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लघुकथा- अधूरी मोहब्बत ©संजय मिश्रा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी ये मोहब्बत भी गज़ब की शै बनाई है ऊपर वाले ने, चाहो न चाहो हो जाती है बस। ये अफ़साना उस   किशोरावस्था का है , जो परीकथाओं और ख्वाबो ख्यालों की रंगभरी अनुभूतियों से भरी उम्र , समाज के अनुसार बहुत खतरनाक वयसन्धि मानी जाती है।  खैर ये उनकी अपनी राय पर मोहब्बत को उसकी फ़िक्र कंहा ।      बात काफी पुरानी है तो 30-35 साल पीछे चलते है       एक छोटा सा प्रशिद्ध  शहर था । उसमें  एक प्यारा सा मोहल्ला था जिसमें ये दोनों रहते थे । अरे  भाई और भी लोग रहते थे पर इस कहानी के दोनों पात्र वंही रहते थे ।      दोनों के पिता सरकारी महकमों में उच्च पदासीन थे, तो उन सरकारी बंगलो में उनके भी घर थे , आसपास सभी सरकारी मुलाजिमों के घर थे सब सभ्रांत और पढेलिखे समझदार और उस दौर के हिसाब से आधुनिक लोग थे । सो सभी लड़के लड़कियां साथ में बैडमिन्टन खेलते और सहज दोस्ती रखते ।      वंही उनकी मुलाक़ात हुई थी , वो अपने करीबी रिश्तेदार के यंहा रहकर अपनी पढाई  पूरी कर रहा था , सो दोस्तों के साथ घर के सामने ब...

समर्पण ©संजय मिश्रा

 जीवन जीने के दो ही ढंग है या तो किसी को अपना बना लो या किसी के हो जाओ किसी को अपना बनाना संघर्ष और अंहकार  को बढाता है और संघर्ष  अंहकार में सुख कहाँ । तो किसी के हो जाओ वो आसान है संघर्ष से परे अंहकार से मुक्त है समर्पण में सुख है  किसी को अपना बनाने  से ज्यादा सरल सहज है किसी के हो जाओ । ©संजय मिश्रा

ग़ज़ल© संजय मिश्रा

  मेरा इश्क है मेरी ज़िंदगी ,इसको मिटाऐं  किस तरह l तेरी ज़ुस्तज़ू लिए जी रहे, तुझे भूल जाऐं किस तरह । यूँ ही बीत जाए दिन ब दिन, तेरे नाम हमने उम्र की..  इस बेहिसाब सी ज़िन्दगी,का हिसाब पाएँ किस तरह। की गुज़र रही है हदों से जो , ये अज़ब तङप मेरे दिल की है... ये ईनाम हैं जो ये ज़ख्म हैं, की इन्हे छिपायें किस तरह। तेरे दर पे झुकती रहे यूँ ही, सज़दे में मेरी ज़वाँ नज़र..   तू ख़ुदा है मेरा ख़फ़ा है क्यूँ , की तुझे मनायें किस तरह। मेरी साँस चलती रहे कभी , तेरी ख़ुशबुएँ भी जुदा न हो...  मेरी धड़कनें तेरे नाम हैं , तुझे लब पे लाएँ  किस तरह l यूँ ही लाख मुझ पे सितम करो, तेरे ज़ुल्म मुझको  क़ुबूल हैँ....  मुझे दर्द देना अदा तेरी, न कहूँ अदाएँ  किस तरह । © संजय मिश्रा