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ग़ज़ल ©परमानंद भट्ट 'परम'

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी याद कर बीते  पलों को ,हाय सिहर जाता हूँ मैं ज़ख़्म जो उसने दिये थे,रोज सहलाता हूँ मैं जब दिया थकने लगा इस तीरग़ी के सामने सूर्य बोला फ़िक्र मत कर,लौट कर आता हूँ मैं  हूँ भले नादान लेकिन,आज के इस दौर में  कब कहां धोखा मिलेगा,सब समझ पाता हूँ मैं  मैं तेरे दीदार को हर रोज़ आता हूँ यहां  बंद खिड़की देखकर फिर रोज पछताता हूँ मैं  भीड़ बहरों की यहाँ है,यह मुझे मालूम फिर यह समझ आया नहीं है,गीत क्यूँ गाता हूँ मैं  सैकड़ों पत्थर दिलों के,अक्स असली देखकर "एक शीशा हूँ कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं "  स्वर्ग क्या है नर्क कैसा,भेद जब जाना नहीं  उस 'परम'का नाम लेकर,क्यूँ ये समझाता हूँ मैं ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानंद भट्ट

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी किसी का दिल नहीं मिलता, किसी से दिल नहीं मिलता, मुक्कमल  इस जहां में है बहुत मुश्किल नहीं मिलता । नज़र बस नुक़्स ही आते तुम्हें  किरदार  में सबके, भरी दुनिया में तुमको  क्यूँ कोई काबिल नहीं मिलता। उसे हम किस तरह अपना समझ कर पास बैठाते, हमारे दर्द में तो वो कभी शामिल नहीं मिलता।  कहाँ हम ढूँढने जाते ख़ुशी  के अस्ल  क़ातिल को, हमें खुद से बड़ा कोई यहाँ क़ातिल नहीं मिलता। जगी है भोर तक आँखें किसी की याद में उसकी , वगरना  शख़्स वो यूँ नींद से बोझिल नहीं मिलता। जिसे  पतवार से धोखा मिला उस नाव को यारो, हवाएँ साथ में होते हुए साहिल नहीं मिलता। 'परम' आनन्द पाने के लिए एकांत में बैठो , कभी भी भीड़ में या ये भरी महफ़िल नहीं मिलता। ©परमानन्द भट्ट

दोहे- मधुमास ©परमानन्द भट्ट

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी आस रखें मन में सदा, अडिग रखें विश्वास। हर पतझड़ के बाद में, आता है मधुमास।। मौसम यह मधुमास का, आया तेरे द्वार। घूंघट  के पट, खोलकर, आज लुटा दे प्यार।। मौसम यह मधुमास का, मुश्किल मिलता यार। आओ जी भर लूट ले, खुशबू का संसार।। उसके मन मधुमास है, जिसके मन में नेह। खुशबू यह बसती मिली, हमें प्रेम के गेह।। मघुघट यह मधुमास में, छलक रहा दिन रैन। विरहा को करता सदा, यह मौसम बेचैन।। महक रहे मधुमास में, मन के देश गुलाब। रात दिवस आते हमें, बस खुशबू  के ख्वाब।। करने दो मधुमास में, मन से मन की बात। जागे जागे काटनी, हमको प्यारी रात।। कोष लुटाकर गंध का, हंसते रहते फूल। कहते संचय भाव ही, सारे दुख का मूल।। मेरे मन मधुमास था, मन उसके पतझार। कैसे करता प्रेम को, वह दिल से स्वीकार।। मत कर तू मधुमास की, बीत गयी वह बात। बार बार मिलती नहीं, वह मनमोहक रात।। मादक यह मधुमास तो, जीवन में दिन चार। नहीं हमेशा के लिए, मिले महकती ड़ार।। मधुकर यह मधुमास में, रैन दिवस बौराय। इस लोभी को गंध का, संग निरंतर भाय।। आता है मधुमास में, वह मिलने को रात। पर दिन में करता नही, खुलकर के वह बात।। आया ...

