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कहानी- तस्वीर ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी "एक किताब ने हिलाकर रख दिया पूरा शहर।" सभी न्यूज़ चैनल इसी खबर से भरे पड़े थे। और हों भी क्यों न? किताब ही ऐसी थी। "बेस्ट सेलर तो यही होगी" आम आवाम में बस यही बातें चल रहीं थी। दीन दयाल जी, उस किताब के लेखक, रातों रात प्रसिद्ध हो गए। दीन दयाल जी हमेशा से एक उम्दा लेखक रहे हैं मगर उनकी प्रतिभा लोगों तक पहुँच नहीं पाई। जीवन के पैंसठ सावन बीत जाने के बाद उन्हें ये प्रसिद्धि मिली जिसकी उन्हें हमेशा से आशा रही थी। किन्तु कहा जाता है न, असल हुनर दबा दिया जाता है, कुछ वैसा ही हाल यहाँ था। लेकिन इतनी प्रसिद्धि पाने के बाद भी वे उदास थे। जाने क्या बात रही होगी, किसी को मालूम नहीं था। सिर्फ़ उस बूढ़े लेखक का दिल ही जानता था। "रातों रात प्रसिद्ध हुए हैं, ज़रूरी तो नहीं अच्छे लेखक हों। इनका इंटरव्यू लेने की जगह और कुछ बेहतर शूट न किया जाए?" रिपोर्टर वाणी जी अपने चैनल के दफ़्तर में अपने सीनियर को बार-बार दीन दयाल जी का इंटरव्यू लेने से मना कर रही थी। "नहीं वाणी, इस बूढ़े ने शहर हिला दिया है। बढ़िया, गरम गरम खबर है। दुनिया को बेहतर खबरों से ज्यादा...

गीत- गंगा तट ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी विधा- गीत शीर्षक- गंगा तट छिपे हुए हैं तट गंगा के, माता के आलिंगन में। अश्रु कणों का रिमझिम करता, भीगा सावन आया है, गरज दामिनी ने अंतर का, कैसा द्वंद बताया है! स्वयं दुखी हैं या भीगे हैं, दुखी मेघ के क्रंदन में, छिपे हुए हैं तट गंगा के, माता के आलिंगन में। नवल पात ने उत्साहित हो, पादप को अपनाया है, शाखाएँ विस्तृत कर पादप भी कितना हर्षाया है, चारों दिशा हर्ष विसरित है, लेकिन क्यों दुख चिंतन में? छिपे हुए हैं तट गंगा के, माता के आलिंगन में। बढ़ती पीर नीर लहरों ने, अस्थिर चित्त बनाया है, भय से सहमे अस्थिर तट को, सूरज बदल न पाया है, लौट तटों की शांत शिथिलता, आएगी क्या जीवन में? छिपे हुए हैं तट गंगा के, माता के आलिंगन में। ©गुंजित जैन 

गीत- नीड ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी विधा- गीत आधार छंद- मुखड़ा, समांत सरसी छंद एवं अंतरा सार छंद सरसी छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२७,  यति - १६,११ चरणान्त - SI  विशेष – सरसी = चौपाई(१६) + दोहा का सम चरण(११) सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८,  यति - १६,१२ चरणान्त - SS   भोजन हित भटका जीवन भर, किन्तु मिला संताप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। छोड़ गया अपने परिजन को, नभ में पर फैलाने, क्षण-क्षण रहकर दिखते मन को, मुख जाने-पहचाने, स्मृतियों का विस्तृत अम्बर, नहिं पाता है नाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। नन्हे शिशु के मुख में दाने, डाल नहीं पाया है, चिंतातुर मजबूर पिता ने, हिय को समझाया है, कैसे पहुँचे इतनी ऊपर, नन्ही मृदु पद-चाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। व्याकुलता लेकर निज मन में, खग चिंतित रहता है, पीड़ा लिए अनंत गगन में, सूर्य ताप सहता है, झरते झर-झर अश्रु निरंतर, रवि से बनते भाप। नीड छोड़कर उड़ता नभचर, करता रहे विलाप। ©गुंजित जैन

