संदेश

#रेखा खन्ना लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कविता- ये बारिशें क्यों मुझे ढूंँढती हैं? ©रेखा खन्ना

नमन माँ शारदे नमन लेखनी वो खिड़की के बाहर से  भीतर झांँकती हुई  बारिश की बूँदों का मुझे देख कर मचलना और वो मेरे भीतर की  बारिश का ना थमना,  कितना मुश्किल है  मौसमी बारिशों में  बे-मौसमी बारिश को बरसने से रोकना। ज्यादा गीली कौन सी बूंदें हैं,  बताओ?  वो जो बादलों से बरसी हैं  या फिर वो जो आँखों से छलकी हैं?  एक सिर्फ़ जो पानी हैं  या वो जो सिर्फ़ जज़्बातों को बयां करती हैं? ये बारिशें क्यों मुझे ढूंँढती हैं?  क्या है मेरा और इनका रिश्ता? कुछ बादल  कुछ घटा थोडा़ पानी  बहुत सारे एहसास  एक रिश्ता  बहुत गहरा लगाव कुछ बूँदें पर तरसता मन का आसमां  एक ख्वाहिश भीगूँ मैं भी  बारिश की बूंँदें मुझे भिगोएं कैसे? भीतरी बारिशों से सराबोर मैं कोई कोना सूखा नहीं  जिसे भीतरी बारिश ने छुआ नहीं  मौसमी बारिश कहे  कभी तो मुझे थोड़ा सा सूखा मिल मैं कहूँ, कभी तो भिगो मुझे  जब मैँ भीतरी बारिशों से नाराज़ रहूँ कुछ सूखी कुछ गीली सी मैं  मौसमी बारिशों में भीगने को तरसती रही  खिड़की के बाहर से  ...

एक ज़ख्म हँसता है मुझ पर ©रेखा खन्ना

 नमन, माँ शारदे नमन लेखनी  शीर्षक- एक ज़ख्म हँसता है मुझ पर ज़ख्मों के क्यूँ सैकड़ों हाथ होते हैं  एक को बाँधो तो दूसरे हरकत में होते हैं  ज़ख्मों की कच्ची तुरपाइयोँ को उधेड़ कर क्यूँ सुकून को जिस्म से निचोड़ने लगते हैं। पोर पोर दुखता है टाँके लगाने में उधेड़ने में क्यूँ हाथ नहीं कांपते हैं सुई है नुकीली या फिर सच चुभता है धागा है कच्चा या फिर ज़ख्म सच्चा है। चोट तो जिस्म पर लगती है  फिर क्यूँ निशान रूह पर उभरता है कसूर किसका है दिल ढूंँढता है? कमज़ोर क्या है, दिल या फिर सहनशक्ति? आघात बातों के खँजर से लगा था  या फिर विश्वास ने धोखा दिया था दिल छन्न से छाती के भीतर गिरा था जब ग़म का समंदर कितना गहरा हुआ था? एक ज़ख्म हंँसता है मुझ पर जब मुझे रोता हुआ देखता है शायद हंँस हँस कर अपनी गहराई नापता है या फिर नापता है हिम्मत मेरी, ये किसे पता है? आँख का आँसू कहे अब दरिया भी सूखने लगा है पुराना ज़ख्म कहे हंँस कर  नया ज़ख्म एक नया दरिया भेंट करेगा। क्यूँ बादलों का मेरी आँखों से रिश्ता है बिन मौसम बरसता बहुत है  पलकों के बाँध हैं कमज़ोर हो चले दरिया बंद पलको...

