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ग़ज़ल ©शिवांगी सहर

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  छुपा  लेता   है  कुछ  कहता  नहीं  है, बुरा   है   दिल  मगर  इतना  नहीं  है। किसी से कह के क्या तअर्रुफ़ कराएं, ये  मुझसे  बात  ही  करता  नहीं   है। तुम्हें   कैसे   कहें   अपना   मुसाहिब,  हमारे   बीच   जब   रिश्ता  नहीं    है। भला  कैसे  भरें   अपनी  ख़ला   को, कोई  भी  दुख  मेरे   सुनता  नहीं  है। मेरे   मुर्शिद    मुझे   तू   फ़लसफ़ा  दे, मेरा  मन क्यों  कहीं  लगता  नहीं है। अजब  सी  कश्मकश  में  ज़िंदगी  है, है अच्छा और क्या अच्छा नहीं है। ख़लिश सी हो गयी ग़ज़लों से मुझको, "सहर" लिक्खा कोई पढ़ता  नहीं है। ©शिवांगी सहर

ग़ज़ल ©शिवाँगी "सहर"

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  बहर- बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम 1222 1222 1222 1222 भटक कर ज़िंदगी से मंज़िल अपनी भूल जाती है, कहाँ इसका किनारा है ये कश्ती भूल जाती  है। निकल जाती है इसकी उम्र सब रिश्ते निभाने में, कही किसने थी माँ वो बात कड़वी भूल जाती है। उसे सब याद रहता है मेरी आहट मेरी बोली, मगर हर बार मेरा नाम दादी भूल जाती है। किसी शिकवे के सारा दिन निभाती है ख़ुशी से वो,  बक़ा होती है क्या ख़ुद की ये पत्नी भूल जाती है। दबा लेती है ख्वाहिश देखकर वो मुफ़लिसी आपनी, खिलौने औ किताबें क्या हैं बेटी भूल जाती है। निशाना साध लेती है फ़क़त मासूम लोगों पर, ये दुनिया तैश में तर्ज़-ए-अदाई भूल जाती है। ©शिवाँगी "सहर"

ग़ज़ल ©शिवाँगी सहर

 तुम्हें  इतना  समझ  कर  हम   करें   कैसे  मोहब्बत  अब, ख़ुद  अपने आप  को  इतनी  भी कैसे दें अज़िय्यत  अब। किसी   को  रास   न  आये  फ़ज़ा  अपने  शहर  की  जब, तो  ज़बरन  साथ रहने  की  भी  दें  कितनी सहूलत  अब। ज़िंदगी  एक  तोहफ़ा   है  दिया  कुदरत  का  जिसमें  कि, बची  है  मौत  आने  में कुछ  ही पल  की  मसाफ़त  अब। तकल्लुफ़   पूछने  का   क्यूँ  खुला  है   दर  चले   जाओ, किसी की क्या मज़ाल इतनी जो तुमको दे इजाज़त अब। कि जब  तक सरहदों तक  चल रही थी  ठीक  थी लेकिन, यहां  पर  इश्क़  में  भी  कर  रहे  हैं  सब  सियासत  अब। लगा लो  लाख चेहरे औऱ दिखावा  कर  लो  कितना  भी, नहीं  दिखती   कहीं...

चलना होगा ©शिवाँगी सहर

 सोच  कर घर  से  जब चला  होगा, जानता   ही  नहीं  कि  क्या  होगा। हो हक़ीक़त से  तुम  नहीं  वाकिफ़, ये  ग़लत  है  कि  सब  पता  होगा। जिसका  सच कटघरे  में  आया है, झूठ  शायद   कभी   कहा   होगा। यूँ  बहुत  सख़्त था वो  आदम पर, भावनाओं   में   बह   गया   होगा। दर्द   में   भी  जो   मुस्कराता    है, कितना अंदर  से  वो  भरा  होगा। मेरा   लिक्खा   हुआ  पढ़ा   उसने, ये   गलत    आपने   सुना   होगा। आँसुओ का  असर नहीं जिस पर, शख्श  पत्थर का फ़िर बना होगा। मील  पैदल  चला   सदा  सुनकर, कैसा  दिल को  भरम हुआ होगा। चाह  कर भी  न  माफ़ कर  पाए, उम्र  भर  एक  यही  गिला  होगा।   ...

ग़ज़ल ©शिवाँगी सहर

 आ  रहा  याद  जो   था   भुलाया  हुआ, इस क़दर कुछ  है मुझमें समाया  हुआ। देखते   हैं   सभी   मेरी  आँखों   को  यूँ, जिसको हमने था  सबसे बचाया  हुआ। लाख  पर्दा  करो  तुम  हक़ीक़त  से पर,  साफ़ दिखता  है जो  है  छिपाया हुआ। क़त्ल   इंसां  ने   धरती  पे  इतने  किये, आसमाँ   ख़ून   से   है   नहाया   हुआ। सोचते  हैं  कि   इक़रार  कर  लें  मगर, दिल किसी  का बहुत  है सताया हुआ। कौन  किसका  यहाँ साथ दे अब भला, हर  कोई है  किसी  का  रुलाया  हुआ। है  ख़बर हमको  मशगूल थे  तुम कहाँ, है    बहाना    तुम्हारा   बनाया    हुआ। चाँद  रातों  से  उल्फत बहुत  थी  सहर, चाँद   लेकिन   हमारा ...

और क्या है ©शिवाँगी सहर

 कहा  है   जो   सही  है  और   क्या  है, यहाँ   तेरी   कमी   है   और  क्या   है। कोई   पूछे   तो   कह  देते   हैं  इतना, वो  मेरी   ज़िंदगी   है   और  क्या   है। यकीं करते हो जिन बातों को सुनकर, सभी  कुछ  अनकही है और क्या  है। अना   में   है  कोई   उसको   बताओ, तुझे   बस  चाहती  है   और  क्या  है। मोहब्बत  जो न  समझे उनसे  कहना, महज़  एक   दोस्ती  है  और  क्या  है। है  नाचे  जिसकी  धुन पर राधिका यूं, किशन  की  बाँसुरी  है  और  क्या है। समझ  कर  आग  जिससे भागते  हो, सुनो   बस  रोशनी   है  और  क्या  है। न   समझे  हाल  जो...