कविता- जीवित ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी प्रेम प्रतीक्षा की धरती सिंचित आँसू से होती, आशा की अस्पष्ट किरण रह-रह विश्वास पिरोती, धूमिल किरणें लेकिन कब तक पोषण दे पाएंगी? बिना धूप के खिलती कलियाँ भी मुरझा जाएंगी, ज्यों ही काला मेघ, भयानक अंधकार का छाया, प्रेम तुम्हारा मुझमें मुझको जीवित रखता आया। पाकर किंचित किरणें, कोंपल कुसुमित तो हो आई, बनी विटप तब हिय के भीतर उठी व्यथा दुखदाई, श्वास-श्वास से पात झरे, कष्टों का पतझड़ आए, झरते बिखरे पत्तों से मन आँगन ढँकता जाए, पर्ण-पर्ण प्राणों के पादप का गिरकर अकुलाया, प्रेम तुम्हारा मुझमें मुझको जीवित रखता आया। बचते हैं यदि पत्ते पतझड़ के झंझावातों से, जीवन का पथ निर्मम करती अति दुष्कर बातों से, छद्म-वेश धारण कर तब रमणीय चिरैया आती, तीक्ष्ण बाण रूपी शब्दों में गीत सुहाने गाती, बैठ चिरैया ने पादप पर मृत्यु-गान ज्यों गाया, प्रेम तुम्हारा मुझमें मुझको जीवित रखता आया। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी 1222 1222 122 जो उसके गाल को छूते नहीं तुम, ऐ झुमकों खूब-रू उतने नहीं तुम। मेरी ख़ामोशी कैसे जान लोगे? मेरी इक बात तो समझे नहीं तुम। हर इक तरक़ीब को तुम जानते हो, खिलाड़ी हो कोई कच्चे नहीं तुम। मुहब्बत में मैं टूटा जिस क़दर हूँ, भला है उस क़दर टूटे नहीं तुम। मेरी महबूब के हाथों के कंगन, जुदा होने पे क्यों खनके नहीं तुम? मुहब्बत मिल गई तुमको, ख़ुशी है, मलाल इतना है के मेरे नहीं तुम। भला कैसे सुख़नवर तुम हो गुंजित? सियाही से अगर रोए नहीं तुम। ©गुंजित जैन

गीत- साँवरे न आए ©गुंजित जैन

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी दिन- मंगलवार दिनांक- 18/03/2024 विधा- गीत आधार छंद - कुंडल (सम मात्रिक ) चरण - 4 (दो -दो, या चारों चरण सम तुकांत ) मात्रा -22 यति - 12,10 यति के पूर्व, एवंम् पश्चात त्रिकल चरणान्त - SS (गुरु, गुरु ) कृष्ण-नाम प्रेमरोग, शब्द में सजाए, राधिका सहे वियोग, अश्रु को छिपाए, ले हिये प्रणय अपार, आस को लगाए, पंथ ताकती पुकार, साँवरे न आए। कृष्ण का सदैव ध्यान, राधिका लगाती, अन्य विश्व के विधान, सर्वदा भुलाती, शून्य भाव ले प्रकर्ष, 'कृष्ण-कृष्ण' ध्याती, बीतते अनेक वर्ष, श्याम को न पाती, शून्य हो रहे विचार, चित्त में बसाए, पंथ ताकती पुकार, साँवरे न आए। स्मरण सुरम्य तान, बाँसुरी बजैया, खोजती निशा-विहान, प्राण नंद-छैया, सर्वदा समस्त भाव, में रहे कन्हैया, झेल ना सके बहाव, नैन नाम नैया, मेघ तुल्य अश्रु धार, नैन से बहाए, पंथ ताकती पुकार, साँवरे न आए। वक्ष में लिए विषाद, हर्ष को बिसारी, गूँजती रही निनाद, ले गुहार भारी, पावनी विशुद्ध प्रीत, पूजती मुरारी, जीतने अनंतजीत, जग समस्त हारी, श्वास, प्राण को बिसार, कृष्ण को बुलाए, पंथ ताकती पुकार, साँवरे न आए। ©गुंजित जैन

