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कौन? ©सौम्या शर्मा

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी मुमकिन ही नहीं समझना जिनका! बात दिल की उनको बताता है कौन? जरा सा डगमगाकर देखिए जनाब! संभालने यहां आपको आता है कौन? छूट जाते हैं सब यहां बीच सफर में! हश्र के दिन तक साथ निभाता है कौन? इस दौर में रूठना तो सोच लेना फिर से! रुठे हुओं को आजकल मनाता है कौन? खैरियत कह दीजिए सब यकीं करेंगे! रूह की तहों तक यहां जाता है कौन? रौशनी ने खुद ही उम्मीद छोड़ दी जहां! उस देहरी पर दिए जलाता है कौन? लगता है दूसरी ही दुनिया के हो तुम! दर्द पर यूं भी मरहम लगाता है कौन? ©सौम्या शर्मा

गीत- कान्हा ©सौम्या शर्मा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी तेरी श्यामल छवि का क्या कहना। कान्हा आ खेलो मोरे अँगना।। वंशीधर की लीला न्यारी, मनमोहक मुस्कान है प्यारी, तूने मोह लियो सगरे जग ना। रास रचावैं कृष्ण रसाला, माखन खावै नन्द को लाला, ओ रूनझुन बाजे पायल कँगना। लीला तुम्हरी सबसे न्यारी, बांकी चितवन है गिरधारी, हाँ! दर्शन दो प्रभु मानो कहना। तेरी श्यामल छवि का क्या कहना। कान्हा आ खेलो मोरे अंगना।। ©सौम्या शर्मा

गीत- बाबा फिर से आओ ना! ©सौम्या शर्मा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी कितना विचलित जनमानस है, बाबा फिर से आओ ना! कर दो मानस का गायन भी, फिर से अलख जगाओ ना। धूल धूसरित गरिमा सब की, सब ही हैं पथभ्रष्ट हुए, पशुता मानवता में पसरी, जीव जंतु भी नष्ट हुए, आ जाओ ना फिर से बाबा, रामचरित फिर गाओ ना, कितना विचलित जनमानस है, बाबा फिर से आओ ना! त्राहिमाम करती है प्रकृति भी, जीवन सबके अस्त-व्यस्त हैं, विष फैला संबंधों में ‌भी, लोलुपता के वरदहस्त हैं, देख दुर्दशा कलियुग की , अब कृपादृष्टि बरसाओ ना, कितना विचलित जनमानस है, बाबा फिर से आओ ना! मानस रखी घरों में लेकिन, हाथ न कोई लगाता है, राक्षस कलि का नयी पौध को, भांति-भांति भरमाता है, कैसे हो कल्याण मनुज का, आकर फिर बतलाओ ना, कितना विचलित जनमानस है, बाबा फिर से आओ ना! ©सौम्या शर्मा 

गीत- माँ ©सौम्या शर्मा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी जो हँसती हूँ तो लेती है बलाएं चूम माथे को, कभी जो रो पडूँ तो झट से सीने से लगाती है, कभी थम जाऊँ तो आगे बढ़ाती थाम उँगली को, वो माँ है ना, मुझे हारा हुआ कब देख पाती है? जो मन हो अनमना तो लाड़ लाखों ही लड़ाए वो, वही तो है जो मन की बात होंठों पर ले आई है, वही उत्तर सभी प्रश्नों की, मेरी उलझनों की है, वो रब का रूप ही तो है जो माई, माँ कहाई है। वो मंदिर में वो मस्जिद में दुआएं पढ़ के आती है, वो माँ है ना, मुझे हारा हुआ कब देख पाती है? तलाशें हैं निगाहें उस को ही जब लौट घर आती, उसी गोदी की ठंडक वो सुकूं कैसे, कहाँ पाऊं? मैं माँ की लाडली हूँ सुन के कैसे मैं न इतराऊँ? जो देखूं मैं ख़ुदा को, अक़्स उसका ही वहाँ पाऊं। मुझे पल भर को जब देखे तो फूली ना समाती है, वो माँ है ना, मुझे हारा हुआ कब देख पाती है? मुझे हर दिन लगाती है वो काला सा नजर टीका दुआ उसकी लगे तो है बनाती स्वर्ग जीवन को, सभी गुण अपने बच्चों को वो देती है वसीयत में, बिछड़ जाना करे घायल मेरे तन और इस मन को, वो गुस्सा भी करे तो ऐसे जैसे दिल लुटाती है, वो माँ है ना, मुझे हारा हुआ कब देख पाती है? ©सौम्या शर्मा

