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सम्पूर्णता ©रजनी सिंह

  जैसे दो समानांतर रेखा आपस में कभी नहीं मिलती मगर साथ साथ चलती हैं ठीक उसी तरह हमदोनों के विचार हैं,,अलग अलग किन्तु साथ साथ। ऐसी मान्यता है की समानांतर रेखाएँ अनंत पर मिल जाती हैं तो किसी ना किसी छोर पर हमारे विश्वास और विचार एक होते होंगे l जैसे दिन का रात से ना मिलना, मगर साँझ को देखने  से प्रतीत होता है कि दिन और रात अपने अपने अस्तित्व को खोकर एक हो गए हों ,,एक होने और भिन्न होने में बस विचारों का खेल है,जैसे ही विचार समाप्त होते हैं ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है,,जहां न तुम होते हो ना हम होते हैं होता है तो केवल और केवल संपूर्ण सत्य l ©रजनी सिंह "अमि"

साँस चलती है.. ©रजनी सिंह

 साँस चलती है.. साँस चलती है..  तेरे नाम से महका है बदन l इस क़दर चलती है दिलबर मेरे दिल की धड़कन ll शाम ए शब साथ तेरे, बीते हमराज मेरे l दाँव पे दाँव दिल के हारी हूँ यार मेरे l हार बैठी हूँ, सही जाए न नज़रों की चुभन ll बर्फ में आग लगे, उनसे ज़ब आँख लगे l लाख अरमान जगे, दिल में तूफान जगे l दिल में तूफान जगे और सुलग जाए मन ll ©रजनी सिंह "अमि"

अंतरद्वन्द ©रजनी सिंह

 कुछ है अनकही सी  अधूरी सी मगर पूरी  तुम हो के न हो  एक एहसास चारों तरफ तुम्हारी  आगोश में होने का कुछ कहूँ तो कैसे  चुप रहूँ तो कैसे  अजीब कश्मकश है  कुछ है जो बयाँ होता नहीं  कुछ है जो छुपाया जाता  नहीं  निडर भी है  सुकूँ भी  है  दूरी भी है  नजदीकी भी है  है कुछ ख्वाब सा कुछ हकीकत सा  क्या बोलूं लब इजाजत नहीं देते  दिल शोर मचा रहा है  एक खींच-तान रिवाजों और दिल के बीच  होती है हर रोज  एक बंधन तोड़ कर  दूसरे में बँध जाना चाहता है बहुत अजीब है सब कुछ अटपटा सा मगर सुलझा हुआ  बहुत अरमान थे  आसमान छूना था  सब था मगर हौसला नहीं था दिल था दिमाग़ था सोच थी  मगर सोच को आकार देने की हिम्मत नहीं थी  माफ़ कर देने की मेरी आदत मुझे अंदर से खोखला कर गई  खुल कर न विरोध किया न प्यार किया  एक घुटन भरी जिंदगी जीती रही  पता नहीं मगर कुछ है जो  मुझे दुख में हमेशा डाल देता है मै रोना नहीं चाहती मगर रुला जाता है मै हॅसने से  पहले सहम जाती हूँ कि क्या पत...

लेखनी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ काव्य पाठ एवम मिलन समारोह ©रजनी सिंह

लेखनी दिवस के द्वितीय वर्षगांठ के उपलक्ष्य में लेखनी पटल पर मेरा कार्यक्रम..लेखनी परिवार भावनाओं का सागर है इनसे जुड़कर खुद को बहुत गौरवांवित महसूस कर रही हूँ l आप सभी का हृदयतल से धन्यवाद मुझे यह अवसर प्रदान करने के लिए। © रजनी सिंह Video 1: Video 2: Video 3: Video 4: Video 5:  

कवि की कविता ©रजनी सिंह

 कभी कभी मन एकदम शांत रहता है न?  कोई उथल पुथल नहीं  जैसे कोई ठहरा हुआ पानी  सारे विचार शून्य हो जाते हैँ जैसे...  एक पल में कई सदियाँ जी ली हों जैसे...  जैसे सुबह की ओस की बूँद...   जो पाँव तले आती है..  और जो चित शांत कर देती है  ठीक वैसे ही.....  जैसे मैं कोई कवि हूँ.. और कल्पना जीवित हो गई है  मेरी हर बात कविता की तरह  हज़ारों अर्थ समेटे है..  या जैसे मैं स्वयं एक कविता हूँ ,किसी संवेदनशील कवि की  जीती जागती, हँसती मुस्कुराती कविता..  उस कवि का मुझे देखना  मेरे हृदय तक उतरती हुई उसकी दृष्टि  जैसे मेरे रोम रोम में  डाल रहा हो वह कोई कल्पना  मैं एक पाषाण सी  मूक निश्चल भावहीन  और वह एक एक शब्द से  मेरा अंग अंग सुंदर शिल्प  से   अद्भुत आकार में  मेरा अस्तित्व  तराश रहा हो.... © रजनी सिंह 'अमि'

शाइरी © रजनी सिंह

  तेरी शहवत से हमें ज़ब बेख़बर रक्खा गया l यानी फिर हर एक शय से मोतबर रक्खा गया l पहले आँखें ज़िस्म-ओ-जाँ को फिर ज़बीन-ए-ख़ास को...  उनके पहलू में हमारा दिल किधर रक्खा गया l उस निग़ाह-ए-नाज़ से याँ तो सभी बेज़ार थे..  दिल यहाँ किसने लगाया दिल मगर रक्खा गया l  कौन सोचे किसने सोचा कौन सोचेगा यहाँ  तुम उधर रक्खे गए हमको इधर रक्खा गया l हम तो उनकी आरज़ू सर आँख पे रखते रहे...  पर वफाओं को हमारी दर-ब-दर रक्खा गया l   जानते हैँ वो न होगी शाइरी उनके बगैर...  इसलिए शाइर हमारा क़ैद कर रक्खा गया l                              ©rajni singh

सलीका © रजनी सिंह

 अपनों की आग से छुपता मेरा सलीका । ड़रा सहमा सा है लुकता मेरा सलीका ।। तसलसुल ख़िज़ां से उबता मेरा सलीका.... एतिमाद आंच पे पकता मेरा सलीका । पयम्बरों के सहीफे जैसा मेरा सलीका.... जहानें ज़ीस्त में फैलता मेरा सलीका । हनूज नहीं रो पाया जो मेरा सलीका.... रोज-ओ-शब है तड़पता मेरा सलीका । तुर्बत में अब ये जाएगा मेरा सलीका.... गर्दिश के कूचे निकलता मेरा सलीका ।। तस्कीन से बंधे कब तक मेरा सलीका.... खालीक से सवाल पूछता मेरा सलीका ।।                                                  @ रजनी सिंह