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समय-सिंधु ©अंशुमान मिश्र

जब जब साज समय का बदला, बदली जग आवाज़, समय-सिंधु में समा गए, कितने ही सभ्य समाज! कभी कभी नर अहंकार वश, बन जाता भगवान, पीड़ा पहुंचाता प्राणी को, नित करता अपमान! अपने आगे और किसी की, एक नहीं सुनता, बन स्वतंत्र स्वच्छंदाचारी, घृणित मार्ग चुनता! अहंकार मद लेकर डूबा, रावण वंश जहाज! समय-सिंधु में समा गए, कितने ही सभ्य समाज! बड़े-बड़े ज्ञानी विज्ञानी, अर्जुन सदृश धनुर्धर, नेपोलिन, सिकंदर, हिटलर, कंस और दशकंधर, इस धरती पर पैदा होने वाला, कौन न भटका? कौन शक्तिशाली है जिसको, नहीं काल ने पटका? समयाधीन सदैव यहां सब, समय सदा सरताज, समय-सिंधु में समा गए, कितने ही सभ्य समाज! पल भर में विश्वास बदलता, हर मनुष्य का आज, समय-सिंधु में समा गए, कितने ही सभ्य समाज!                             - अंशुमान मिश्र "मान" ________________________________

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

नमन मां शारदे, नमन लेखनी। चल कि सौदा ये फिर किया जाए! ताकि फिर ठीक से हिसाब आए! मैं तेरा झूठ तुझको लौटाऊं, तू मेरा इश्क मुझको लौटाए! मैं तेरी बेरुखी समझ पाऊं, तू  मेरी बेबसी समझ पाए! तुझको फिर रोकने को रोऊं मैं, मेरे  अश्कों  पे  तू  तरस  खाए! तू मेरी चाह को तवज्जो दे, तू  मेरी हसरतें न दफनाए! मैं कि फिर जां फना करूं तुझपे, और  तू  भी  ये  काम  दोह'राए! कर लूं फिर से यकीन मैं तुझ पर, तोड़   कर  तू  यकीं   न  तड़पाए! फूल बोऊं जमीन-ए-दिल पर मैं, इस  दफा  फूल  गर न  मुरझाए! चल कि इक दूसरे से दर बदलें,  रात  सोऊं  मैं, तू  जगे  हाए! चल कि इस बार मैं करूं धोखा, और  तुझको  न  ये जहां भाए! चल कि सौदा ये फिर किया जाए! ©अंशुमान मिश्र 

ग़ज़ल ©अंशुमान

सो रही दुनिया, अंधेरे में दिल-ए-बेदार लेकर, ढूंढता है दिल किसी को नेमत-ए-दीदार लेकर, जान कल ही ले गया कातिल निगाहों से कोई था , आज फिर से आ गया है इक नया आज़ार लेकर, या करेगी नाम, या बदनाम होगी शायरी अब, आ गए जो महफिलों में एक बादा ख्वार लेकर, जो कभी खुशियां मनाते पत्थरों को देखकर थे, आज देखो रो रहे हैं, गौहर-ए-शहवार लेकर, और सबकी क्या कहें? पाकर नहीं खुश ज़िन्दगी जो, हम मुसलसल हंस रहे हैं मौत के आसार लेकर, एक आधी सी ग़ज़ल इस आस पर आधी रखी है, लौट कर पूरी करोगे तुम, नए अश'आर लेकर!                     _- अंशुमान_

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी फिर बचाने को बिखरता आशियाना, लौटकर गर आ सके, तो लौट आना। मैं तेरी  नजरों में फिर  से  डूब  जाऊंँ, और तू बिन कुछ कहे सब कुछ बताना। वो तुझे पाना, मगर फिर खो भी देना, याद है सब जीत कर, सब हार जाना। छोड़ने  को, एक  झूठा सा तेरा सच, रोकने  को, इक  मेरा  सच्चा बहाना। इक  सुनाने  को, तेरी झूठी कहानी, इक छिपाने को, मेरा सच्चा फसाना। हो सके तो लौट कर करना मुकम्मल, इक  अधूरा सा  बचा किस्सा पुराना।  ©अंशुमान मिश्र