दिखाई दे ©परमानन्द भट्ट

  नज़र से दूर होकर भी उसी का दर दिखाई दे मुझे तो ख़्वाब में भी अब वही अक्सर दिखाई दे अलौकिक रूप का दर्शन अवध के धाम होते ही  नयन को रात दिन केवल सिया के वर दिखाई दे  उपस्थित हैं वही इस सृष्टि के हर एक कोने में करें क्या हम अगर तुमको महज़ पत्थर दिखाई दे अवध के धाम से बाहर निकल कर ओ मेरे रघुवर हमारी चाह है तू देश के हर घर दिखाई दे हमारा जी नहीं भरता, झलक को देख लेने से हमारे सामने आकर हमें जी भर दिखाई दे सभी में वो विराजित है बड़ा हो या भले छोटा कोई भी शख़्स हमको किसलिए कमतर दिखाई दे 'परम' के प्यार की ख़ुशबू समाई जब से तन मन में हमें तो हर तरफ बस ख़ुशनुमा मंजर दिखाई दे  ©परमानन्द भट्ट

गीत- बदला है ©परमानंद भट्ट

भूख गरीबी बदहाली का काला  मंज़र बदला है, मौसम सचमुच बदल गया या सिर्फ़ कलैण्ड़र बदला है। पाँच वर्ष में सत्ताओं के ताज बदलते देखें है, और साथ में साजिंदे सब साज बदलते देखे हैं, बात-बात पर गिरगिट जैसे रूप  बदलते लोग यहाँ, धन बल गुंडाबल करता है सत्ता का उपयोग यहाँ, अफ़सर, नेता बाबू वो ही, केवल दफ़्तर बदला है, मौसम सचमुच बदल गया या सिर्फ़ कलैण्डर बदला है। दीवारों पर रंग-बिरंगे आप कलैण्डर टांँग रहे, बुनियादी कुछ प्रश्न अभी भी सब से उत्तर माँग रहे, साल बदलते जाते हैं पर चाल बदल कब पाए हम, दीवारों पर मकड़ी वाले जाल बदल कब पाए हम, ध्यान रहे यह उस क़ातिल का केवल खंजर बदला है, मौसम सचमुच बदल गया या सिर्फ़ कलैण्डर बदला है। बदलावों की अमर कहानी, लिखने का अवसर आया, नये साल का नया नवेला,यह सूरज घर घर आया, विश्व-जयी भारत का परचम, दुनिया में फहराना है, नये साल में सकल विश्व को, जय जय भारत गाना है, वही मनुज लाता परिवर्तन, वो जो अंदर बदला है, मौसम सचमुच बदल गया या , सिर्फ़ कलैण्डर बदला है। ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानन्द भट्ट

  सूने रहे हैं रात भर रस्ते दयार के फिर कौन जगमगा गया दीपक मज़ार के रोते रहे जो उम्र भर हम ग़ैर के लिए लगता है अब वो थे सभी आँसू उधार के आया नहीं वो रात भर जिसकी तलाश थी गुज़रा था तन्हा चांद भी शब को गुज़ार के  जब भी बना मैं बोझ तो उसने सहा नहीं  फैंका था एक पल में ही रिश्ता उतार के  थे और लोग मर गये जो इंतज़ार में अब कौन बाट देखता रस्ता बुहार के उस पालकी के भाग्य में क्या है लिखा हुआ हासिल हुए नहीं जिसे कंधे कहार के जब वो हमारे साथ थे मौसम था ख़ुशनुमा अब भी 'परम' को याद है दिन वो ख़ुमार के ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानंद भट्ट

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी तेरी मौजूदगी माहौल में जादू जगाती है, हज़ारों फूल खिलते हैं अगर तू मुस्कराती है।   हरा या सुर्ख़ पीला रंग तुम पर ख़ूब  फबता पर, गुलाबी रंग की साड़ी मुझे बेहद सुहाती है। लरज़ कर डालियाँ उसको गले अपने लगा लेतीं , चमन में शोख़ चिड़िया जब चहकने लौट आती है। न जाने कब कहाँ पर मौत आ हमको‌ दबोचेगी, झपट्टा मार कर बिल्ली कि ज्यूँ चूहा  दबाती है। मुझे जिस नाम से अम्मा बुलाती थी जगाने को, अभी तक कान में मेरे वही आवाज़ आती है। हमें उसकी ज़रूरत है उसे है ये ग़लतफ़हमी, "ज़रा देखें हमारी बेरुख़ी क्या रंग लाती है"। 'परम' के प्यार में पागल फ़कीरों ने बताया ये, जिसे वो चाहता उसको सदा दुनिया सताती है। ©परमानन्द भट्ट

