संदेश

#रमन यादव लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

टूट ©रमन यादव

 टुकड़ों में मैं बिखर रहा हूँ, टूट रहा हूँ धीरे-धीरे, लाख मिलाऊं तान दिलों की, चूक रहा हूँ धीरे-धीरे। ख़्वाब प्रेम का ख़्वाब हसीँ है, डगर प्रेम की मगर कठिन है, बेशक कुंड है प्रेम सुधा का, जलन प्रेम की मगर कठिन है। मुझ से जब जब वो रूठें, रोने का मन करता है, आँसू से कर तकिया गीला, सोने का मन करता है। मेरे हिस्से की सब खुशियां, नाम उन्हीं के हो जाएं, टकराते हैं जो जश्न में, जाम उन्हीं के हो जाएं। हाथ जोड़ कर विनती है कि, सम्मान ताक पर मत रखना, हर खता पर तुम दंड देना, मान ताक पर मत रखना।            ©  रमन यादव

पत्थर © रमन यादव

 दिए प्रीत के दो दिलों में, लहू तेल से जलते हों, पर प्रेम के संबंध सारे, सकल जगत को खलते हों, लोक-दिखावा, झूठी इज्जत,  बीज विरह के बोता है, बर्बादी ये देख देख कर, इंसाँ पत्थर होता है। पुत्री के मन चाहे को, जाति पर धुत्कार कर, जाति धर्म की व्यवस्था में, पिता समाज से हार कर, अजनबी संग प्रिय सुता का, मिथ्या संबंध जोता है, बर्बादी ये देख देख कर, इंसाँ पत्थर होता है। मेहंदी बेटी के हाथों पर, प्रीत जला रंगवाई हो, दहेज असुर ने फिर बेटी, जीते जी जलाई हो, पिता अदालत के दर पर, बेसुध हो कर रोता है, बर्बादी ये देख देख कर, इंसाँ पत्थर होता है।                 © रमन यादव

प्रेम ©रमन यादव

प्रेम   में   जान   न   दे  जान  लगा  जीने   में, छोड़   परहेज   सभी    प्रेम    सुरा   पीने   में, रूठ   महबूब  अगर  आज   जरा   भी   जाए, कल  नहीं  आज   मना  और  बसा  सीने  में। प्यार  का  नाम  न  लें  प्यार  अगर  झूठा  हो, प्यार  का  नाम  अगर  प्यार  ने'  ही  लूटा  हो, वो सनम ख़ाक सनम हाथ से' जिसके पल में, हाथ  माशूक  का'  बिन बात  झगड़ छूटा  हो। जानते  प्रेम  की  क्यों  आज   बुरी  हालत  है, प्रेम अब स्वार्थ जनित  जो की बुरी आफत है, काम की चाह को  जब  नाम दिया चाहत का, धारणा  प्रेम  की'  यह  प्रेम  ही'  पर लानत है। इश्क़  क्या  इश्क़  भला इश्क़ अकेला तन का हाल   ...

प्रेम का गणित ©रमन यादव

तुम में मुझको जोड़ो या फिर, मुझमें खुद को जोड़ कर देखो, 'तुम-मैं' 'मैं-तुम' हम बनते हैं, चुनर प्रीत की ओढ़ कर देखो। अश्रु धारा शून्य हुई है, शून्य दुख से टकरा कर के, खुशियां रख ली संजो संजो कर, प्रेम परिधि खिंचवा कर के। इक-दूजे संग चलते ऐसे, रेखाएं संपाती मानो, मेरी सफलता तुम में झलके, प्रेम हुआ अनुपाती मानो। राह जुदा जो हुई कभी तो, संगत कोण से हुए बराबर, तीर-ए-नज़र से भेद कर दूरी, तिर्यक रेखा सा छुए बराबर। सम्पूर्ण मेरे जीवन के वृत्त का, तुम केंद्र व्यास और त्रिज्या हो, अन्धकार के दुर्गम पथ पर, तुम चन्द्र सूर्य तिष्या हो। 'तेरा-मेरा',  'मेरा-तेरा', नियम लगे न प्यार में, सब मतभेदों मनभेदों का, उत्तर बाहों के हार में।                  @रमन यादव

साड़ी में नारी ©रमन यादव

 साड़ी में जो नारी है, उसके भी कुछ भाव हैं, कुछ प्रेम है, कुछ क्रोध है, कुछ अटूट लगाव हैं,  छ: मीटर का वस्त्र लपेटे, बच्चा कांधे रखती है, रात दिन वह अपना देकर, परिवार को बांधे रखती है, साड़ी का पल्लू पंखा बनता, जब शिशु शरीर से पसीना टपके, वो पल्लू ही पर्दा बनता , जब भूख से नन्हा बालक तड़पे,  साड़ी में केवल जिस्म नहीं है, एक रूह मकान बनाए बैठी है, जहां पिता का साया, प्रेम पति का,  माँ की छाया रहती है, सौंदर्य उसके मुख पर दिखता, मन के भाव न जाने कोई, साड़ी हुस्न की आग लगाए, चित्त रूदन ना जाने कोई, जिन पाँव बेडियाँ बाँध रखी हैं, उनको अब स्वच्छंद करो,  नजरों से नजर मिलाओ, बदन ताड़ना बंद करो, उदर गोचर सब देखते, मानसिक द्वन्द्व  दिखते ना,  नजर जिस्म के उभार पर रुकती, पर क्षणिक प्रलोभन टिकते ना,  साड़ी नहीं है लोक दिखावा, संस्कृति की पहचान है, जिस्म छरहरे, सुडौल बदन, कुछ दिन के मेहमान हैं,  भोग की वस्तु मान रहे सब, आंचल में उसके झांक रहे सब, मां का दूध याद करो, बनी ममता की साख रहे तब, जिस वक्ष को तुम ताड रहे हो, उसमें भी दिल धड़कता है,  घूरती ह...

भयावह ©रमन यादव

 देश की राजधानी दिल्ली में,  रात अंधेरी, सूनी गलियां, जा रही थी वो घर को, माँ-बाप की इकलौती बिटिया, नौकरी का समय यही था,  था रोज का आना जाना, डर दिल में नित ही था पर,  मिला नहीं था जालिम जमाना, कार रुकी आ बगल में, शीशा नीचे उतर गया, अकेली लड़की देख सड़क पर,  दिमाग नशीला बिफर गया, आओ छोड़ दूँ तुमको, जहाँ पर तुमको जाना है,  लड़की के लिए नहीं सुरक्षित,  बहन तुम्हें मैंने माना है, घबराई सी लड़की थी, ना बोल दिया सिर हिलाकर,  बेशर्म ने कार रोक दी,  क्या कर लेती वो चिल्लाकर, दूर-दूर तक कोई नहीं था, सब कुछ बियाबान था, बहन बोलकर जो मिला था, उसमें एक हैवान था, उसकी मर्जी ना चली तो,  मार दिया गाड़ी में धक्का,  चार दोस्तों को फोन किया,  बोला इंतजाम रात का है़ पक्का, थोड़ी दारु लेते आना, इसको भी पिला देंगे, जिस्म भला क्या बला है, इसकी आत्मा तक हिला देंगे, आँखें उसकी लाल हो गई, रो-रो कर फरियाद कर, भाई भाई कह रही थी, वो माँ-बाप को याद कर, चूर नशे में वहशी था, चार मोड़ पर थे खड़े, एक अकेली लड़की पर, सारे के सारे टूट पड़े, बेसहारा लाचार पड़ी थी...