कविता- पुकार ©गुंजित जैन

  छंद- पञ्चचामर मात्रा- 24, वर्ण- 16 दो-दो चरण समतुकांत जगण रगण जगण रगण जगण + गुरु ISI  SIS  ISI  SIS  ISI  S शीर्षक- पुकार विचार भिन्न-भिन्न चित्त की धरा लिखे गए, लिए नवीनता, मिटा परंपरा लिखे गए, क्षणोपरांत नव्य में नवीनता नहीं रही, परंतु वृक्ष-सी विशाल सभ्यता नहीं रही, सजा विशाल, भव्य वृक्ष स्वर्ण-वर्ण सीप से, जिन्हें कनिष्ठ हस्त में समेटता समीप से, अपूर्ण छोड़ जीर्ण स्वर्ण-हार, नष्ट हो गई, मुझे पुकारती हुई पुकार नष्ट हो गई। अनंत अंतरिक्ष सा विशाल, भव्य ताल था, प्रवाहमान नीर ज्यों, चलायमान काल था, प्रसूति एक छोर और मुक्ति एक कूल था, समीर का प्रचंड वेग हर्ष और शूल था, सहे असंख्य ज्वार-घात देह-नाव निर्मला, परंतु ज्वार का प्रहार घोर उग्र हो चला, हुई न नाव तीव्र धार पार, नष्ट हो गई, मुझे पुकारती हुई पुकार नष्ट हो गई। सुनी निनाद चित्त में उठी मुझे पुकारती, समस्त हर्ष-शूल प्राण के समेट धारती, अभिज्ञ था न काल के चढ़ाव से, उतार से, हुआ मुझे सुज्ञान आत्मचित्त की पुकार से, "करो न व्यर्थ देह को महत्वहीन भूल में, सदैव धूल की रही, मिली सदैव धूल में", बता विनाश-रूप सत्य ...

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

जो उल्फ़त में हारा नहीं है, किसी ग़म का मारा नहीं है। समंदर ख़यालों का उमड़ा, पर उसका किनारा नहीं है। कहाँ चल दिया शोर सुनकर, किसी ने पुकारा नहीं है। मुहब्बत भला क्या बला है? तज़र्बा हमारा नहीं है। बिना तेरे इस ज़िन्दगी में, हमारा गुज़ारा नहीं है। नज़र रोज़ तेरा चुराना, हमें कुछ गवारा नहीं है। ख़ुदा साथ सबके है 'गुंजित", कोई बे-सहारा नहीं है। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

  जान लुटाई यारों पर और सबसे नाता, अच्छा था, हाल मगर मेरा भी मुझसे पूछा जाता, अच्छा था। उनकी वो आँखें, वो लब, वो ज़ुल्फ़ यकीनन दिलकश हैं, लेकिन फ़िर भी उनका चेहरा याद न आता, अच्छा था। जितनी दूरी तक अंगूठे से बातें कर लेता है, उतनी दूरी तक इंसाँ बाहें फैलाता, अच्छा था। बचपन की गलती भी कितनी भोली-भाली होती थी, हर्फ़ कागज़ों पर लिखता, फिर उन्हें मिटाता, अच्छा था। राह देखना ख़त्म हो गया दूरभाष के दौर में आ, कोई डाकिया अब भी चिट्ठी भर घर लाता, अच्छा था। बढ़ते-बढ़ते ना जाने किस दलदल में आ उलझा हूँ, बच्चा ही रहता, मुस्काता, हँसता-गाता, अच्छा था। उनके हर इक ज़र्रे से ये दिल उल्फ़त कर बैठा है, इश्क़ उन्हें भी मुझसे थोड़ा ग़र हो पाता, अच्छा था। बेटी के मर जाने पर लेकर दीपक चल देते हैं, शमा समझ की लड़कों में भी कोई जलाता, अच्छा था। हर इंसाँ जज़्बातों को क्यों दिल में रखता है गुंजित? उनमें थोड़े हर्फ़ मिलाता, ग़ज़ल बनाता, अच्छा था। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