रघुनंदन ©सौम्या शर्मा

 मर्यादा को जब भी समझा, होते हैं परिभाषित राम। नगर अयोध्या के जन-जन के, मन में सहज सुवासित राम! लेशमात्र संदेह न मन में, मुस्काते वन जाते राम। पराकाष्ठा मूल्यों की हैं, उत्तम तभी कहाते राम। वानर,भालू,की सेना ले, सकल‌ विश्व के नायक राम। केवट को उतराई देते। समता के परिचायक राम। राम वही जो मां शबरी के, झूठे बेर प्रेम से खाते। राम वही जो भ्राता की मूर्च्छा, पर विह्वल अश्रु बहाते। मानवता के केन्द्र बिन्दु हैं, हनुमत हृदय सुशोभित राम। उच्चकोटि आदर्श जगत में, करते हैं स्थापित राम।      © सौम्या शर्मा

गजल ©सौम्या शर्मा

 कहने को वो शख्स दीवाना लगता है, हमको तो ये जख्म पुराना लगता है! सोचा होगा तुमने भूल गए सब हम, हमको है अफसोस! जमाना लगता है! हाथ छुड़ाकर जाना है तुमको? जाओ, उल्टा-सीधा एक बहाना लगता है! जबसे मां ने छोड़ी है दुनिया मेरी! मुझको  तो बेकार जमाना लगता है! उसकी यादें, बातें उसकी ही देखो! लब पर मेरे एक फ़साना लगता है! मुझसे कुछ नाराज रहेगी ये महफ़िल! मुझको सच का साथ सुहाना लगता है! तुमको क्या बतलाएं क्या बीती हम पर! अब तो हर ग़म एक तराना लगता है        © सौम्या शर्मा

मां की स्तुति ©सौम्या शर्मा

 चारों दिशा में गूंजे, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! कोई दिल से बुलाए तो मैया दौड़ी आए! नमन किसी के भींगे तो मैया कृपा बरसाए! सब जन मिल के लगाएं,जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! दुर्गा,काली,भवानी,तू ही मां कल्याणी! चामुण्डा भी तू ही ,तू ही जग महारानी! हर लेगा दु:ख सारा, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! चारों दिशा में गूंजे, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! ©सौम्या शर्मा

कविता- दुविधा ©सौम्या शर्मा

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  अंतर्मन की दुविधा का मैं क्या बतलाऊं हाल सखी! कैसे रिश्तों को संजोऊँ , कैसे रखूं संभाल सखी? ले कोरा मन श्वेत पत्र , संबंध निभाती आई हूं! पर यह जटिल स्वरूप जगत का, अब तक समझ न पाई हूं! आवश्यकता पर हैं केंद्रित,सबके मृदु संबंध यहां! बाहर दिखे प्रशंसा पर भीतर पलते हैं द्वन्द यहां! ऐसे दोमुख आनन पर,सर्वस्व लुटाती आई हूं! पर यह जटिल स्वरूप जगत का,अब तक समझ न पाई हूं! मैं जिनके सँग पली बढ़ी हूं,खेली कूदी आंगन में! उन्हें बदलता कैसे देखूं, कैसे पीर सहूं  मन में? मन सबका रखने को मैं निज मन बहलाती आई हूं! पर यह जटिल स्वरूप जगत का अब तक समझ न पाई हूं! कहां लुप्त है वह पवित्रता, जीवन का आधार रही ! मन का निर्मल सुख औ भावों का पावन आगार रही ! लेकर दृग में नीर सदा मुस्कान लुटाती आई हूं! पर यह जटिल स्वरूप जगत का,अब तक समझ न पाई हूं! ©सौम्या शर्मा

लावणी छंद - मेरा नवभारत ©सौम्या शर्मा

नमन, मां शारदे नमन, लेखनी मेरा भारत  संस्कारों की,              सर्वोत्तम    परिभाषा है। प्रगतिशील मेरा भारत जो ,          विश्व पटल की   आशा है।।  चन्द्रयान को भेज चांद पर,          फिर  परचम    लहराया है। जी-20की  इस  बैठक को,        सकुशल   संपन्न   कराया है।।  मेरा भारत वह भारत जो,          जग  सिरमौर   बनेगा फिर। मेरा भारत वह भारत जो,       सुखद भविष्य लिखेगा फिर।।  मेरा भारत वह भारत जो,            नींव  सुदृढ़तम  रखता  है। विश्व शांति का पोषक लेकिन,             ध्येय विजय का रखता है।।  मेरा भारत वह भारत जो,            गौरव   का   परिचायक है। मेरा भारत वह भारत जो,            विश्...