कविता- कुछ सूखे कुछ भीगे ख्याल ©रेखा खन्ना

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  विधा - कविता मन के भीतर की बारिश से भीतरी ख्याल गीले थे बाहरी बारिश में बंद कमरे के भीतर की हवा में उड़ते ख्याल सूखे थे दोनों ख्यालों के बीच अंतर था  एक जज्बातों की बारिश के नीचे भीग कर  वजनदार बनकर दब से गए थे  और सूखे ख्याल बेपरवाह से यहाँ वहाँ बस भटक रहे थे भटकते ख्यालों को जज्बातों से क्या लेना  था वो‌ तो बस दिशा बदल रहे थे पर गीले हुए पड़े जज्बात बर्फ़ की मानिंद एक जगह जमा हो कर दिल पर बोझ बन पड़े थे जो ना बह कर निकल रहे थे ना पिघल रहे थे बर्फ़ हो चुके ख्यालों को एक सुकून भरे आगोश की गर्माहट की दरकार थी गर वो सुकून मिलता तो क्या भीतर बारिश का मौसम बनता? भीतर  बाहर बस एक दिलकश नज़ारा होता  कुदरत की बहारों में दिल उड़ता फिरता  बारिशों में भी फर्क होता है भीतर की बारिश दिखती शाँत है पर तूफानों को अपने भीतर समेटे होती है और पलकों का बाँध उसे रोके रखता है। ©रेखा खन्ना 

कविता- क्या लिखूँ? ©रेखा खन्ना

नमन माँ शारदे नमन लेखनी  प्रेम गीत में क्या लिखूं ? गर कहो तो जज्बात लिखूं। गर कहो तो बैचेनियाँ लिखूं गर कहो तो तुम को मोहब्बत लिखूं। प्रेम गीत में क्या लिखूं ? तुम कहो तो अपनी रूह लिखूं तुम कहो तो मीठी नींद लिखूं तुम कहो तो ख्वाब लिखूं। प्रेम गीत में क्या लिखूं ? तुमको अथाह सागर लिखूं तुमको मनमोहक खुश्बू लिखूं तुमको मधुर संगीत लिखूं। मैं उलझ गया हूंँ अपने ही ख्यालों में  तुम ही तुम हो हर एहसास में प्रेम गीत में क्या मैं तुम को  अपनी जिंदगी लिख दूं या फिर रूहानी सुकून लिखूं अब तुम कहो और क्या क्या लिखूं? ©रेखा खन्ना

ग़ज़ल © रेखा खन्ना

दर्द सारी रात कराहता रहा अश्कों की भेंट, मैं नींद को चढ़ाता रहा। नीला पड़ा बदन ठंडा होता रहा रूह को तड़पता देख, मैं मौत को पास बुलाता रहा। नासाज़ तबियत से दिल बेचैन होता रहा झूठी तसल्लियों से, मैं दिल को बहलाता रहा। रिश्तों में ग़लतफहमियांँ बेवजह ही पालता रहा आस्तीन के सांँप को मैं रोज़ दूध पिलाता रहा। महक चँदन की थी या रात की रानी महक रही थी रात भर बीन बजा कर मैं नाग को बुलाता रहा। दिल सच्चे प्रेम को दर बदर भटकता ढूँढता रहा रूहानी प्रेम की कहानियांँ, मैं दिल को सुनाता रहा। इबारत लिखी थी किताब में एक इँसान बनने की खुदा की बस्ती में, मैं सच्चा इँसान तलाश करवाता रहा। दिल के एहसास।© रेखा खन्ना

कविता- शब्दों के बीज ©रेखा खन्ना

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी शब्दों के कुछ बीज़ बोए थे काग़ज़ की खुश्क ज़मीं पर  जाने कैसे दरख़्त हो गए एहसास, टहनियां  ख्याल, अधखिले फूल  और  ख्वाब, अनगिनत पत्तियांँ हो गए। हृदय की अध-कच्ची मिट्टी में जज्बातों की नमी से  ज़डों को विस्तार मिला और मन की गहराई की ओर चल निकले  अपनी स्थाई जगह बनाने को। शब्दों के पेड़ को  जब एक सम्पूर्ण जीवन मिला वो कहने लगे एक कहानी  कहने लगे बेख़ौफ़ सच वो सच जिसे बहार का मौसम  नसीब ना हुआ और पतझड़ से मिला कर  मिट्टी में दबा दिया गया। क्या सच, नीम के जैसा होता है काग़ज़ को भी हिदायत दी है कि  चखना तो दूर की बात है अपने तन पर उकेरना भी नहीं नहीं तो जिस्म नीला पड़ जाएगा। जाने कैसे कुछ बीजों को  दरख़्त बनने की चाह जगी और वो बस उग आए ये सोच कर कि मुझ में साहस है  अपना विस्तार करने का ग़लत का विरोध करने का। किसी दरख़्त पर सच उगा किसी पर मक्कारी किसी पर कविता उगी किसी पर कोई कहानी  और बहुत से दरख़्तों पर उगा  बोझिल दिल की व्यथा को कहने  के लिए क़त्ल करने वाले बेहद कठोर  परंतु संवेदनशी...