  शोख़ हवा में महका-महका संदल होता जाता है, तुमको छूकर कपड़ा-कपड़ा, मख़मल होता जाता है। जाने कितने खंज़र इन दो पैनी नज़रों में होंगे, जो भी तुमको देखता है बस घायल होता जाता है। इतनी मेहनत से कागज़ पर हर्फ़-हर्फ़ मैं लिखता हूँ, हर्फ़ निकल हर कागज़ से पर पागल होता जाता है। चमक माँगता रहता है शब का अंधेरा तारों की, फिर उस से मिलकर आँखों का काजल होता जाता है। जाने कब तुम आओगे ये सोच-सोचकर मेरा दिन, शामों में ढल जाता है और फ़िर कल होता जाता है। याद तुम्हारी आती है तब मेरी आँखों का जोड़ा, ख़ुश्क ज़मीं पर बारिश करता बादल होता जाता है। दूर तलक मुझको इसकी झनकार सुनाई देती है, नाम तुम्हारा कोई खनकती पायल होता जाता है। इसके हिस्से-हिस्से को पलकों पे सजाकर रखते हैं, यार तुम्हारा हर इक नखरा काजल होता जाता है। मेरे बाद मेरे इन अशआरों का क्या होगा गुंजित? यही सोचकर बेसुध मेरा पल-पल होता जाता है। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

दिलकश आलम इतना काजल का होगा, आँखों पर इक पहरा काजल का होगा। गुस्ताख़ी जब ये आँखें कर जाएंगी, उस पर थोड़ा गुस्सा काजल का होगा। सूरज के रहते ये शब कैसे आई? शायद ये अंधेरा काजल का होगा। पास झील के पेड़ों सी पलकें होंगी, और उस पर नज़्ज़ारा काजल का होगा। मेरे दिल पर तीर निग़ाहों ने मारा, मगर निशाना पक्का काजल का होगा। यूँ आँखों में खोना मेरी गलती थी, ऐब मगर थोड़ा-सा काजल का होगा। इन नाज़ुक गालों पर कोई तिल है या, इनपर उतरा कतरा काजल का होगा। क़लम रहेगी ज़ुल्फों में उलझी उँगली, औ' स्याही का प्याला, काजल का होगा। आँखें बहती-बहती जब दरिया होंगी, "गुंजित" एक सहारा काजल का होगा। ©गुंजित जैन

दीपावली ©गुंजित जैन

 अंधकार यह दूर हो, उज्ज्वल हो हर राह।  मन के भीतर हो सदा, सुंदर ज्योति प्रवाह।।  दीपों से जगमग रहे, अंतर्मन का द्वार। सदा प्रज्ज्वलित हो धरा, सुखी रहे संसार।। नष्ट सभी के बैर हों, होगा मेल मिलाप। आई है दीपावली, दूर हुए संताप।। हिय से मंगल कामना, हो सुख शांति समीप। जीवन में हों आपके, खुशियों के नव-दीप।। घर-घर में हो सर्वदा, माँ लक्ष्मी का वास। शुभ हो यह दीपावली, गुंजित की है आस।। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

 दिलों की कहानी मुहब्बत, हसीं ये बयानी मुहब्बत। जहां में कहाँ पर दिखेगी, मुक़म्मल सुहानी मुहब्बत। रहेगा नहीं एक दिन कुछ, यकीनन गँवानी मुहब्बत। जहां भर के लोगों के दिल में , हमें है बचानी मुहब्बत। बिखरकर कहीं आज फ़िर से, हुई पानी-पानी मुहब्बत। ग़ज़ल, शायरी से ही "गुंजित" सभी को बतानी मुहब्बत। © गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