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी नाव खुद चलती बनी मझधार फिर क्या कीजिए? ज़िन्दगी ही जान  का आज़ार फिर क्या  कीजिए? इन  हकीमों  की  दवाओं का नहीं कुछ फायदा, क़ल्ब घायल, आस है बीमार फिर क्या कीजिए? साथ  जो  गर  हो  कोई, तनहाइयांँ  रहती नहीं, साथ  तन्हाई  रही  है  यार.. फिर  क्या कीजिए? जान  जिनकी जान में बसती है, वो अनजान बन, जान  लेने  को  खड़े  तैयार,  फिर  क्या  कीजिए? है  सुना,  झूठी   क़सम  से  जान   जाती   है  यहांँ, हम मुसलसल मर चुके सौ बार, फिर क्या कीजिए? अब   निज़ाम-ए-क़ल्ब  ही  करते  शहर  बर्बाद हैं, हो चुकी फरियाद  हर  बेकार, फिर क्या कीजिए? ©अंशुमान मिश्र                                                    

कविता - मैं दहलीजों पे बैठूंगा ©अंशुमान मिश्र

मैं दहलीज़ों पे बैठा हूं, कभी तो लौट आओगे, कभी फिर मुस्कुराओगे, गले फिर से लगाओगे, बहारें साथ में लेकर, वो शामें फिर  से आएंँगी, वो  बूंँदे आसमांँ से गिर, हमें फिर से  मिलाएंँगी, तुम्हें देखे  हुआ अर्सा, चलो अब लौट आओ ना, जो देखे थे  सभी  सपने, उन्हें पूरा भी है करना! ये दुनिया के सभी पागल, मुझे पागल समझते हैं, कि दिल पर चोट करते हैं, मेरा धीरज परखते  हैं! अभी भी तुलसियांँ आंँगन में, तुमको याद करती हैं, अभी भी आम की बौरें, सुनो  फरियाद करती हैं, नज़र भी थक चुकी है अब, ये सांँसे घट चुकी हैं अब, भरोसा कम नहीं है पर, उमर भी कट चुकी है अब, मगर मैं फिर सभी सपनों को आंँखों में समेटूंँगा, तुम्हारी  राह  देखूंँगा! मैं दहलीजों पे  बैठूंँगा! मैं दहलीज़ों पे  बैठा हूंँ, मैं दहलीजों पे  बैठूंँगा!                        - ©अंशुमान

नज़्म - सच नहीं ©अंशुमान मिश्र

  कि फिर से मैं चला वहांँ जो था तिरा मिरा जहांँ नजाकतों की बारिशें वो हुस्न की नवाजिशें, वो एक मैं, जो था तिरा वो एक तू, जो था मिरा, उन्हें बुला नहीं सका, मैं सब भुला नहीं सका, जो बात थी तेरी मेरी, जो रात थी तेरी मेरी, जो बस अधूरी रह गई, कि थी जरूरी, रह गई घरौंद ख्वाब का जो था महज अजाब का जो था, कि होना जब फना ही था, घरौंद क्यों बना ही था? जो ख्वाब बुन रहे थे हम जो साथ चुन रहे थे हम वो ख्वाब एक जाल था? वो साथ बस खयाल था? जो जाल था, वही सही, खयाल था, वही सही, मुझे उन्हीं में चूर रख, हकीकतों को दूर रख,  इधर निगाह फिर से कर! मुझे तबाह फिर से कर! जो सच न बन सका वही- मैं ख्वाब हूं, मैं सच नहीं, तू ख्वाब है , तू सच नहीं.                     - ©अंशुमान मिश्र

