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तोटक छंद - आशुतोष वंदना ©रजनीश सोनी

नमन माँ शारदे नमन लेखनी  तोटक छंद वर्णिक  छंद,   सलगा  × 4 (IIS×4) रुचि ब्याल कराल सु माल गले।  शुचि  बालक चन्द्र ललाट भले।।  लट  छोर  जटा  अटवी  जिनके।  शिव का  अनुराग  जगे  सबके।।  द्युति भाल  विशाल  त्रिनेत्र लसे।  विषपुच्छक  कुण्डल कर्ण फॅसे।।  भव तारणि  जान्हवि शीश झरे। मन  शंभु   सदा  अनुराग  भरे।।  डमरू  डमकार   निनाद   करें।  कर  शस्त्र विशेष  त्रिशूल  धरें।।  कटि में  अजिनाम्बर  ही  पहने।  शिव शंभु   रहें   उर  में  अपने।।  हर आसन  ब्याघ्र  सु-चाम करें।  वृष- वाहन  संग   सदा  विचरें।।  बस  भूत  भयङ्कर  हैं  जिनके।  मन  रे.!   शरणागत  हो  उनके।।  रति-नाह   विदाहक  मान  हरें।  जग के  हित में  विषपान  क...

मनहरण घनाक्षरी - पराक्रम दिवस ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी नमन लेखनी  (1)  दशा  देख  भारत  की,                  मन अकुलाया होगा,  प्रज्ज्वलित  हिय  ज्वाल,                 वह  कोई  खास  था। किसी  एक  क्षेत्र से न,                  रहा  सरोकार  उन्हे,  उनके तो  दिल  में  ही,                    भारत   निवास  था। मातृभूमि   अनुरक्ति,                प्रबल थी  इच्छा शक्ति, होगा  ही  विमुक्त  देश,                 अटल    विश्वास   था  साहस  अदम्य  लिये,                वैचारिक  क्रांति लिये,  आया  महानायक जो,         ...

गीत- कविताएँ ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी नमन लेखनी  धूमिल  जीवन  में  नवरस  भर  देती हैं, कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं। अक्षर के अक्षत  अर्पित कर  सुख पाते।  चिन्तन करते शब्द जाल को सुलझाते।।  जैसे - तैसे  छोर मिला  कुछ सुलझा तो,  नई  सोच को  फिर  लाकर  धर देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।।  व्यथा कथा उत्पीड़न संशय की दुविधा।  श्रम संयम सानिध्य शौर्य सेवा सुविधा।। दयाभाव  शृंगार  स्नेह  करुणा  चिन्ता,  विविध  भाव को  रहने को  घर देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित  कर देती हैं।।  नैन पनारे  क्यों निकले, था क्या बोया।  जीवन  के  झंझावातों में  क्या खोया।।  जटिल प्रश्न जब घेरें तो  कोशिश करके,  सब  प्रश्नों  का   वाजिब  उत्तर  देती हैं।  कविताएँ  मुझको  जीवित कर देती हैं।।  छंद ताल गति लय शब्दों की सार्थकता।  वर्...

ग़ज़ल ©रजनीश सोनी

 वन्दे वागेश्वरी  नमन लेखनी  ग़ज़ल   बे-वजह के उसूल क्यों कुबूल हम कर लें।  फूल सी जिन्दगी कैसे बबूल हम कर लें।।  जो बुलाते हैं  गजल गीत शायरी के लिये,  चाहते हैं  खरा  पैसा  वसूल  हम  कर लें।  लोग इजहार करेंगे  मगर  है  ना-मुमकिन,  दोस्ती जाने बिना क्यों फिजूल हम कर लें।  नेक  नीयत  रहे   तो  लोग  तबज्जो  देगे,  खुदा की राह पे खुद को रसूल हम कर लें। देख  पाकीज़गी  भी  चीज  कोई होती है,  गुलबदन है  इसे कैसे के  धूल हम कर लें।  "नेह"  नैनो में  किसी के  समा गये हैं जब,  ये मुनासिब नही कि और भूल हम कर लें। ©रजनीश सोनी "नेह"