नहीं ©परमानन्द भट्ट

 बातें करता अगर वो हवाई नहीं देनी पड़ती उसे फिर सफ़ाई नही नूर उसका बसा जब नयन में मेरे कोई तस्वीर दूजी समाई नहीं अब ख़ुदा  ही करेगा तेरा फैसला झूठी चलती वहाँ पर गवाही नहीं रूठ कर चल दिये मुझसे मेरे सनम बात दिल की जो मैंने बताई नहीं साथ ग़म के  ही मेरा गुजारा हुआ इस ख़ुशी से हुई क्यूँ सगाई नहीं मेरी बातों पे थोड़ा यकीं भी करो  "है वहम की जहाँ में दवाई नहीं"  ये 'परम' तो बसा है नयन में तेरे ये अलग बात देता दिखाई नहीं © परमानन्द भट्ट

लाड़ली ! ©परमानन्द भट्ट

 तू मेरा दिल जान लाड़ली । मेरे घर की शान लाड़ली । शोख़ फुदकती सोन चिड़ी सी, बगिया की मेहमान लाड़ली । तेरे से ही घर बन पाया, जो था सिर्फ मकान लाड़ली । मेरे घर के वृन्दावन में मीठी मुरली तान लाड़ली । मिट जाती मर्यादा खातिर, रखती घर का मान लाड़ली । साँसों में ख़ुश्बू  भरती हैं तेरी ये मुस्कान लाड़ली । मानस की सुन्दर चौपाई, गालिब़ का दीवान लाड़ली । बेटो को सब रतन समझते, पर रत्नों की ख़ान लाड़ली | शक्ति स्वरुपा तू सबला है तलवारों  को तान लाड़ली । पथ की बाधा से घबराकर, मत करना विषपान लाड़ली । ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानन्द भट्ट

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  कहानी मुख्तसर लिख तू मगर कुछ खूबसूरत हो, भले छोटा सा हो लेकिन सफर कुछ खूबसूरत हो।  कभी माँगे नहीं तुमसे गुलों की काफिले मैंने, जरा सी छांव दे ताकि डगर कुछ खूबसूरत हो।   सभी को आँख दी है तो सलीका भी सिखा जिससे, निगाहें हो सलोनी सब, नज़र कुछ खूबसूरत हो।  मिलें जब भी किसी से हम, हमेशा याद वो रक्खे, हमारी बात का उस पर, असर कुछ खूबसूरत हो।  महल सड़कें बढाने से, यहाँ पर कुछ नहीं होगा, मुहब्बत भी बढ़ा  जिससे, नगर कुछ खूबसूरत हो।  कभी आ के मिलो मुझसे  भले ही ख्वाब में जिससे, अजाने शहर  में मेरा , बसर कुछ खूबसूरत हो।  इधर तो कुछ नहीं ऐसा, 'परम' सुंदर कहें जिसको, चलो उस पार चलते हैं, उधर कुछ खूबसूरत हो।  ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानन्द भट्ट

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी    गाँव हर शहर में सूरज का रिसाला जाये, भोर होने को है अब दौर ये काला जाये।  आँख खुलते ही जो हर रोज़ बिखर जाता है, आज से आँखों में वो ख़्वाब न पाला जाये ।  जिनके गीतों में महकती है वतन की ख़ुशबू, उनके कंधों पे अदब का ये दुशाला जाये।  पेड़ पर बैठे परिंदे का भी हक है फल पर, अब यहाँ से कोई पत्थर न उछाला जाये ।  है बहुत काम भले ही हमें दफ़्तर घर के, बाप के साथ भी कुछ वक्त निकाला जाये।  आज सूरज से खुलेआम कहेंगे हम सब, "गाँव के आखिरी घर तक भी उजाला जाये"।  ये 'परम' प्यार की गंगा है बचा लो इसको, कोई कूड़ा यहाँ नफ़रत का न डाला जाये।  ©परमानन्द भट्ट