कविता- रामचन्द्र ©अंशुमान मिश्र

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  जय  जय   मर्यादा  पुरुषोत्तम , जय हे सीतापति! नमामि त्वम, जय    दशरथनंदन   अवधेश्वर, हे राम ! नमामि नमामि  नमम्।। तुमने  मानव   अवतार  लिया, प्रभु कितनों का उद्धार किया। मानव जीवन परिभाषित कर, इस भवसागर से  पार किया।। हे  कौशल्या  के लाल सुनो, हे दश आनन के काल सुनो।  हे  जग अधिपति अन्तर्यामी, हे सौम्यचारित्र, विशाल सुनो।।  हो  गई  धरा  दूषित  सबको, आसुरी  भाव   ही   भाए  हैं । इस घृणित जगत में प्रभु कोई ना  अपना, सभी   पराए  हैं ।। मानवता  के  सब नियमों की, हर दिन अब अरथी उठती है । लज्जा, दया, क्षमा, अब  सब बस रोतीं, पल पल घुटती हैं।। सो   सुनो   धनुर्धारी   प्रचंड, है समय बुरा यह ,करो अंत!! जय जय जय जय हे शंकरेश, जय रामचन्द्र जय रामचन्द्र!! जय रामचन्द्र जय रामचन्द्र!!! जय रामचन्द्र जय रामचन्द्र!!! ©अंशुमान मिश्र 

नज़्म - कातिल से कुछ ©अंशुमान मिश्र

 कातिल-ए-चैन जो मासूम सी इक सूरत थी! जाने वो तू था, या पत्थर की कोई मूरत थी! मैंने रोका नहीं था, ना ही  तू  रुका, लेकिन, तुझको मालूम  था  मुझको  तेरी  ज़रूरत थी! तूने सुन रक्खे थे पिछले मेरे दर्दों के बयांँ, तूने  देखे  थे  पुराने  मेरे जख्मों के निशाँ, तुझको मालूम थी वो ईंट, जिसे खींचा तो, टूट जाएगा मेरी सब्र'ओ'हिम्मत का मकाँ! तेरी खुदगर्जी या मेरी किस्मत, जो भी हो, गले लग कर'के जान की रुखसत, जो भी हो, इस तरह कत्ल किया तूने रूह का मेरी, फिर से उठने की अब नहीं हिम्मत, जो भी हो, क्या पता तूने भी न चाहा था ये हो जाए, करना  चाहूंँ  यकीन  तो भी कैसे ही आए, तेरी  खुदगर्जी  की  शमशीर  पे मेरा खूंँ है! क्या पता तेरे आंँसुओं से कल ये धुल पाए, मेरे हाफ़िज़, मेरे कातिल, जा तू आबाद रहे! करके  नाशाद  गया, पर  न  तू  नाशाद रहे! कातिल-ए-रूह  मेरे, हो  भला  तिरा लेकिन, मेरा  हर  अश्क  खुदा  गिन रहा है, याद रहे! ये याद रहे!  ये याद रहे!    ...

कविता - थोड़ा तुम मुझ-सा हो जाना! ©अंशुमान मिश्र

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी जब मेरी आदत के चलते मैं कमीज़ पर दाल गिरा दूंँ, चाय अगर तुमसे बनवा-बनवा कर, तुमको खूब थका दूंँ।  जब  मेरे  दफ्तर  से  वापस  आने  में देरी  होने  पर, मैजिस्टिक टॉकिज में हम पहुंचें पिक्चर पूरी होने पर।  जब मेरा चश्मा सर पर रखकर मैं उसको घर भर खोजूंँ, बाल तुम्हारे गुंँथकर जब  मस्ती में उनको जी भर नोचूंँ।  नए  तुम्हारे  शैंपू  से  जब  मैं अपनी  गाड़ी धुल  डालूंँ, या फिर जब आलस के चलते अपना तकिया तुम्हें बना लूंँ। जब जीवन के क्रूर क्षणों में, मैं अपना सब संबल खो दूंँ, और  तुम्हारे  पूछे  जाने  पर  मैं बुरी  तरह  से  रो  दूंँ।  जब मैं खुद निर्दोष रहूंँ, पर जग मुझको दोषी ठहराए, हृदय वेदना रहे अपरिमित, पर शब्दों में कही न जाए।  तब तुम मुझसे गुस्सा मत होना, मुझको समझा लेना, मेरी  नादानी  की  आदी  बन  मुझको  अपना  लेना।  “मेरे  आंँसू  गिरें अगर  तो  सिर्फ...