दोधक छंद- हनुमान ©रजनीश सोनी

वन्दे वागेश्वरी नमन लेखनी छंद- दोधक छंद वर्णिक (11वर्ण)  भगण भगण भगण गुरु गुरु S I I    S I I    S I I    S S जै कपि श्रेष्ठ  विलक्षण न्यारे।  अञ्जनि  नंदन  राम  दुलारे।।  राम सिया  पद सेवक  सन्ता।  वीर शिरोमणि  जै हनुमन्ता।।  लूम   लपेट    पहेटन    हारी।  वज्र  गदा  हनि  दुष्ट  सँहारी।।  मूँज जनेउ  सुशोभित  काँधे।  श्री  हनुमंत  शनिश्चर  साधे।।  भीम  महा बलशील  लजाने। गर्व   तिरोहित  हो  पहचाने।।  श्री  रघुवीर    भरोष   लगाये।  लाय  सजीवन  प्राण बचाये।।  सिन्धु फलाँगि गये गढ़ लंका।  मारि  निशाचर  भूधर  बंका।।  बाग उजारि अशोक विशोका।  रावण दंभ  घटे  तिहुँ लोका।।  सन्न सभा  लखि रामहि दूता।  बाँधि सके कहँ  तार न बूता।।  लंक जरो जब जानिन सीता।  ढाढ़स लागि ...

गोपी छंद- शिव शंकर ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी गोपी छंद  (आरती  जय शिवशंकर की)  15 मात्रिक छंद, आदि त्रिकल, अंत गुरु।  आरती  जय शिव शंकर  की।            स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।।  श्रृंग   कैलाश    निवासी  की।  जगत शिव पर विस्वासी की।।  वसन    बाघंबर   वाले   की। डमाडम   डमरू  वाले  की।।  आरती जय शिव शंकर  की।            स्वयंभू  श्रृष्टि सृजनकर की।।  जयति  जै  जै  त्रिनेत्र धारी। चन्द्रिका  माथ  लगे प्यारी।।  जटा   शुचि   गंगाधारी की। जयति  नन्दी असवारी की।।  आरती जय शिव शंकर की।            स्वयंभू श्रृष्टि सृजनकर की।।  कर्ण  वृश्चिक   कुंडल  सोहे।  माथ   चंदन   त्रिपुंड   मोहे।।  फवे   गलहार   भुजंगा  की।  देह  भर ...

कविता- प्रश्न पत्र ही लीक हो गए ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  लद्धड़ प्रतिभागी कितने निर्भीक हो गये। भ्रष्टाचार  चरम  पर  है  तस्दीक हो गये।।  हुईं  रिक्तियाँ भरने की  घोषणा  प्रचारित,  जगा भरोसा जब चुनाव नजदीक हो गये। प्रश्न पत्र  अब बिकें  माल दे  हुई  खरीदी,  जिनने लिये खरीद बड़े रमणीक हो गये।  जैसे  तैसे  आया समय  परीक्षा का जब,  पता चला की  प्रश्न पत्र ही लीक हो गये। भर्ती बनी छलावा धन श्रम समय गँवाया,  खाये पान दलाल  प्रत्यासी पीक हो गये।  छीछा-लेदर हुयी  जांँच फिर लीपा-पोती,  अफसर-शाही  नेता कई  शरीक हो गये। अरबों का नुकसान हताश हुये प्रतिभागी,  'नेह' न लज्जा लगे लाख तहरीक हो गये।  ©रजनीश सोनी "नेह"

घनाक्षरी - हिंदी ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी   भारत की भूमि में ये हो रहा है शंखनाद, 'हिन्दी'  राष्ट्रभाषा बने  जनता  पुकारती। लिखने में बोलने में  भाव के  संप्रेषण में,  सदा ही  समर्थ  रही  शब्द शक्ति  भारती। सागर सी धारणा भाषाओं को सहेजने में,  अपना पराया  भाव  कभी  ना  विचारती। हर भाषा-भाषी इसे सीख लें सहज में ही,  गर्व करो  हिन्दी की  उतारो सभी  आरती। ©रजनीश सोनी

