लघुकथा - प्यार दोस्ती है ©शैव्या मिश्रा
नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी प्यार दोस्ती है, अक्सर मेरी इन तन्हा रातों को तुम्हारी कही हुई ये बात और भी तनहा करती है रेहान। यूँ तो तुमसे जुड़ी हर बात मेरे ज़ेहन किसी फ़िल्म के फ़्लैशबैक जैसी चलती ही रहती है मगर एक जगह जहाँ आकर मेरी रील अटक जाती है जब तुमने अपनी मुहब्बत का इज़हार किया था, तुमने मेरे माथे को चूमते हुए मुझसे वादा किया था कि एक दिन तुम मुझे हमेशा के लिए अपना बना लोगे! पर अफ़सोस रेहान ये वादा तो वादा ही रह गया। मैं तुमको क़सूरवार ठहराने से पहले ये साफ़ कर देना चाहती हूँ, मैंने जिस दिन से तुम्हें चाहा था, उस दिन से ये भी जाना था, मेरा और तुम्हारा मिलना, एक हो जाना केवल दुनिया में तमाम तरह की रुसवाइयाँ ही लाता, ये भी कि ये जो तुम्हारी और मेरी हैसियत का फ़ासला था उसे नाप पाना हमारी मुहब्बत के लिए लगभग नामुमकिन था। कहाँ मैं खान इंडस्ट्रीज के मालिक राशिद ख़ान की इकलौती बेटी कहाँ तुम एक मुलज़िम के बेटे। ये सब जानते हुए भी मुझे तुमसे इश्क़ हो गया। मेरे वालिद को भी तुम्हारे हुनर, तुम्हारी क़ाबिलियत का अन्दाज़ा था, इसीलिए बचपन से ही उन्होंने तुम्हें हमारे स...