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी ज़रा  बेचैन  हूंँ, कोई  निशानी  छोड़  आया  हूंँ, कहीं  पीछे  अधूरी - सी कहानी  छोड़ आया हूंँ।  समेटी ज़िन्दगी मैंने बहर में औ' ग़ज़ल कह दी, कि मिसरों में फकत यादें पुरानी छोड़ आया हूंँ।  बुढ़ापे के सभी आज़ार मकते में लिखे मैंने, कि मतले में महकती सी जवानी छोड़ आया हूंँ।  कलम से गर्दनें हर्फों की कर डाली कलम मैंने, तड़पते काफ़ियों में खूंँ फिशानी छोड़ आया हूंँ।  किसी मासूम राही से, बदल सामान मैं अपना, ज़हर  लेकर के उसके पास पानी छोड़ आया हूंँ।  ©अंशुमान मिश्र

गीत - हे माधव! संसार बचा लो! ©अंशुमान मिश्र

 धधक धधक धरती जलती है, धरती  का  श्रृंगार   बचा  लो, हे  माधव!  संसार  बचा  लो! घेर चुकी मुझको भव माया, सत्य रूप पहचान न पाया, डूब  रहा  मझधार,  मुझे दे- निज संबल पतवार, बचा लो, हे माधव संसार बचा लो! दारुण  दुख  देखो  दीनों का, असहायों,  आश्रयहीनों  का, निर्धन नयन नीर  पर करके- करुणा का उपकार, बचा लो, हे  माधव!  संसार  बचा  लो! फिर द्रौपदि की लाज बचाओ, केशव, अपना वचन निभाओ, कलयुग के कौरव कुल द्वारा, पांडव जन  की  हार बचा लो, हे  माधव!  संसार  बचा  लो! हे  माधव!  संसार  बचा  लो!                     - ©अंशुमान मिश्र

गीत - कल कदाचित मैं रहूंँ या ना रहूंँ! ©अंशुमान मिश्र

 कल  कदाचित  मैं रहूंँ या  ना रहूंँ! चक्षु  में प्रेमाश्रुओं  की  धार जो, बन  रही  तेरा  नवल  श्रृंगार  जो, लाख रुकने के विफल संघर्ष कर, गिर रही फिर भी, तनिक छूकर अधर, आज  बहने  दे इसी में, क्या पता.. कल कदाचित बह सकूंँ, या ना बहूंँ! कल  कदाचित  मैं रहूंँ या ना रहूंँ.. मैं कि  तेरे  बिन  यहांँ एकल रहा, और एकल किस तरह, वंचन सहा! उन सहस्त्रों यातनाओं  की  व्यथा, और  तेरे  बाद  की  मेरी  कथा! आज मुझको बोलने दे, क्या  पता.. कल कदाचित कह सकूंँ, या ना कहूंँ! कल  कदाचित  मैं रहूंँ या  ना रहूंँ.. भाग्य से कंगाल, हूंँ आशा रहित, आज हूंँ एकल, नियति से हूंँ छलित, आज दे दे कष्ट जितना हो सके, दृग युगल ना सो सके, ना रो सके, सह रहा हूंँ आज सब, पर क्या पता, कल कदाचित सह सकूंँ, या ना सहूँ! कल  कदाचित  मैं रहूंँ या  ना रहूंँ.. कल  कदाचित  मैं रहूंँ या  ना रहूंँ!                   ...