सूर्यवंश को प्रणाम है ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी चामर छंद   15 वर्ण, 23 मात्रा रगण, जगण, रगण, जगण, रगण नाद में  निनाद में  प्रतीक  छंद ज्ञान में।  योग में प्रयोग में निमग्न भाव ध्यान में।।  तत्व में सजीव में  स्वभाव में बहाव में।  राम  सर्व व्याप्त हैं  निरीह में प्रमाव में।।  राम  रीति-नीति हैं  पुनीत  संविधान हैं।  राम ही क्रियाकलाप राम ही विधान हैं।।  आसुरी  प्रवृत्ति  हेतु  दण्ड के प्रधान हैं।  दीन  रक्षणार्थ  राम ही कृपा-निधान हैं।।  दीपमालिका अनूप  भव्य नव्य धाम है।  दिव्य दर्शनीय  रूप राशि हैं  ललाम है।।  रोम - रोम  मे  रमें  रमेति  राम नाम  है।  सूर्यवंश  कौशलेन्द्र राम को  प्रणाम है।। ©रजनीश सोनी

चाय ©रजनीश सोनी

  हो इसी से मेजबानी।  चाय की दुनिया दी'वानी।।  दाँत की है क्या जरूरत,  बस इसे तो सुरक जानी।  चाय की चुस्की चली तब,  ठंड ने भी हार मानी।  चाय से आदर, निरादर,  चल पड़े किस्सा कहानी।  जो पिलाये स्वागम् है,  धन्य! उनकी मेहरबानी।  पी इसे खुश हो रहे सब,  दादा' दादी नाना' नानी।  सुबह से अब बाल बच्चे,  लग गये हैं रट लगानी।  "नेह" कुछ नखरे दिखायें,  पर उसी में नजर जानी।  ©रजनीश सोनी "नेह"

ना उछल जाये ©रजनीश सोनी

देख नैनो का ये जादू न तुम पे चल जाये।  हो कयामत न कहीं जान ही निकल जाये। कोई तरकीब नहीं काम की दिखा करती,  कैसे देखे बिना बेचैन दिल बहल जाये। प्यार शक्कर की तरह दूध में घुला होता,  ये अलग हो नहीं सकता भले उबल जाये।   जो कभी नैन को भाया समा गया दिल में,  याद रहता हैं भले ये शरीर ढल जाये।  लोग कहते नही उनकी तरफ से हम कहते,  डर है मेरा भी कहीं नाम ना उछल जाये।  रोज मिटती हैं इबारत ये श्यामपट वाली,  हो शिला-लेख तो कैसे कहो बदल जाये।  संग-दिल हो न मगर "नेह" संग-मरमर हो,  मोम दिल क्या की जरा धूप पा पिघल जाये।  ©रजनीश सोनी "नेह"

पीयूष वर्ष छंद- रूपचौदस ©रजनीश सोनी शहडोल

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी   छंद- पीयूष वर्ष रूपचौदस की बधाई एवं शुभकामनाएं। यह  सनातन है  चिरंतन  ज्ञान है, रूप  से ही  जगत में  पहचान है। रूप धारे हैं जगत जड़ जीव सब,  रूप विविधा दे अलग संज्ञान है।  रंग  है तो  रूप की  है  विविधता, शोध कर  रचना करे  भगवान है।  रूप चौदस  रूप यौवन के लिये,  रूप  पर  ही   मोहता  इसान  है।  कृतिमता छद्मावरण धर  रूप में,  रूप हो जाते क्षणिक श्रीमान हैं। रूप यौवन आगमित होता गमन,  किन्तु होने तक रहे अभिमान है।  सौष्ठव का पुट मिले जब रूप में,  और मारक हो चले अभियान है।  जगत में आकृष्ट करता रूप धन,  धन्य है  जो  रूप से  धनवान है।  ©रजनीश सोनी शहडोल

