लघुकथा- अधूरी मोहब्बत ©संजय मिश्रा
नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी ये मोहब्बत भी गज़ब की शै बनाई है ऊपर वाले ने, चाहो न चाहो हो जाती है बस। ये अफ़साना उस किशोरावस्था का है , जो परीकथाओं और ख्वाबो ख्यालों की रंगभरी अनुभूतियों से भरी उम्र , समाज के अनुसार बहुत खतरनाक वयसन्धि मानी जाती है। खैर ये उनकी अपनी राय पर मोहब्बत को उसकी फ़िक्र कंहा । बात काफी पुरानी है तो 30-35 साल पीछे चलते है एक छोटा सा प्रशिद्ध शहर था । उसमें एक प्यारा सा मोहल्ला था जिसमें ये दोनों रहते थे । अरे भाई और भी लोग रहते थे पर इस कहानी के दोनों पात्र वंही रहते थे । दोनों के पिता सरकारी महकमों में उच्च पदासीन थे, तो उन सरकारी बंगलो में उनके भी घर थे , आसपास सभी सरकारी मुलाजिमों के घर थे सब सभ्रांत और पढेलिखे समझदार और उस दौर के हिसाब से आधुनिक लोग थे । सो सभी लड़के लड़कियां साथ में बैडमिन्टन खेलते और सहज दोस्ती रखते । वंही उनकी मुलाक़ात हुई थी , वो अपने करीबी रिश्तेदार के यंहा रहकर अपनी पढाई पूरी कर रहा था , सो दोस्तों के साथ घर के सामने ब...