यूं ही हमेशा सलामत रहो तुम ©रेखा खन्ना

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी  कुछ ज़ख्म रिसते नहीं हैं कुछ तो जिस्म में टूटता है पर टूटने की आवाज़ नहीं आती है कुछ तो फांस बन कर चुभता है कहीं भीतर ही भीतर  पर कोई नुकीली चीज नज़र नहीं आती हैं ज़मीं पर जाने क्या क्या बिखरा हुआ है जब चलो तो किरचों का एहसास होता है पर बिखरे जज्बातों को नंगी आंखों से देखना मुश्किल हो जाता है सोचती हूंँ अक्सर कि क्या टूटा और बिखरा हुआ है यहांँ वहांँ पर मैं, दिल, एहसास, यादें, वजूद आखिर  क्या क्या बिखरा है? यूं तो वजूद में कोई कमी नहीं दिखती है जिसको देखो वही दुआ देता है कि यूं ही सलामत रहो तुम हमेशा फिर सोचती हूँ कि क्या कहा, ये कैसी दुआ है यूं ही हमेशा सलामत रहो तुम...  मतलब यूँ ही भीतर से टूटी हुई, अपने भीतर खुद को ही खोजती हुई, अपने वजूद की तलाश करती हुई, अपने वजूद के बिखरे टुकड़ों को समेटती हुई, अपने दिल के ज़ख्मों को रिसते हुए देखती हुई, कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया समेटने को इस कश्मकश में उलझी हुई, यां फिर धीरे धीरे मौत की तरफ खुद को धकेलती हुई.... क्या इस तरह रहूँ हमेशा क्योंकि यही तो सत्य है और दुआ भी यही की गई है कि यूं ही हमेशा सला...

कहाँ है एंकात ©रेखा खन्ना

 नमन लेखनी 🙏🏻 मरघट के आंगन में मौत नाचती हैं क्रंदन रूंदन की थाप पर थिरकती है रात की शाँत लहरों में राख ठंडी होती है दिन के उजालों में जीस्त सुकून खोती है। जीवन के शोर की आवाज़े दब गई है जिम्मेदारियों के अनदेखे बोझ के नीचे एंकात में मन जीता है यां समय की माँग है सुकून-औ-करार की चाहत में पल-पल जलता बुझता है। कहाँ है एंकात, मरघट में या जीवित संसार में एहसासों की उथल-पुथल में या मन मारने में तब्दीलियों में यां स्थिरता में ठहर जाने में कुछ कर गुजरने के जोश में यां हालात स्वीकारने में। जीवन की धारा को बहते पानी की तरह चलना है कभी तेज़ लहरों सा शोर करते हुए कभी शांत हो कर के जन्म से मृत्यु तक का सफ़र तय होना है कभी किश्तों में मर कर के कभी खुशियों को जीते हुए। जिंदगी सिर्फ जिंदा जीस्त का नाम नहीं है रूह को भी खिलखिलाते हुए दिखना होगा चाहे नकली आवरण मुख पर लगाए चाहे सचे भाव‌ दिखा कर  मरघट चाहे कितना भी शांत दिखता है कभी मरघट में दो घड़ी अकेले बैठ कर महसूस करना  वहाँ दिल‌ दहला देने वाली हृदय विदारक चीत्कारों को अभयदान मिला हुआ है। ©रेखा खन्ना