पड़ता ©रजनीश सोनी

 दरपन  उन्हे  दिखाना  पड़ता। खुद से  भी  बतलाना पड़ता II रिश्ते    बने   रहें,   इससे   ही, मोती  सा   सहलाना   पड़ता। शिथिल काय निष्प्राण न होवे, इसीलिए ,   टहलाना   पड़ता। भौतिकता का बोझ न सम्हले, अब  मन को समझना पड़ता। भैंस  खुशी मन   दूध जो  देवे, उसको  भी  नहलाना  पड़ता। उनके  मन  को  ठेस  न पहुंचे, बुद्धू  भी   कहलाना   पड़ता। कुछ   ओछी   चतुराई   करते,  सबक उन्हें सिखलाना  पड़ता I बड़े  हुए, बच्चों की  ख्वाहिश, उनको  भी   बहलाना  पड़ता। अभी   नवांकुर   है,  प्यारे  हैं, उन  पर  छत्र  लगाना  पड़ता। जीवन   के,   झंझावातों   से, डटकर आंख मिलाना पड़ता। टंटपाल   घोड़ा   जो   बिगड़े, उस  पर  ऐड़  ल...

उद्घोष कविता- समर ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी                1 समर निंद्य,यह बात सत्य है, किन्तु शान्ति वह कब तक ? कुटिल पडो़सी की मर्जी औ" कृपा दृष्टि हो तब तक।।                  2 अनय करे कोई हम पर, औ'- उलटे धौंस जमाये। ऐसे  मुल्क  पडो़सी जाने, कब विपदा आ जाये।                   3 भीख कृपा ही मिल सकती है, करुण राग यदि गाओ। शीश झुकाना नहीं सोहता, वीर राग अपनाओ।।                        4 विष के कारण ही विषधर से, हर कोई डरता है। वहीं भला विषहीन सर्प से, कौन डरा करता है।।                         5 अगर बाहुबल और बुद्धि बल, नहीं साथ में होगा। हमको खुद पर हुये अनय को, सहना ही तो होगा।।                          6 जिन्दा  रहते  इतिहासों  में, समर-सूर, उपकारी।...

चौपैया छंद - शिवशंकर ©रजनीश सोनी

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी जय जय शिवशंकर, तुम अभयंकर,                      शरणागत सुखरासी।  आसन बाघंबर, श्रृष्टि सृजनकर,                      जय कैलाश निवासी।।  जय जय  भूतेश्वर, शंभु  महेश्वर,                    जय जय हे अविनाशी।  जय जय घृष्णेश्वर , जय प्रथमेश्वर,                    जय शिवलिंगम काशी।।   भूतादिक  सङ्गा,  भङ्ग  तरङ्गा,                   गण गणाधि सब साजे।  औघड़  बेढंगा,  जस भिखमङ्गा,                     कर  वरदान  निवाजे।।   गलहार  भुजङ्गा,  हर  हर  गङ्गा,                      जटा  मध्य  में...

कविता धन ©रजनीश सोनी

 गुण-ग्राहक से  मिले  प्रसंसा,  सजती  और  सुघर  होती है।  सतत  सहेजे    साहुकार  सा,  कवि का धन कविता होती है।।  विविध विधा के होते नग-धन,  हर  नग  की  आभा  होती  है।  शब्द  नगीने  सा कवि  जड़ता,  जेवर  सी    कीमत   होती  है।  सतत   सहेजे    साहुकार  सा,  कवि का धन कविता होती है।।  याद नहीं   धन   जमा डायरी वक्त  पड़े   तड़पन   होती  है।  कवि कंठस्थ रखे जब कविता,  तब  ही   जेब  गरम  होती  है।  सतत   सहेजे    साहुकार  सा,  कवि का धन कविता होती है।।  कुछ  गम्भीर  बड़ी नोटों  सी,  कुछ में  ही  प्रचलन  दोती है।  धमा चौकड़ी  खूब  करें कुछ,  सिक्कों सी खन खन होती है।  सतत   सहेजे    साहुकार...