गीत - मार्ग तुम छोड़ो नहीं ©अंशुमान मिश्र

 पुष्प की खुशबू से साथी, रास्ते  मोड़ो नहीं कंटकों का मार्ग है पर, मार्ग तुम छोड़ो नहीं ! क्या पता, गंतव्य पहुंचा  दे  यही  रस्ता  कभी, क्या पता, यदि  प्राण ले लें आपदाएं आज ही, क्या पता, विजयी रहोगे, या पराजय है लिखी, हार की चिंता से लेकिन... आस तुम तोड़ो नहीं, कंटकों का मार्ग है पर....  मार्ग तुम छोड़ो नहीं ! पुष्प की खुशबू से साथी...... अभी तो प्रारंभ है, तुम अभी से भय खा रहे, जो परिश्रम कर्म है... तुम उसी से घबरा रहे, इस तरह जिंदा रहे तो वीर... क्या ज़िंदा रहे? कायरों की सारिणी में.. नाम तुम जोड़ो नहीं, कंटकों का मार्ग है पर.. मार्ग तुम छोड़ो नहीं !  पुष्प  की खुशबू से साथी, रास्ते  मोड़ो नहीं,  कंटकों का मार्ग है पर मार्ग तुम छोड़ो नहीं!                           - ©अंशुमान

शायद कोई कमी रह गई थी ©अंशुमान मिश्र

 सारी उम्र कटेगी.. बस इस मुद्दे पर पछताने में, शायद कोई कमी रह गई थी तुमको समझाने में! तूफ़ाँ ने पल भर ना सोचा और गिरा डाला उसको, हमने जीवन वारा जिस पौधे को पेड़ बनाने में! जो खोया था, आधा जीवन उस पर रोने में बीता, बाकी आधा बीता, जो पाया था उसे बचाने में! इश्क सीखना चाहो गर, तो शम्मा से जाकर सीखो, पैदा होती परवाने से, मिट  जाती   परवाने  में! उठकर लड़ना, लड़कर मरना, मरकर उठना, फिर लड़ना, अलग लड़ाई  है, हर दिन जीकर,  हर दिन मर जाने में! तुम कहते थे जिसको खुद से दूर नहीं होने दोगे, मिली वही तस्वीर हमारी कल, घर के तहखाने में! मैं, तुम, हम दोनों, कुछ सपने, कुछ पैसे, छोटा-सा घर, कितना कम लगता है खुशियों का इक जहां बसाने में! शायद कोई कमी रह गई थी तुमको समझाने में!                        - ©अंशुमान मिश्र

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

 बेईमानों   से   शराफत   कर  रहे  हैं! हम यहां खुद की वकालत कर रहे हैं! झूठ  की बैठी अदालत में खड़े हम, सच बताने की हिमाकत कर रहे हैं! वो  ठिठुर  ठंडी   हवाओं   से   रहे  हैं, आंधियों  से  हम  बगावत  कर रहे हैं! एक पागल वो, जो पागल दिख रहा है, एक पागल हम.... मुहब्बत कर रहे हैं! वो  हमारी  जान   लेने  पर  आमादा, हम कि दीदार-ए-नज़ाकत कर रहे हैं, आज  लाखों  जानें  फिर कुर्बान होंगी, आज सज कर वो कायमत कर रहे हैं!                     -©अंशुमान मिश्र