ग़ज़ल ©परमानन्द भट्ट

 हुई जब सुब्ह तो हिस्सा बना दिल की कहानी का तुम्हारा ख़्वाब था या फूल कोई रातरानी का ज़िगर का खून जब अल्फ़ाज़ में ढलता ग़ज़ल होती महज़ किस्सा नहीं यह आँसुओं की तर्जुमानी का  पिया जब जह्र तो सुकरात ने हँसकर कहा सबसे यही तो हश्र होना था हमारी सच ब़यानी का  जलेगा उम्र भर या तू उसी में डूब जाएगा जिसे सब इश्क़ कहते वो समंदर आग पानी का  शिखर को छोड़ कर बेताब हो वह दौड़ती‌ क्यूँ है समंदर जानता है  राज नदियाँ की रवानी का  हमारे द्वार पर आकर हमेशा लौट जाती वो हमें मौका नहीं देती सफलता मेज़बानी का  खिलाता फूल जो हर दिन, सुखाता भी वही उनको युगों से सिलसिला जारी,'परम' की ब़ागब़ानी  का © परमानन्द भट्ट

गीत- कदम ©परमानन्द भट्ट

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी    आगे बढ़ना हो तो पहले कदम बढ़ाने पड़ते हैं, संकल्पों के पर्वत अपने शीश उठाने पड़ते हैं। धूप छाँव की आँख मिचोली, आँसू, आहें, हँसी-ठिठोली, जिसको हम सब सुख कहते हैं, सच में वह दुख का हमजोली, सुख के पथ पर पीड़ाओं के कई ठिकाने पड़ते हैं, आगे बढ़ना हो तो पहले कदम बढ़ाने पड़ते हैं। भटक रहा मन का मछुआरा, जर्जर नैया दूर किनारा, गीत अधूरा रहता सबका, कहता सांसों का इकतारा, कसकर मन की इस वीणा के तार बजाने पड़ते हैं, आगे बढ़ना हो तो पहले कदम बढ़ाने पड़ते हैं। आँखों में आकाश सजाकर, मन में नव विश्वास सजाकर, और भुलाकर कल की पीड़ा, आँगन अपने आज सजाकर, नैन नगर में जाने कितने अश्क छुपाने पड़ते‌ हैं, आगे बढ़ना हो तो पहले कदम बढ़ाने पड़ते हैं। बीत गई अब बात गई वो, भूलो, काली रात गई वो, चाँद गगन में हँसकर कहता, तारों की बारात, गई वो, कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो बिसराने पड़ते हैं, आगे बढ़ना हो तो पहले कदम बढ़ाने पड़ते हैं। ©परमानन्द भट्ट

नई नई है! ©परमानन्द भट्ट

 आँखों में आज उनके रंगत नई नई है सपने नये नये यह चाहत नई नई है पहले मिलन की ख़ुशबू, नस नस मे भर रही जब दीवाना सोचता यह शिद्दत नई नई है दो अज़नबी  मिले फिर हमराह बन गये वो जीवन के रास्ते  में, संगत नई नई है  कैसी कसक है दिल में, कैसा नशा ये छाया इस मयक़शी  की उनको , आदत नई नई है  रक्तिम हुई है आँखे, लब हो गये गुलाबी कुछ जुस्तज़ू नई है हसरत नई नई है  यारी ग़मों  से अपनी, टूटी नहीं है अब तक ख़ुशियों  के संग मेरी, निस्बत नई नई है  उनको 'परम' से मिलकर, कुछ ऐसा लग रहा है जैसे जगी ये उनकी, क़िस्मत  नई नई है   ©परमानन्द भट्ट

गुज़री है ©परमानन्द भट्ट

 हमारे द्वार से दिलक़श  बहार गुज़री है ख़ुशी  के पल हमें देकर उधार गुज़री है चमन में ख़ून से लथपथ परिंदे चीखते हैं हवा भी साथ में लेकर कटार गुज़री  है मिली है  मात तो घबरा के बैठ मत जाना  हमारे साथ तो यह बार बार गुज़री है हमारा मौन भी उनको लगा बग़ावत  सा "वो बात उन को बहुत ना- गवार गुज़री है"    मिलेगी  खाइयाँ कल देखना यहाँ गहरी  घरों के बीच से ऐसी दरार  गुज़री है महक से भर गयी है आज ये गली यारों वो थोड़ा वक्त यहाँ गुज़ार गुज़री है  'परम' के नैन से भी तब छलक गये आँसू ज़मीं  से अब़्र  में कातर पुकार गुज़री है ©परमानन्द भट्ट