आवाज़ें और गहराईयांँ ©रेखा खन्ना

जो आवाज़ें गहराइयों में उतर कर खो जाती है उनकी ध्वनि उथले पानी में सुनाई नहीं देती हैं उन्हें सुनने के लिए उसी गहराई में खुद को डुबाना होगा पर क्या डूबने के बाद उस ध्वनि की तरंगें हमारे इंतज़ार में रूकी मिलेंगी यां फिर पानी से मिल कर एक साज़िश रच लेंगी कि जैसे ही ये शख्स अंदर आने की कोशिश करें तभी इसके फेफड़ों में भर जाना और घोंट देना दम ताकि फिर कभी गहराइयों को छोड़कर बाहर ना निकल सके। कभी कभी ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अंदर ही अंदर कई साजिशें रच कर बैठा होता है कि जैसे ही कोई उनमें उतरने की कोशिश करे, उसे अंदर ही अंदर तक खींच ले ताकि वो भी अपने अकेलेपन का जहर कहीं तो उतार सके। जाने ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अपने अंदर कितनी कहानियां, वेदनाएं और गुमनाम लाशों का बोझ समेटे हुए है और कहना चाहता है पर अफसोस उसकी दास्तान सुनने वाला कोई नहीं है। कभी बैठना किसी पोखर यां तालाब के किनारे और गौर से देखना पानी को टकटकी लगाकर, बिना पलकों को झपकाए। स्थिर पानी में हलचल होगी और तरंगे बीच में से उठ कर किनारे की ओर बढ़ेगी ऐसे जैसे वो बात करने के आ रही हैं। कभी उनसे बातें कर के देखना वो शांत हो जाएं...

मैं, चाँद और रात © रेखा खन्ना

 कुछ सफ़र अकेले ही करने होते हैं कुछ रास्ते अकेले मुसाफ़िर का इंतज़ार करते हैं चाँद भी मेरी तरह तन्हा और अकेला है वो रात भर आसमां में फिरता है और मैं ख्यालों के सफ़र पर अक्सर अकेले निकलती हूँ हमारी राहें अक्सर एक दूसरे से टकराती हैं और नज़रों के मिलते ही दोनों मुस्कुरा एक ही बात कहते हैं कि आज भी संग कोई नहीं है। पता नहीं क्या भाता है हम दोनों को रात का अंधेरा यां फिर अकेलापन यां फिर तन्हा चलते हुए हर रात किसी मोड़ पर एक दूसरे से टकराना और उस मुस्कराहट को दो घड़ी के लिए जी लेना जो एक दूसरे को देख कर हमारे होंठों पर आती है। थका हुआ मन अक्सर पैरों को भी थका देता है और ना चाहते हुए भी मन की चंचलता कहीं खो जाती है वो चंचलता जो और भी शरारती होकर खिलखिलाना चाहती है घड़ी दो घड़ी  पर तन्हा मन सिर्फ रात के अंँधेरों का इंतज़ार नहीं करता है एक अनजान सफ़र पर निकलने के लिए वो तो भरी महफिल में भी तन्हाई को ढूँढ ही लेता है। चाँद, मैं और हमारा अनजान राहों का सफ़र कुछ नहीं माँगता अब  शायद आदत की बात है अब  देखो ना लाखों तारों और बादलों के संग रह कर भी चाँद का कोई नहीं और मैं, मेरे पा...

तमन्ना करके पछताए ©रेखा खन्ना

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  कुछ तमन्नाएं सज़ा होती हैं। पँखों की चाहत होती है पर रिहाई की जगह कैद मिलती है। उड़ान भरने को अथाह अम्बर होता है पर पाँव टिकाने को ज़मीं नहीं होती है। तमन्नाओं का अथाह समंदर तैरने की कला नहीं सिखाता है बस एक दल-दल की भाँति भीतर और भीतर खींचता ही चला जाता है। एक लावा उबलता है दिल के भीतर नाकामी को लेकर फूटता है निराशा का  अंकुर।  उस अंकुर पर कोई हसीन फूल नहीं खिलता है उस पर पनपता है एक जहर जो निगल लेता है सोचने समझने की शक्ति को। तमन्नाओं को भी ज़रा सब्र नहीं है बस एक के बाद एक कुकरमुत्ते की भांति विकसित होती है और  एक मधुमक्खी का छत्ता बन कर दिन रात डंक मारती हैं। डंक मार मार कर दिल को घायल करती हैं और नाकामी का एहसास दिलाती हैं। ख्वाबों का भी हकीकत से दूर तक कोई लेना देना नहीं है वो तो हर रोज़ सज जाते हैं पलकों तले और टीस बन जाते हैं सूरज की पहली किरण के उगते ही। सारा दिन आंँखों में रिडकते रहते हैं कि शायद कोई रास्ता मिल जाए और हकीकत की दुनिया में कदम रख पाएं। हकीकत, हकीकत तो जैसे अपनी ही दुनिया में मगन है। तमन्नाओं और ख्वाबों को अपन...

