नमन माँ शारदे नमन लेखनी आञ्जनेय छंद ११ वर्ण १६ मात्राएं राम नाम जप करते प्यारे कष्ट हरें हनुमान हमारे।। रवि को लील गए फल जाना। जै जै जै हनुमत बलवाना।। वेद धर्म के हनुमत ज्ञाता। कष्ट निवारक सुख के दाता।। राम नाम नित धुनी लगाई। भक्ति आपकी है फलदाई।। राम राम प्रभु राम पुकारे। कष्ट हरें हनुमान हमारे।। नाम आपका अति सुखकारी। नाथ हरो मम संकट भारी।। जनक दुलारी की सुधि लाए। मारि मारि खल मारि गिराए। प्राण लखन के नाथ बचाए। ले कर बूटी हनुमत आए।। सेवक हनु हैं राम दुलारे। कष्ट हरें हनुमान हमारे।। चित्त शुद्धि करते हनुमाना। रुद्र अंश भगवान सुजाना।। दीन बन्धु के आप सहायक। संकट मोचन सेना नायक ।। निर्मल जन को कंठ लगाए। छलिया कपटी कभी न भाए।। आन खड़े हम प्रभु के द्वारे । कष्ट हरें हनुमान हमारे।। कृपा करें कपि हैं दुख हर्ता। मंगल मूरत मंगल कर्ता।। लाल सिंदूरा बदन लगाए। बैठ गए प्रभु ध्यान लगाए।। रक्षा करते हनुमत देवा। राधव की करते नित सेवा। राम नाम भव सागर तारे। कष्ट हरें हनुमान हमारे।। दीप जलाकर शीश नवाऊँ। कीर्तन भजन आरती गाऊंँ।। मंगलवार सु-मंगलकारी। शनि के बजरंगी उपचारी।। रामदूत हे! मारु...
नमन माँ शारदे नमन लेखनी छन्द- सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८, यति - १६,१२ चरणान्त - SS दीन-हीन मैं नाथ अकिञ्चन, द्वार तुम्हारे आया। आर्द्र नयन, आहत अन्तर्मन, पास तुम्हारे लाया। तुम असीम, मैं बिन्दु मात्र हूँ, तुम सागर मैं धारा। मेरी लघुता को प्रभु अपना, दे दो अमित सहारा।। पतझड़ में ज्यों सूखा पत्ता, सङ्ग पवन के बहता। अन्तहीन सम मरुथल में मैं, अपनी पीड़ा सहता।। तुम हो अडिग हिमालय स्वामी, मैं नगण्य रज कण हूँ। तुम जीवन हो प्राण जगत के, मैं क्षणभङ्गुर क्षण हूँ।। जैसे तृषित कपिञ्जल पाखी, घन की राह निहारे। वैसे ही दो नयन प्रतीक्षा, करते द्वार तिहारे।। काल-चक्र की द्रुत धारा में, तिनके सा बहता हूँ। मौन व्यथा के कारागृह में, घुट-घुट कर रहता हूँ।। शून्य हृदय के इस मरुधर पर, करुणा-मेघ गिरा दो। जनम-जनम की अमिट तृषा पर, कृपा कटाक्ष फिरा दो।। मिटा सको तो मुझे मिटा दो, चाहे अंङ्क लगा लो। शरणागत हूँ मेरे भगवन्...
हिंदी दिवस पर आयोजित छंद लेखन प्रतियोगिता के परिणाम। इस प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रदत्त विधाता छंद पर सभी रचनाकारों ने विधाता छंद पर आधारित सुंदर सृजन कर हमें भेजे। चयन निश्चित रूप से कठिन था। सभी विजेता रचनाकारों को अनंत शुभकामनाएं। सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की शुभकामनाएं💐 रचनाएं एवं रचनाकार * प्रथम - आ० रश्मि शुक्ल 'किरण' जी* नमन लेखनी विधाता छंद आधारित गीत मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मान है हिंदी। अगण इसमें विधाएंँ हैं, गुणों की खान है हिंदी।। सुग्रंथों में प्रवाहित हो, रही है ज्ञान की गंगा। करे हर चित्त को निर्मल,मनोबल को रखे चंगा।। लिखे साहित्य हैं अगणित, अनेकों ही विधाएंँ हैं। सुवासित ग्रंथ हैं पावन, विदूषी सी ऋचाएंँ हैं।। प्रवाहित हो रही सुर में,सुरीली तान है हिंदी। मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मान है हिंदी।। व्यथित कोमल द्रवित हृद में,बरसता आ गया सावन। मिले स्वर साथ में व्यंजन,सुघड़ अक्षर हुए पावन।। खिले नव छंद से उपवन,अनोखी बह रही सरिता। पहन कर भाव के भूषण, अलंकृत हो गई कविता।। प्रचुर भंडार शब्दों के,अतुल विद्वान है हिंदी। मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मा...
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