ग़ज़ल ©सौम्या शर्मा

आज याद आ गया मुस्कुराना तेरा।  मुस्कुराकर मेरा दिल चुराना तेरा।  बस ज़रा सी झलक देखने को मेरी, जाने कितने बहाने बनाना तेरा।  सर्द मौसम हो या गर्म हो दोपहर, रोज मेरी गली आना- जाना तेरा।  रूठ जाऊं कभी तो मनाने मुझे, मुस्कुरा हक जताकर मनाना तेरा।   मैं ये कैसे कहूँ पास तू था नहीं, मेरे दिल में रहा है ठिकाना तेरा।  खो भी जाऊं कभी, ढूंढ लाना मुझे, फ़र्ज़ है मुझको, मुझसे मिलाना,तेरा।  तू सहर है मेरी तू ही शब है मेरी, वास्ता मुझसे है कुछ पुराना तेरा।  याद आता है सिरहाने पर बैठना, बैठकर सारी बातें सुनाना तेरा।  वो मेरा देखना एकटक सा तुझे, मेरी आंखों से आंखें मिलाना तेरा।  है तेरा शुक्रिया सुन ऐ मेरे खुदा, नेमतों का जो बरसा खजाना तेरा।  ©सौम्या शर्मा 

गीत - प्रियवर ©सौम्या शर्मा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी तुमको रखकर केन्द्र बिन्दु में, मैंने प्रेम जिया है प्रियवर, जग कहता है निपट बांवरी, मैंने प्रेम किया है प्रियवर। विकट विधाता धैर्य परीक्षा, लेकिन फिर भी धैर्य न जाता, जीवन जितने प्रश्न पूछता, उतने उत्तर मैं ले आता। संघर्षों के प्याले में भी, मैंने प्रेम पिया है प्रियवर। तुमको रखकर केन्द्र बिन्दु में, मैंने प्रेम जिया है प्रियवर। तुमसे जुड़े नेह के धागे, मैंने संभाले रक्खे हैं, मैंने तुमको मन में रक्खा, फिर उस पर ताले रक्खे हैं। कटुता जग को लौटा दी है, मैंने प्रेम लिया है प्रियवर। तुमको रखकर केन्द्र बिन्दु में, मैंने प्रेम जिया है प्रियवर। ©सौम्या शर्मा

लघुकथा - भूख ©सौम्या शर्मा

नमन, मां शारदे नमन, लेखनी सुबह की चाय के साथ लाॅन में बैठे हुए सिन्हा जी अपने कुत्तों, चार्ली और शैडो को रोटियां डाल ही रहे थे कि तभी मेनगेट पर एक आर्त स्वर सुनाई दिया l "बाबूजी कुछ खाने को दे दीजिए!" सिन्हा जी के हाथ में रोटियों के टुकड़े देखकर अनायास ही उस भिखारी की आंखों में चमक सी आ गई l "पर यह रोटियां तो कुत्तों के लिए हैं!" सिन्हा जी ने लगभग टालते हुए कहा l कुछ क्षण को मौन पसर गया, मानों उस भिखारी ने स्वयं से ही मौन संवाद किया हो, "काश! मैं भी कुत्ता होता!" "बाबूजी कुछ तो दे दो... दो दिन से कुछ भी नहीं मिला !" उसकी आंखों से डबडबा कर गिरने को आतुर अश्रु अब धैर्य की हर सीमा को लांघ, बहने को आतुर थे l इसी बीच अचानक न जाने कब भूख के निरक्षर मनोविज्ञान ने उसे उदर पूर्ति का उपाय सुझाया और अकस्मात ही वह घुटने टेककर जमीन पर कुत्तों की भांति ही बैठ गया l "वो बाबू जी! अब तो मैं भी कुत्ता बन गया! अब तो रोटी देंगे ना?" सिन्हा जी निःशब्द और अवाक खड़े थे l पता नहीं यह भूख की जीत थी या मनुष्यता की हार! सोचिएगा अवश्य! ©सौम्या शर्मा

