अखबार देख लेते हैँ..  क्या करें तिश्नगी नहीं जाती l अब्र धरती पे बरस पड़ते हैँ..  दूरियाँ ज़ब सही नहीँ जाती l पंख टकरा के बिखर जाते हैँ  अब उड़ाने भरी नही जाती l                      ©शैव्या मिश्रा

लालच ©शैव्या मिश्रा

 "रात के दो बजे कौन फोन कर रहा, श्यामली ने गुस्से से बड़ बड़ाते हुए अपने मोबाइल की स्क्रीन पे देखा, " "मृणालिनी दी", तमाम आशंकाओं से उसका दिल तेज़ी से धड़क उठा, पता नही क्या बात हो..  फोन कट चुका था, श्यामली ने भगवान को याद करते हुए फोन मिलाया.  " हैलो, श्यामली सो गयी थी क्या? " "और रात को तीन बजे क्या करूँगी दी, " श्यामली ने संयत स्वर मे कहा, दी की आवाज़ से उसे लगा नहीं कोई अनहोनी हुई हो. "सॉरी श्यामली, अभी तक मुझे अमेरिका और इंडिया के टाइम का अंतर याद नहीं रहता, पर बात ही कुछ ऐसी है कि मुझे तुझे फोन करना ही पड़ा, सुन तुझे माया आंटी याद हैं? " "माया आंटी, हाँ उन्हे हम कैसे भूल सकते हैं, क्या हुआ उन्हे? " मैंने पूछा. श्यामली माया आंटी की तबियत काफी खराब है, शायद बस एक या दो दिन की मेहमान हैं, तुझे याद कर रही." दी ने रुक रुक कर कहा. "मुझे क्यों याद कर रहीं इतने सालों बाद, उनका मुझसे क्या लेना दी? "मैंने थोड़ा हैरान होते हुए कहा. " श्यामली, तुझे याद नहीं बचपन वो तुझे कितना चाहती थी? और माँ के मना करने पर भी, ...

महुआ ©शैव्या मिश्रा

 महुआ ने आज कितनी कोशिश करी थी स्कूल से जल्दी निकलने कि किंतु कापियाँ जांचने मे देर हो गयी! "उफ़ अभी साढ़े 6 ही बजे हैं लेकिन घुप्प अंधियारा हो गया है, कातिक मे मुआ सूरज भी जल्दी छुप जाता है!" महुआ हाथ मे बंधी घड़ी देख कर बड़बड़ाई! महुआ पास के गाँव मे पढ़ाती थी, इतनी मुश्किल से मिली नौकरी छोड़ भी तो नहीं सकती थी, गृहस्थी की गाड़ी, भाई की पढाई और लकवाग्रस्त पिता का इलाज छोटी सी उमर मे ना जाने कितना बोझ था उसके कंधों पे! खुशी की बात ये थी कि भाई की पढाई भी अब पूरी हो चली थी, जल्दी ही उसकी नौकरी लग जायेगी। फ़िर वो भी मधुसूदन से ब्याह कर पायेगी, पिछले तीन साल से उसका इंतज़ार कर रहा, सोचते-सोचते उसके गाल लाल हो उठे!  अपनी सोच मे गुम वो कब घर पहुंची, पता भी ना चला, घर मे पैर रखते ही माँ फट पड़ी, "कहाँ रह गयी थी बिटिया, हम कब से राह देख रहे थे, कान्हे इत्ती देर कर दी? तोहे पता है, आज तो मुई चिरैय्या, हमाए छज्जे पे बोल रही थी, हमार कालेज तब से धुक धुक कर रहा, जाने किसको खाने आई है ये मुई, " उन्होंने घबराये स्वर मे कहा।  "लगता है.. हमार. बुल्लवा ..आया है, खाट पर पड़े पित...

श्राद्ध ©शैव्या मिश्रा

 माँ तुम जानती हो, मुझे बाबू जी से कोई प्रेम नहीं है, मुझे नहीं करना उनका श्राद्ध, मैंने गुस्से मे चीखते हुए लिफ्ट मे प्रवेश किया।  लिफ्ट मे एक बेहद खूबसूरत सी युवती लिफ्ट की दीवार से टेक लगा कर खड़ी थी, मेरी तेज़ आवाज़ से वो मानो चौंक सी उठी। पीले सूट मे लाल चुनरी वाले दुपट्टे मे बेहद खूबसूरत लग रही थी वो, सच कहूं एक पल के लिए मैं भूल ही गया की मैं फोन पर माँ से बात कर रहा हूँ। "बेटा सुन तो, दूसरी तरफ से माँ की आवाज़ ने उस खूबसूरत तिलिस्म को तोड़ा, जो इस लाल दुपट्टे वाली ने बाँध रखा था। " वैसे भी जीवन भर बाबूजी से मेरी नहीं बनी, यकीन मानिए आज भी मेरा दिया पानी वो स्वीकार नहीं करेंगे, और मुझे इसके आगे कोई बहस नहीं करनी, कह कर मैंने फोन काट दिया।  "अापको अपनी माँ से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी, कानो मे शहद घोलती सी एक आवाज़ आयी, सॉरी मुझे आपको ऐसे टोकने का कोई अधिकार नही, पर मुझे अच्छा नहीं लगा। उस लड़की ने सहज भाव से कहा। मेरे कुछ कहने से बोली, हाय, मेरा नाम प्रिया है, मैं इसी बिल्डिंग के बराह्वी फ्लोर पर रहती हूँ। हाय आइ एम् प्रवेश, अभी हाल ही में नवी फ्लोर के फ्लैट नंबर...