जैसे बहती है नदी ©रेखा खन्ना

 जैसे बहती है नदी मैं भी बहना चाहती थी हो कर उन्मुक्त लेकिन राह आसान ना थी  क्योंकि रस्मों रिवाजों की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। मेरे बहाव को रोकने के लिए कई अवरोध और ऊँचे बाँध बनाए गए थे। जैसे बहती है नदी और अपना रास्ता खुद बना कर खोज लेती है समंदर को और उसमें विलीन हो जाती है और जिम्मेदारी सौंप देती है समंदर को उसे संभाल कर रखने की मैं कभी उस समंदर तक पहुंँच ना पाई  और ना ही उसमें विलीन हो सकी। मेरा बहाव मुझ तक ही सीमित रह गया और  मैं खुद के भीतर ही एक तूफान का रूप लेती जा रही हूँ अभी तक इस तूफान में सब कुछ तबाह कर के अपनी रास्ता ढूँढ लेने का हौंसला नहीं है पर एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब ये तूफान विकराल रूप लेकर सब रिश्ते नातों को पीछे छोड़कर अपनी राह चुन लेगा और निकल पड़ेगा अपने मनचाहे सफ़र को। बहाव जरूरी है लेकिन रोक लगाने वाले इस बात को समझते नहीं है। अपना रास्ता चुन कर उस पर चलते हुए मंजिल तक पहुंँचना जरूरी है। जीवन का सफ़र तभी मुक्कमल होगा जब वो हर अड़चन को दूर करके अपने गंतव्य स्थान तक पहुंँचेगा।  हमारा सफ़र जन्म से लेकर मृत्यु तक का तय है उसे एक नदी की भांत...

मुझे नहीं बनना है © रेखा खन्ना

 कहने को देवी है और पूजी जाती है लेकिन अगर हो जाए कहीं लड़ाई तो मां बहन की गाली बन जाती है। त्याग की मूर्ति घोषित की गई है, वात्सल्य से भरी बताई गई है। अपने भीतर अनेक दर्दों के बीजों को बोए रखती है माँ बनने का दर्द सहती है पर बहुत बार कठिनाई के कारण बच्चे का मुंह देखे बगैर ही स्वर्ग सिधार जाती है। औलाद ना हो तो बांझ कहलाने का दर्द सहती है पर पुरुष अगर बाप बनने की काबिलियत ना रखता हो तो उसे बांझ ना कह कर उसके हिस्से का दोष भी स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता और बेटी को जन्म दे दे तो बेटा ना देने का ताना सहती है अधिकांश समय बेटी होने का ताना सुनती है और बेटी पैदा करने पर मार दी जाती है। गरीब मां-बाप के घर दहेज़ की समस्या बन पैदा होती है और लालची ससुराल में केरोसिन और कुकर फटने की घटना की भेंट चढ़ जाती है। कभी कभी लगता है जैसे स्त्री एक ना‌ खत्म होने वाली परीक्षा लेकर पैदा होती है। परीक्षा, खुद के अस्तित्व को साबित करने की और बीमार मानसिकता वाले लोगों से अपनी अस्मिता की रक्षा करने की पर एक वरदान भी लेकर आती है, वरदान सृजन का। अक्सर सोचती हूँ कि प्रकृति ने सिर्फ औरत को ही अधिकार दिया है सृ...