©सौम्या शर्मा

 तारे गिनता है रात भर कोई! रखता अपनी नहीं खबर कोई!! तुझको एक रोज देखने की जिद! करता हर रोज है सबर कोई!! दुनिया कहती है लौट के आ जा! तुझमें गुम है,है बेखबर कोई!! तेरी उसको नजर है ऐसी लगी! अब है लगती नहीं नजर कोई!! एक तेरी चाह में सुकूं से है! दूजी हसरत न उम्र भर कोई!! हाल उसका मैं क्या बताऊं तुझे! फिरता रहता है दरबदर कोई!! तेरा दीदार हो तो चैन आए! सदियों से कर रहा सफर कोई!! तू जो मिल जाए उसे झूम उठे! तेरी तलाश में हमसफ़र कोई!! ©सौम्या शर्मा

प्रतीक्षा ©सौम्या शर्मा

 वर्षों की प्रेम प्रतीक्षा का! तुम देना यह उपहार प्रिये! जब संगम की वेला आए! करना मुझको स्वीकार प्रिये! मेरा तप कठिन उर्मिला सा! लक्ष्मण से तुम हो व्रती प्रिये! संघर्ष हमारा चिरकालिक! है कठिन हमारी नियति प्रिये! फिर भी जब सुख के पल आएं! तुम करना अंगीकार प्रिये! स्वप्नों की स्वर्णिम शैया पर! बस करना मृदुल विहार प्रिये! वर्षों की प्रेम प्रतीक्षा का! तुम देना यह उपहार प्रिये! जब संगम की वेला आए! करना मुझको स्वीकार प्रिये ©सौम्या शर्मा

सूर्य ©सौम्या शर्मा

 सूर्य रक्तिम लालिमा का, खिल उठा देखो गगन में । नित्य अँधियारी निशा में, अनवरत श्रमदान करता । शांत रहकर वह निरन्तर, लक्ष्य हित संधान करता। आज देखो जगमगाता, वह ज्वलित हो निज अगन में । सौम्य पग को कंटकों ने , रक्तरंजित कर दिया था । किंतु था चट्टान सा वह, पूर्ण प्रण उसने किया था। है असम्भव कार्य सम्भव, यदि पिपासा हो लगन में । थी लगन उसकी अनोखी, यह स्वयं उसने किया था। लक्ष्य हित तन-मन समर्पित  , लक्ष्य हित जीवन जिया था । यज्ञ जीवन को समझकर, प्राण अर्पित हो हवन में । आज देखो खिलखिलाता, तेज से चमका सुआनन । स्वेद जिसको शुष्क करते, कर द्रवित सकते न पाहन! वह नहीं रोता नियति पर , जो नहीं सोता भवन में । सूर्य रक्तिम लालिमा का! खिल उठा देखो गगन में! ©सौम्या शर्मा

नारियल! ©सौम्या शर्मा

 वह नारियल! भीतर तरल! आवरण कठोर! अन्तर निर्मल! छद्मावरण जग के लिए! कंटक बिछे पग के लिए! संसार उसे निष्ठुर कहता! करूणा उदधि मन में रहता! है ज्ञात यह यदि कह दिया! है हास्य को संसार यह! सब कुछ छिपाए स्वयं में! रहता अडिग हर बार वह! वह नारियल! भीतर तरल! आवरण कठोर! अन्तर निर्मल! वह नारियल! ©सौम्या शर्मा

भारत का सत्य ©सौम्या शर्मा

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सत्य सनातन परम्परा का वाहक भारतवर्ष रहा l शाश्वत परिपाटी पर होता नव जीवन उत्कर्ष रहा ll इस धरती ने दंश सहे हैं,तीव्र हृदय आघात सहे l गहरे घाव बदन पर लिए अहिंसा क़े संदेश कहे ll भारत हारा नहीं वैश्विक नित नूतन छल-छंदों से! हारा है तो मीर जाफरों से घर के जयचन्दों से!! इस धरती ने ज्ञान दिया,वीरत्व सदा सिखलाया है l इस माँ ने चाणक्य,बुद्ध,बेटा प्रताप सा पाया है ll कोटि-कोटि है नमन धरा की पावन चंदन माटी को! चंदन सम पावन रज,सौ प्रणाम हैँ हल्दी घाटी को l हमने कर विश्वास और विश्वासघात प्रतिफल पाया! फिरभी छल-पाखंड हमारे शोणित मध्य नहीं आया ll गौरवमय इतिहास हमारा,प्रतिपल साहस देता है l सुखद भविष्य सूर्य उदयाचल से यह ढाढ़स देता है ll यह उदारता है दुश्मन को भी हम गले लगाते हैँ l किन्तु कुटिलता घाव पीठ पर विष बदले में पाते हैँ ll ~  ©सौम्या शर्मा Click Here For Watch In YouTube

