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बेटी दिल का एक कोना © माधुरी मिश्रा

 इतना आसान कहाँ इस दुनिया में तनया होना, बारहा रिक्त रह जाए बेटी दिल का एक कोना! कभी रिश्तों की ओट में तो कभी समाज के नाम, ख़्वाहिशों को ताक पर टाँग दें हर बेटी अभिराम। आसान कहाँ है यारों बेटी-सा त्याग कर पाना, परिणय सुत्र में बंधकर पीहर से विदा हो जाना! सच होने से पहले ही सपने को हृदय में सुलाना, स्पर्श नहीं कर पाए कोई बेटी दिल का वह कोना। प्रेम, स्नेह के संग-संग नित नई नसीहत ओढ़, कितनी बार बढ़े बेटी दोराहे निज इच्छा छोड़।  अपनों की ख़ातिर स्वाधिकारों को अर्पण करना, बिन तिल और चावल ही बेटी का तर्पण करना। आँखों से बहता उसके तपकर पिघलता सोना, बंद तिजोरी-सा रहता बेटी दिल का एक कोना।                                ©  श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 

माँ ©माधुरी मिश्रा

चित्र
माँ तेरी ममता की छाँव तले सूरज की तपिश कुछ भी तो नहीं। तू निर्मल, शीतल, पावन इतनी  गंगा, अमृत तो कुछ भी नहीं। तेरे प्यार भरे स्पर्श से ही भूल जाती हूँ मैं गम सभी। तेरी हौसलों भरी बातें देती है  मुझे धैर्य, हिम्मत और सहनशक्ति। तेरी आँखों में गहराई इतनी सागर की जैसे थाह नहीं। तेरा हृदय विशाल है व्योम-सा तू अंधियारे की प्रथम किरण। ये नभ, ये जग, सारी सृष्टि  निर्जीव अथवा हो जीवधारी, इस प्रकृति की विशिष्ट कृतियाँ  तेरी तुलना में कुछ भी तो नहीं। तुझमें ही सभी का वास है तेरे संग हर लम्हा खास है। 'माँ' तू मेरे जीने की वजह बिन तेरे 'मधु' कुछ भी तो नहीं।                               @श्रीमती माधुरी मिश्रा