 आँखों में खंज़र देखने का ख़्वाब है, तुमको नज़र भर देखने का ख़्वाब है। काजल लगाऊँ मैं इजाज़त हो अगर? सजकर, सँवरकर देखने का ख़्वाब है शायद कभी तुम हाथ पकड़े ना चलो, ऐसा सफ़र, पर देखने का ख़्वाब है। मीठा अगर खारा बना, कैसे बना? दरिया-समंदर देखने का ख़्वाब है। "गुंजित" जहाँ सब साथ दें ऐसा कोई, ख़्वाबों भरा घर देखने का ख़्वाब है। ©गुंजित जैन

कविता रानी ©गुंजित जैन

 शब्दों से है आनाकानी, कहनी हिय की व्यथा पुरानी, वर्षों बीत गए, आ जाओ, क्यों तुम रूठी कविता रानी? प्रेम हमारा नित्य, असीमित, था साहित्य जगत में चर्चित, वृक्ष विशाल ताल छंदों के, पृष्ठों की भू पर थे विसरित, पादप चले गए जीवन से, कैसे होगी पवन सुहानी? वर्षों बीत गए, आ जाओ, क्यों तुम रूठी कविता रानी? भावों का लेकर दिनकर नित, संवेदन-वर्षा से सिंचित, लेकर पोषक पोषण लय का, हुई प्रणय नव-कोंपल विकसित, होती शुष्क प्रेम की कोंपल, वर्षा जब से हुई सियानी, वर्षों बीत गए, आ जाओ, क्यों तुम रूठी कविता रानी? अलंकार से हो आभूषित, रम्य अनेक रसों से लेपित, ललित षोडशी नव-यौवन की, करती रही मधुर स्वर गुंजित, गई अलंकारों की शोभा, रुकी स्वरों की कोमल वानी, वर्षों बीत गए, आ जाओ, क्यों तुम रूठी कविता रानी? ©गुंजित जैन

लेखनी ©गुंजित जैन

 मंच यह लेखन का, साहित्य के वंदन का, कवियों के चिंतन का, एक चारु द्वार है। समसि की कंपन का, कर्णप्रिय गुंजन का,  शब्द, भाव सिंचन का, सुंदर विचार है। गुणवान यौवन का, प्रौढ़ता, संवेदन का,  गीत और गायन का, मिलन साकार है। हर्षण का, क्रंदन का, सृजन की गर्जन का, गुंजित के जीवन का, लेखनी ही सार है। ©गुंजित जैन

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी   ये तिनके, पत्तियाँ क्या हम ही रख लें? शजर में आशियाँ क्या हम ही रख लें? ख़ुशी तो दे नहीं पाए हमें तुम, मगर, ये सिसकियाँ क्या हम ही रख लें? तुम्हें बेताब आँखें ढूँढती पर, उठी बेताबियाँ क्या हम ही रख लें? महल अश्क़ों का हमको दे दिया है, ख़ुशी की खिड़कियाँ क्या हम ही रख लें? बड़ा होने की इस जद्दोजहद में, बची नादानियाँ क्या हम ही रख लें? तुम्हारे होंठ को छूकर गईं जो, वो महकी तितलियाँ क्या हम ही रख लें? हुनर 'गुंजित' ज़रा तुम भी तो रक्खो, ये सारी खूबियाँ क्या हम ही रख लें? ©गुंजित जैन