लम्हों की रेलगाड़ी ©रेखा खन्ना

 लम्हों की रेलगाड़ी किसी स्टेशन पर रूकती नहीं हाथ बढ़ाओ छूने को गर लम्हा कहे मैं हाथ आता नहीं अदृश्य होकर दो कदम आगे चलता मैं चलता उसके पीछे-पीछे। लम्हों की रेलगाड़ी ना छुक-छुक करती, ना ही सीटी मारती बस चुपचाप खिसकती जाती जाने कौन सा स्टेशन होगा आखरी जाने कौन सी साँस होगी आखिरी आखिरी साँस पर लम्हा रूकेगा बस दो घड़ी फिर नवजीवन लेकर किसी के भीतर एक नए स्टेशन से सफ़र शुरू करेगा अपनी। अंतहीन सफ़र का है यात्री  पुराने सफ़र को त्याग कर  करता आग़ाज़ नए सफ़र का ना थकता, ना रूकता कभी  बस फिरता रहता यहाँ वहाँ हर घड़ी समय की सुइयों से बँधा हैं दो घड़ी क्यूँ एक जगह नहीं टिकता हैं लम्हों की रेलगाड़ी दुनियाँ में नहीं सगी किसी की।  ©रेखा खन्ना

गद्य - मैं और बारिशें ©रेखा खन्ना

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  कभी कभी बारिश की बूंँदें भी कम पड़ जाती है सूखे पड़े हुए मन को भिगा देने में। यूं तो बारिशों का मौसम बहुत सुहाना लगता है पर मन, मन को तो एक बूंँद भी स्पर्श ना कर सकी कभी। सूखापन कुछ इस कदर हावी हो चुका है शायद बारिश की बूंँदें भी नमी ना दे सकी रती भर भी। कुछ ख़्वाब जो धीरे-धीरे आँखों में दरख़्त बनने की चाह लिए उगने लगे थे वो सब के सब दफ़न हो गए बेमौसम के पतझड़ के स्पर्श से। ख़्वाब, ख़्वाब भी तो बेशर्म है जब देखो आँखों में और दिल में उगने लगते हैं जबकि वे बखूबी जानते हैं कि पूरा ना होने पर उन्हें जिंदा ही दफ़न हो जाना है दिल के कोने में पड़े हुए शुष्क ज़मीं के टुकड़ों में। वो शुष्क ज़मीं जिसे फिर कभी कोई नमी ना छू सकी। जिस पर फिर कभी कुछ ना उग सका। ना आस उगी, ना मोहब्बत उगी और ना ही जज़्बातों की फ़सल उग सकी। वो ज़मीं जो खुद ही एहसासों की नमी को सोखने से मना कर देती है।  बंजर मन और बंजर जिंदगी को क्या कभी कोई बारिश छू कर हरा-भरा कर सकेगी? शायद नहीं क्योंकि बंजर मन पर बूँदे गिरेंगी तो सही पर छूते ही जज्ब होने की जगह हवा में विलीन हो जाएंगी और ज़मी...

ख़्वाबों के दरख़्त ©रेखा खन्ना

 रात ख्वाबों के बीज बोए थे पलकों तले दरख़्त उग आए थे।। फूलों के खिलने से पहले ही सूरज की किरणों ने सारे दख़्त जलाए थे।। स्वप्न, सत्य के धरातल पर कहीं टिक ना पाए थे सत्य के पत्थरों ने स्वप्न सारे चिटकाए थे।। कुछ नुकीले तीर भी जुबां-ए-तरकश से निकल आए थे शूल, दिल में यूं गड़े कि हम मन ही मार आए थे।।  ©रेखा खन्ना

प्यार जताना ना आया तुम्हें © रेखा खन्ना

 तेरी यादों में अपना वजूद ढूंँढ लेता हूँ बीते हसीन पलों में खुद को खो लेता हूँ। खो रहा हूँ कहीं मैं पर तुझे रोक लेता हूँ दिल की ज़मीन पर मैं तन्हाई बो लेता हूँ। आंँखें हैं नम और एहसासों का समंदर गहरा डूबने से बचने को अक्सर आँखें धो लेता हूंँ। मुक्कमल ना हुई थी दास्तां-ए-मोहब्बत गाहे-बगाहे अपने ही काँधे सर रख रो लेता हूंँ। बात से बात निकलती तो दूर तलक जाती बात दिल की करने से पहले नसीहतें दो लेता हूँ। प्यार जताना ना आया तुम्हें मैं मान लेता हूँ ग़म-ए-जुदाई सहने से अच्छा कब्र में सो लेता हूंँ।     © रेखा खन्ना

