नमन माँ शारदे नमन लेखनी छन्द- सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८, यति - १६,१२ चरणान्त - SS दीन-हीन मैं नाथ अकिञ्चन, द्वार तुम्हारे आया। आर्द्र नयन, आहत अन्तर्मन, पास तुम्हारे लाया। तुम असीम, मैं बिन्दु मात्र हूँ, तुम सागर मैं धारा। मेरी लघुता को प्रभु अपना, दे दो अमित सहारा।। पतझड़ में ज्यों सूखा पत्ता, सङ्ग पवन के बहता। अन्तहीन सम मरुथल में मैं, अपनी पीड़ा सहता।। तुम हो अडिग हिमालय स्वामी, मैं नगण्य रज कण हूँ। तुम जीवन हो प्राण जगत के, मैं क्षणभङ्गुर क्षण हूँ।। जैसे तृषित कपिञ्जल पाखी, घन की राह निहारे। वैसे ही दो नयन प्रतीक्षा, करते द्वार तिहारे।। काल-चक्र की द्रुत धारा में, तिनके सा बहता हूँ। मौन व्यथा के कारागृह में, घुट-घुट कर रहता हूँ।। शून्य हृदय के इस मरुधर पर, करुणा-मेघ गिरा दो। जनम-जनम की अमिट तृषा पर, कृपा कटाक्ष फिरा दो।। मिटा सको तो मुझे मिटा दो, चाहे अंङ्क लगा लो। शरणागत हूँ मेरे भगवन्...
मंजरियाँ मनमोहक वन में, एक तिलंगी लहराती। कोकिल कंठ विराजे जैसे, श्याम अधर वंशी गाती। मन उपवन में पुलक प्रीति पल, नाच रही चंचल डाली। भृंग झूमते मोद मनाते, कुसुमों की हर्षित आली। किसलय कोमल स्निग्ध सरोवर, संचित अमिरस अम्लानी। कुसुम कलश से छलके शीतल, तृषा-हरक निर्मल पानी। बैठ बटोही निर्जन तटपर, गढ़ता नूतन परिभाषा। संधित करता वह सरिता उर, होती पूरन अभिलाषा। साल रहे थे शूल नुकीले, या कलकल तरल तरंगें। पा न सका पर्याय पंथ का, झोली में दमित उमंगें। उद्गम के आगे स्वयं साधते, कहते सारे विज्ञानी । पाँव शिथिल अनुराग तिरोहित, भीत क्रीत या अभिमानी। चंद चरण चंचल चलकर वह, जाने किस मग में खोता। हवन-कुंड में अनल धधकता, पास नहीं पर वह होता॥ तिल-यव का आहुति सौरभ, सुरभित जग को कर जाता। एक छलावा धूम मचलकर, लोप अनिल में तर जाता॥ संदेशा रग भावन भरता, अधरों का कर अगवानी। साँस विलय मकरंद मलय में, ललिता कलिता अवधानी। पलकों पर है भार लाज का, या छलना है अपनों का। चिंतन में मुकुलित नयनों से, पथ निहारती सपनों का। नील निलय निस्पंद खड़ा है, टिमटिम करते क्यों तारे? ...
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