रोशनी ©गुंजित जैन

 "पर्स रख लिया, बैग रख लिया और टिफ़िन, वो भी रख लिया। कुछ रह तो नहीं गया...! घड़ी। हाँ घड़ी रह गयी।" अपनी सूनी कलाई देखते हुए मैं बोला। वही घड़ी जो शादी की दूसरी सालगिरह पर तुमने मुझे दी थी, उपहार के तौर पर। उस दिन को अब 8 साल हो गए हैं।  उस घड़ी का वो सुनहरा फ्रेम आज भी वैसा ही है। हाँ, कुछ जगहों से उसकी सुनहरी परत उतर गई है और घड़ी का पट्टा भी मैंने बदलवा लिया है। दुकान वाले ने तो कहा था 'साहब पुरानी घड़ी को सही करवाकर क्या करोगे, नई लेलो', मगर इस से तुम्हारी यादें जुड़ीं थीं, तो कैसे जाने देता! तुम्हारा दिया आख़िरी तोहफ़ा जो था। वैसे तुम्हारे उपहार देने का कारण भी मैं जानता हूँ।  मैं शुरू से ही समय का पक्का नहीं था। हमेशा देर से उठना, देर से तैयार होना। जायज़ सी बात है, दफ्तर के लिए भी अक्सर देर हो ही जाती थी। तुमने इस घड़ी को 15 मिनट आगे भी किया था, ताकि मैं समय पर दफ्तर के लिए निकल जाऊँ। फिर भी कई बार मैं लेट हो जाता था। तुम हर बार खीझकर कहती थी   "ओफ़्फ़ो, आज फिर लेट। क्या करूँ मैं तुम्हारा!" और मैं अतरंगी सी शक्लें बनाने लगता था। सच कहूँ तो इस पुरानी घड़ी की 'टि...

बिखरे पत्ते ©गुंजित जैन

 शाम का वक्त था, और अक्टूबर का महीना। अक्टूबर से ही अंदाज़ा लग गया होगा कि मौसम पतझड़ का था।  मैं, वहाँ बाग़ में बैठा था, एक बड़े पेड़ की छाँव के नीचे लगी पत्थर की बेंच पर। धीरे-धीरे उस पेड़ के पत्ते गिरकर बिखर रहे थे। कुछ मेरे बालों में उलझे पड़े थे, कुछ बेंच पर गिरे थे, और वो रास्ता तो अपना रंग बदलकर पीला रंग धारण कर ही चुका था। खैर! मैं तो अपने अलग ख़यालों में खोया हुआ था। अचानक ख़यालों के बीच दस्तक देते हुए किसी की आवाज़ आई "सुनो!"। उस पतझड़ के सन्नाटे में, आवाज़ करते सूखे पत्तों के शोर के बीच से, किसी तीर की तरह उन आवाज़ों को छेद कर आगे बढ़ती मेरे कानों तक वो आवाज़ पहुंची। मैं पीछे मुड़ा। लग तो रहा था कि अब भी ख़यालों में हूँ, मगर ख़यालों से निकलकर वो शख़्सियत मेरे सामने खड़ी थी। "क्या हम यहाँ बैठ जाएँ?" वो धीमी-सी आवाज़ में बोली। वो आवाज़ मीठी तो हमेशा से ही थी, धीमे स्वर में और भी मीठी होकर मुझ तक आ रही थी। "हाँ, हाँ ज़रूर" मैं बेंच के बीचों-बीच बैठा था, मगर ये सुनते ही दाहिनी तरफ सरककर बैठ गया। वो बाएं तरफ बैठी। "कैसे हो?" वो उसी धीमे स्वर को बरक़रार रखते हुए, अ...

हिंदी ©गुंजित जैन

 हिंदी का पूजन करें, कर हिंदी का त्राण। हिंदी से ही प्राण हैं, हिंदी बिन निष्प्राण।। हिंदी से हैं हम सभी... हिंदी ही पहचान। हिंदी से मसि यह चले, हिंदी बिन वीरान।। घटती हिंदी देश से, इसका करें बचाव। हिंदी प्रतिदिन छोड़ती , मन पर अमिट प्रभाव।। लुप्त न हो जाए कहीं,  इसको रखो सँभाल। हिंदी की रक्षा करो, बना समसि को ढाल।। हिंदी को जीवित करें , मिलकर करें विचार। गुंजित जीवन प्राण का,  हिंदी ही आधार।।      ©गुंजित जैन