लम्हा था, लम्हा बन गुज़र गया ©रेखा खन्ना

खुशी का एक लम्हा होंठों पर ठहर ना सका ग़मों की बारात ऐसी सजी दिल तन्हाई का आशिक़ हो गया लम्हा जाने कब गुजर गया खुशी का एहसास बस लम्हों की कैद में बस गया दास्तां, में खुशियों का जिक्र नहीं दिल ग़मों को ग़ज़ल बना लिख गया खुशी का एक लम्हा खुशी को तरस गया लम्हा था, लम्हा बन गुज़र गया। ©रेखा खन्ना

मैं तेरी कौन, पिया ? ©रेखा खन्ना

 " देखकर भी क्यूंँ तुम मुझे देखते ही नहीं    यारा ऐसी बेरूखी सही तो नहीं....... " सुनो! ये गाना तुमने सुना है कभी ..... ना ना ऐसे शुरू नहीं  होता है , ये तो गाने के बीच की एक पंक्ति है जो आज जुबां पर चढ़ गई है और मैं इसे बस गुनगुना रही हूंँ बार बार। पता नहीं क्या हैं इस पंक्ति में जो मुझे खींच रहा है ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारा एहसास खींचता है मुझे। बस यूं ही इसे गुनगुनाते हुए सोच रही थी  .... कि देखकर भी क्यूँ तुम मुझे देखते ही नहीं सोचती हूँ अक्सर तेरी जिंदगी में मैं हूंँ भी कि नहीं  दो पल की भी तो बात कभी होती ही नहीं मेरे दिल की आवाज़ भी तुझ तक पहुंँचती ही नहीं दिन रात का इंतज़ार कभी खत्म होता ही नहीं मेरी तमन्नाओं को कभी तेरा साथ मिलता क्यूँ नहीं। सोचती हूंँ अक्सर तेरे दिल में मैं हूँ भी कि नहीं ......... मेरी राहों में क्यूँ तेरा घर पड़ता ही नहीं तेरे घर की दीवारें भी तो मुझे पहचानती ही नहीं क्यूँ कदम मेरे तेरी राह हर पल ढूँढते ही रहे क्यूँ तेरे कदमों के निशान भी मुझे देख मिटते ही गए क्यूँ मेरे दिल के तार तेरे दिल को छेड़ते ही नहीं। सोचती हूंँ अक्सर तेर...

माफी अजन्में बच्चे से ©रेखा खन्ना

 कुछ धोखे जीने की वजह ही खत्म कर देते हैं। तब अनकही इच्छाओं का वजूद भी खत्म हो जाता है। वो इच्छाएंँ पूर्ण होने के लिए अगले जन्म के इंतजार की सूली पर चढ़ा दी जाती है। बहुत कुछ मर जाता है भीतर ही भीतर और साथ में मर जाते हैं वो सब भी जो जुड़े होते हैं उस एक इंसान से। मोहब्बत जब छोड़ कर चली जाती है तब मोहब्बत सिर्फ दुःख, तन्हाई, आँसूओं का तोहफा ही नहीं देती है और भी बहुत कुछ देती है। देखो ना तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे क्या दिया, वो सपना जो मैं दिन रात देखा करती थी उसे पूरा करने के लिए अगले जन्म तक का इंतज़ार दिया। अक्सर तुम्हारे संग जिंदगी गुजारने का ख्वाब देखते देखते, रोज़ तुम्हारी मोहब्बत में डूबते हुए कुछ ख्वाब सजाने लग गई थी आंँखें और उन अनगिनत ख्वाबों में एक ख्वाब था माँ बनना। अपनी मोहब्बत की निशानी को अपने अंदर महसूस करना। अपने अंदर उसकी हलचल को और उसे बड़ा होते हुए महसूस करना। जब वो इस दुनिया में पहला कदम रखे तो उसे देख कर खुशी में झूम उठना, पहली बार उस नन्ही सी जान को बांँहों में भर कर कैसा महसूस होता है वो महसूस करना। देखो ना कितना कुछ था जीने के लिए। कितने सपने आंँखों में साँँस...