फिर कहो परिणाम क्या हो? ©अंशुमान मिश्र

 चेतना जब मर रही हो, कष्ट की आकर रही हो, रुग्ण उर की हर शिरा में, वेदना  घर कर रही हो! नित नियति की मार सहकर, आस जब बस शांत रह कर, फिर नवल सा स्वप्न बुनती, ‘एक अंतिम बार’ कहकर.. इस  व्यथा  इस  वेदना  से, फिर कहो  विश्राम क्या हो? फिर कहो परिणाम क्या हो? फिर कहो परिणाम क्या हो?          ------- एक  तारा  टूटता  है, पर्ण तरु से छूटता है, किन्तु नभ फिर भी चमकता, वृक्ष भी कब रूठता है? किन्तु तारा मर गया ना, पर्ण का भी घर गया ना, वृक्ष, नभ, दोनों कुशल हैं, एक जीवन, पर गया ना, इस छिपी करुणा-कथा का, फिर कहो, आयाम क्या हो? फिर कहो परिणाम क्या हो? फिर कहो परिणाम क्या हो?                     - ©अंशुमान मिश्र

मुझसे भी बेहतर देखा था ©अंशुमान मिश्र

 तुमने  मेरे   खालीपन  को, मुझसे भी बेहतर देखा था, काग़ज़ के कोरेपन को भी, ग़ज़लों  में पढ़कर देखा था, टूटी   आशाएंँ    देखी   थीं, आंँखों  का सागर देखा था, अच्छे  से अच्छा  देखा था, बद से भी बदतर देखा था, भरी हुई, पर खाली दुनिया, खाली गांँव, शहर देखा था, खाली  वो थाली देखी थी, खाली  कोना हर देखा था, खाली  वो  जेबें  देखी थीं, खाली खाली घर देखा था, तुमने  मेरे  खालीपन  को, मुझसे भी बेहतर देखा था, -© अंशुमान मिश्र

उठो! ©अंशुमान मिश्र

 सुमेरु छंद ( 19 मात्रा प्रति चरण) ________ बंँधी  हैं  बेड़ियांँ  कर आज, तो क्या? अमा का आज भू  पर राज, तो क्या? नहीं सर पर किसी का हाथ, तो क्या? नहीं   कोई  खड़ा   है  साथ, तो क्या? बने   सम्बन्ध   ही  आबंध, तो क्या? बहुत  है भार, थकता कंध, तो क्या? नहीं  कोई  करे  स्वीकार, तो क्या? विरोधी यदि सकल संसार, तो क्या? अगर  रिपु  आत्म-संदेही  हृदय  है, विदित  हो, तब तुम्हारी हार तय है! उठो!  संसार   दर्शक   मात्र  सारा! उठो! यह  युद्ध  है  तुमसे  तुम्हारा! उठो छल-द्वेष-तम का काल बनकर, धधकती-सी उठो तुम ज्वाल बनकर, उठो!  उर  को  बना  कर्तव्य  शाला! उठो  बन  भोर! है  आकाश  काला! उठो!  संसार  ज्योतिर्मय करो  हे! उठो! हुंकार  बन  निर्भय  भरो हे! कि निज सम्मान आदर मांगता है! उठो! यह नभ दिवाकर मांगता है!        ©अंशुमान मिश्र

ग़ज़ल ©अंशुमान मिश्र

 सो रही दुनिया, अंधेरे में दिल'ए बेदार लेकर, ढूंढता हूं मैं तुम्हें यूं,  नेमत'ए दीदार लेकर, जान कल ही ले गया कातिल निगाहों से कोई था , आज फिर से आ गया है इक नया आज़ार लेकर.. या करेगी नाम, या बदनाम होगी शायरी अब, आ गए जो महफिलों में एक बादा ख्वार लेकर.. जो कभी खुशियां मनाते पत्थरों को देखकर थे, आज देखो रो रहे हैं, गौहर'ए शहवार  लेकर.. और सबकी क्या कहें, पाकर नहीं खुश ज़िन्दगी जो, हम  मुसलसल  हंस  रहे हैं  मौत के आसार  लेकर.. एक आधी सी ग़ज़ल इस आस पर आधी रखी है, लौट कर पूरा  करोगे  तुम, नए  अश'आर  लेकर..                    -©अंशुमान मिश्र