अब सूरज निकलना चाहिए © रजनीश सोनी

 बढ़ गया है धुंध, अब-           सूरज निकलना चाहिए. जिस तरह भी हो सके,               रौशन  सबेरा  चाहिए..  ********* आँधियों ने उडा़ दीं,               (1)  बूँदें जो बादल में रहीं. बादलों का दोष क्या,  खेती जो सूखी रह गयी. चाहिए  वर्षा  अगर,  झोंका ये रुकना चाहिए. पवन के अभिमान का भी,  रुख बदलना चाहिये. बढ़ गया है धुंध, अब,           सूरज निकलना चाहिये, जिस तरह भी हो सके,            रौशन   सबेरा   चाहिये..  ******** ले  के  कुछ  अरमान,             (2)  बादल, बरसते हैं खेत पर.  पर, नहीं पानी ठहरता,  जो  ये  बरसें  रेत  पर.  बादलों का श्रम हो सार्थक,  खेत  ऐसा  चाहिए. उपज बढ़ती ही बढ़े,  कुछ, नेत ऐसा चाहिए. बढ़ गया है धुंध, अब,    ...

ईश्वर से जिसका नाता है ©रजनीश सोनी

 ईश्वर से  जिसका  नाता  है ******(गीत)  दाना पानी  लिखा जहाँ का, लिखा जहाँ का  दाना पानी,  भाग्य  हमें  लेकर  आता  है. लिखा योग है जहाँ मृत्यु का,  जहाँ मृत्यु का योग लिखा है,  काल खींचकर  ले आता  है. जोर किसी का  नहीं चलेगा,  नहीं चलेगा  जोर किसी का,  नाहक  बन्दे  भय  खाता  है. ईश्वर  से  जिसका  नाता  है,  नाता  है  जिसका  ईश्वर  से,  कभी  नहीं  वह  घबराता है. माया ठगिनी   मन को  मोहे,  मन  को  मोहे  माया ठगिनी,  आखिर अंत   ठगा  जाता है. झंझावातों   से    जीवन  के,  जीवन   के    झंझावातों  से,  प्राणी  क्योंकर   घबराता  है. लेखा जोखा  हानि लाभ का,  हानि लाभ का  लेखा जोखा,  सब कुछ छोड़ यहीं, जाता है.               ...

मजदूर दिवस ©रजनीश सोनी

 श्रमिक खडा़ क्या सोच रहा है? मन को तू क्यों कोस रहा है? तेरी ही मेहनत का प्रतिफल, यह रौशन संसार, तेरे श्रम पर सब कुछ निर्भर, तू सबका आधार। तूने मंदिर,भवन बनाये, ताज महल औ' शहर बसाये, सड़क तुम्हारी मेहनत का फल, दौडे़ सर सर कार। तेरे श्रम पर सब कुछ निर्भर, तू सबका आधार। नहर बाँध और ये बिजलीघर, आयुध निर्माणी,पुतलीघर, यह इस्पात कारखाना भी मेहनत की ही बलिवेदी पर। तेरे श्रम की ही पटरी पर, रेल की यह रफ्तार। तेरे श्रम पर सब कुछ निर्भर, तू सब का आधार। तेरे हाथ न रुकने वाले, श्रृजन निरंतर करने वाले, वायुयान जलयान बनाये। भूतल क्या भूगर्भ भेदकर, खनिज,कोयला लाने वाले। तेरे श्रम पर ही आधारित , कोयला   कारोबार। तेरे श्रम पर सब कुछ निर्भर, तू सबका आधार। उथल पुथल धरती पर कितने- हुए युगों से कौन ये जाने। लेकिन हर युग का होता है, श्रमिक ही श्रृजनहार। तेरे श्रम पर सब कुछ निर्भर, तू सब का आधार। तेरे श्रम के शंखनाद से, हो जाते उद्योग स्थापित। तेरे श्रम के हूँकार से, हो जाते पर्वत विस्थापित। तू चाहे तो अपने श्रम से, बदले,  नदी की धार। श्रमिक तुम्हारा श्रम ही तो है, रचना का आधार। तेरे श्रम...