ग़ज़ल, नज़्म प्रतियोगिता नियमावली ग़ज़ल या नज़्म का दिया गया हर्फ़ है “ रवानी ”। आप ग़ज़ल में “रवानी” लफ़्ज़ को रदीफ़, क़ाफ़िया, या किसी मिसरे के किसी भी लफ़्ज़ की तरह प्रयोग में ले सकते हैं या “रवानी” लफ़्ज़ को उनवान बनाकर नज़्म कह सकते हैं। ग़ज़ल में काफ़िया (तुकांत) एवं रदीफ़ (पदांत) शाइर अपनी स्वेच्छा अनुसार रख सकता है एवं ग़ज़ल का बा-बह्र होना अनिवार्य है। नज़्म का उनवान के इर्द-गिर्द होना अनिवार्य है। निर्णायक मंडल लेखनी परिवार से ही होगा एवं निर्णायक मंडल के सदस्य इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाएंगे। उनके सिवा कोई भी, किसी भी उम्र का लेखक प्रतियोगिता में भाग ले सकता है। ग़ज़ल या नज़्म का मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित होना अनिवार्य है। निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम होगा। लेखक गण अपनी ग़ज़ल/नज़्म 1 सितंबर 2026 रात्रि 12 बजे से पहले रचना लेखनी की मेल आई.डी.- lekhanisahitya@gmail.com पर अपने परिचय के साथ भेजें। विजेता ग़ज़लकारों/नज़्मकारों को लेखनी परिवार की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किये जाएंगे एवं उनकी ग़ज़ल/नज़्म उनके परिचय के साथ लेखनी के आगामी संकलन में प्रकाशित होगी। छंद, कविता, गीत एवं गद्...
Sabse phele maa sharde ko namam aur saath mai maa lekhni ko namam mai apni rachna padhne ja raha hoo मेरी पहली कविता मेरी माँ को समर्पित है जिसका शीर्षक है "माँ" माँ तू कैसे जान जाती है?? तू दूर होकर भी मेरी आवाज़ से मेरी तबीयत जान जाती है, जो मेरे पास होकर भी नही जान पाते। तू कैसे जान जाती यह फोन तेरे बेटे ने ही किया है। तुझे कैसे पता चल जाता है मेरी गलतियों का।। माँ तू कैसे जान जाती है?? तू कैसे जान जाती सबकी ज़रूत को, और सबकी आदतों को, तू कैसे भूखे रहकर बाकी का पेट भर देती है, बहाने में कहती है कि तुझे भूख नही है। तू कैसे अपने सपनों को छोड़ कर अपने बच्चो का सपना पूरा कर लेती है, माँ तू कैसे कर लेती है?? बीमार होने पर भी स्वस्थ होने का बहाना बनाती है और बीमार होकर भी घर का सारा काम कर लेती है।। माँ तू सब के लिए दीवार बन खड़ी हो जाती है।। तू अपने को चुनने से पहले अपने परिवार को चुनती है माँ तू कैसे कर लेती है?? माँ तू कभी अपने दर्द छुपाकर दूसरों का दर्द कम कर देती है। अपनी मदद करने से पहल...
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