महकते हैं ©परमानन्द भट्ट

 धड़कने सुलगती जब, दिलजले महकते हैं आती जाती यादों के, सिलसिले महकते हैं आती है महक जिनके, ज़िस्म  के पसीने से उनके ज़ख्मी पांवों के, आब़ले  महकते हैं दूरी हो भले लेकिन, दिल से दिल के मिलने पर मंजिलें निकट आती, फ़ासले महकते हैं सुरमई अँधेरे में, शाख़ों  के लरज़ने पर फूल रजनीगंधा के, दिन ढले महकते हैं तेज बहते धारे में, माँझी के उतरने पर कश्तियाँ मचल उठती, होंसले महकते हैं  सत्य जब प्रकट होता, न्याय के उजाले में धूप बत्ती चंदन से, फ़ैसले महकते हैं साधना ये सरगम की, पूरी जब 'परम' करते शब्द श्लोक बन जाते, तब गले महकते हैं ©परमानन्द भट्ट

रोने पे रो दिये ©परमानन्द भट्ट

 जो हो चुका  था आज उस होने पे रो दिये कुछ लोग गुज़रे वक्त के रोने  पे रो दिये है हाथ में उसको सदा मिट्टी ही मानकर जो मिल न पाया था उसी सोने पे रो दिये रोने का जिनको मर्ज था रोते रहे यहाँ पाने को रो दिये कभी खोने पे रो दिये गोदी में अम्मा की जहाँ सोया किये थे हम सिर को टिकाकर आज उस कोने पे रो दिये भाया नहीं पावन ' परम' तुलसी उखाड़ना हम नागफन की पौध के बोने पे रो दिये ©परमानन्द भट्ट

दुखों के कैद खाने से ©परमानन्द भट्ट

 यहाँ अब रोशनी होगी, नया सूरज उगाने से अंधेरा कम नहीं होगा, फ़कत दीपक जलाने से हमें हर बार वो मिलकर, , नये कुछ जख़्म देता है सुकूँ मिलता उसे शायद, हमारा दिल  दुखाने से सजा कर प्यार चेहरे पर, जगाते होठ पर जादू हजारों फूल खिलते तब, तुम्हारे मुस्कुराने से  बजी है सांस में सरगम, महकता मोगरा मन में जले है सैकड़ों दीपक, तुम्हारे लौट आने से हँसी के साथ में थोड़ा, यहाँ रोना जरूरी है खुशी का कर्ज बढ़ता है, महज हँसने हँसाने से  कफ़स अवसाद का सारी, उड़ानें छीन लेता हैं "सुनो अब भी निकल आओ, दु:खों के कैदखाने से" ' परम 'यह प्यास नदियाँ की, मिलाती सिंधु से उसको उसे मिलता मजा सच्चा, सदा खुद को मिटाने से ©परमानन्द भट्ट

सँभलते-सँभलते ©परमानन्द भट्ट

नज़र को झुकाए सँभलते सँभलते तेरे दर पे आये  सँभलते सँभलते छुपाकर गमों को, हँसे भी थे हम पर नयन डबडबाए सँभलते सँभलते जमाने से नज़रें बचाते हुए वो मेरे पास आए सँभलते सँभलते कलेजा कटा था विदा के क्षणों में  मगर मुस्कराये  सँभलते सँभलते चले जा रहे हम तेरे दर से गम की ये गठरी उठाये सँभलते सँभलते बहुत चाहा हमने रहें होश में पर कदम लड़खडाए  सँभलते सँभलते  हकीकत जो जानी तो दैर-ओ- हरम से 'परम ' लौट आये सँभलते सँभलते ©परमानन्द भट्ट

बहुत है ©परमानन्द भट्ट

 अकेले में हमें मिलता बहुत है मगर वो भीड़ में बचता बहुत है यही  है वक्त की उससे शिकायत गमों के दौर में हँसता बहुत है जिसे दुनिया दिवाना कह रही है हमें वह शख़्स ही जँचता बहुत है हमारे ख़्वाब में कल आप आये निभाया आपने रिश्ता बहुत है कहा जब सत्य हमने लोग बोले ये पागल आदमी बकता बहुत है तअल्लुक़ जो वतन से छोड़ आया 'मुजाहिर आँख में चुभता बहुत है' 'परम' को पा लिया जिसने यहाँ वो हमेशा मौन ही रहता बहुत है ©परमानन्द भट्ट