मेरूदण्ड ©सौम्या शर्मा

 तुम बहुत नन्हें से थे! सुकोमल पांव तुम्हारे! जब आगे बढ़ने का प्रयास करते! लड़खड़ाकर गिर जाते थे तुम! पर तब वो बलिष्ठ हाथ! थाम लेते थे तुम्हें! वो उंगलियां पकड़ कर! कोमल हस्त तुम्हारा! चलना सिखाती थीं! आज ना! वही हाथ कांपते हैं! ढूंढते हैं सहारा तुम्हारा! तुम हो तो अच्छा है! पर नहीं हो तो बहुत बुरा है! क्योंकि वो बुजुर्ग जो ! परिवार और समाज के! मेरुदंड हैं! वो तुमसे कुछ नहीं चाहते! सिवाय दो पल पास बैठने के! उनका हाल- चाल पूछने के! उनके कांपते हाथों को थाम लेने के! फिर यह मत कहना ! कि सेवा का अवसर नहीं मिला! क्योंकि वो हमेशा नहीं होंगे! पर हां! देकर जाएंगे संस्कार! बच्चों को! अपनी छवि उनमें ही छोड़ जाएंगे! तुम्हारे पास इतना वक्त कहां !a कि कहानी भी सुना दो बच्चों को! यह जिम्मेदारी भी वही निभाते हैं! तुम हो तो अच्छा है! पर नहीं हो तो बहुत बुरा है!!   © सौम्या शर्मा

नहीं आते! ©सौम्या शर्मा

 कैद करना तस्वीरों में वो सुहाने पल सभी! लौटकर फिर वो बीते जमाने नहीं आते!! दूर से ही खैरियत सबकी पूछ लेते हैं अक्सर! रिश्ते नये जमाने के आंख मिलाने नहीं आते!! छूट जाते हैं कभी जब सफर-ए- जिंदगी में! कांधे पर रखने हाथ वो दोस्त पुराने नहीं आते!! लाख कोशिशें कर लेना, फिर बताना हमें यारों! क्यों इश्क में कभी होश‌ ठिकाने नहीं आते!! अंदर ही घुटते हैं,मौत से पहले ही मर जाते हैं! वो लोग दिल के राज जिनको बताने नहीं आते!! हमसे मुहब्बत करना गर तो सच्ची सी कर लेना! आजमाइशों वाले हमको  तो तराने नहीं आते!! मात यूं भी खा गए हम रिश्तों की कशमकश में! हमको इल्जाम किसी पर भी लगाने नहीं आते! दिल को इस कदर मेरे साफगोई की आदत है! हां या ना के बीच के कोई बहाने नहीं आते!! सहेजकर रखना उन अजीज यादों को दोस्त! लौटकर वो बचपन वाले दिन सुहाने नहीं आते!! आज के दौर में रिश्तों की आजमाइश मत करना! दूर हो जाते हैं लोग, गलतफहमी मिटाने नहीं आते!! ©सौम्या शर्मा

दिसंबर ©सौम्या शर्मा

 लेखा-जोखा स्मृतियों का! लाया है हर बार दिसंबर!! हर पीड़ा और हर आंसू का! मंथन है क्रमवार दिसंबर!! कितने अपने छोड़ गये हैं! कितने राहें मोड़ गये हैं!! कितनों ने जोड़ा है हमको!  कितने हमको तोड़ गये हैं!! लेखा-जोखा स्मृतियों का! लाया है हर बार दिसंबर!! हर एक भाव की पुनरावृत्ति! भावों का संसार दिसंबर!! कुछ पाया कुछ खोया भी है! लम्हों को संजोया भी है!! कुछ सीखा है कुछ बांटा है!! हंसकर दिल फिर रोया भी है!! प्रतिक्षण की स्मृति-गाथा बन! लो आया फिर यार दिसंबर!! लेखा-जोखा स्मृतियों का! लाया है हर बार दिसंबर!! ©सौम्या शर्मा