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ग़ज़ल ©धीरज दवे

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी 2122 2122 212 आख़िरी उम्मीद तेरे नाम पर , और फिर अपना भरोसा राम पर। इक तुम्हारी ओढ़णी के वास्ते , सब सितारे झुक गए हैं बाम पर। नींद भी है याद भी है जोश भी , और कितना बोझ डालूं शाम पर। एक इंसाँ के सिवा कुछ भी नहीं , बिक रहा है कौड़ियों के दाम पर। इश्क का इल्ज़ाम गर है आपसे, नाज़ क्यूँ ना हो हमें इल्ज़ाम पर। दिख रही हैं आप खाली ग्लास में , लग गया है जाम अपने काम पर । ©धीरज दवे

तुम्हारा साथ ना छूटे ©धीरज दवे

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी बाद बरसों के लिखा इक खत तुम्हारा मिल गया है जिसमें सबकुछ है दुआ है बद्दुआ है अलविदा है रुक गया हूं एक पंक्ति पे हृदय में भरभराकर पूछती हो तुम जहां कि क्या करोगे दूर जाकर तो सुनो ये बात मन की, बात ना फूटे  पुण्य संचित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे  डूबता हूं मैं मगर अब तार देता हूं जगत को गर सही को ओढ़ भी लूं साथ रखता हूं गलत को भेद कुछ करता नहीं हूं वेदना में प्रेरणा में अब किसी को कुछ भी मैं कहता नहीं हूं व्यंजना में धर्म पोषित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में  हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे मैं कि पीड़ा को बना कर गीत गाता जा रहा हूं झेल कर पत्थर जगत से भी बहुत इतरा रहा हूं शत्रुओं से बैर कैसा प्रीत कैसी मित्रता में दुख ही सुख है सुख ही दुख है गुनगुनाता जा रहा हूं दैव योजित कर रहा हूं मैं कि अब अगले जनम में  हाथ ना छूटे तुम्हारा साथ ना छूटे मैं गगन से टूट कर भी आ गिरा हूं फिर गगन में बन गया हूं ईश अपना आ गया अपनी शरण में फूंक कर के कामनाएं मार कर हर इक पिपासा मैं चमकते नेत्र ले कर चल रहा हूं अधम...

ग़ज़ल ©धीरज दवे

 नमन, माँ शारदे नमन लेखनी इतना मुश्किल भी नहीं बात समझना मेरे दोस्त, दिल जो घर है तो निगाहें भी है रस्ता मेरे दोस्त। एक मुद्दत से तिरा नाम नहीं होंठों पे, कितना आसां है मिरा प्यास से मरना मेरे दोस्त। रोज़ होते हैं सितम रोज़ दुआ होती है, रोज़ बनता है मिरे दिल का तमाशा मेरे दोस्त। लोग तो अब भी मुझे तेरा सनम जानते हैं, अब भी होता है तिरे नाम से झगड़ा मेरे दोस्त। मुझको गाना है तरन्नुम में तुझे शाम कि शाम, तू भी बेचैन मुझे रोज़ ही करना मेरे दोस्त। राह में मिल भी गए तो न नज़र फेरें हम, ये भी होता है बिछड़ने का सलीका मेरे दोस्त। आँख जब टूटते तारों में अटक जाती है, याद आता है कोई हाथ से छूटा मेरे दोस्त। ©धीरज दवे