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गीत- दिनकर ©सुविधा पंडित

नमन माँ शारदे नमन लेखनी  रामधारी सिंह 'दिनकर' की काव्य-लेखनी 16,11 मात्रा, अंत गुरु लघु ' रश्मिरथी  '-सी जब दिनकर की, कलम बनी हृदयांश।  ' समर शेष है ' 'कुरुक्षेत्र ' का, प्रकट किया दिव्यांश।। राष्ट्र-व्यथा, जनमानस दुख को, गाती बन कर गीत। ' द्वन्द्व गीत'   की भाषा खनकी, 'परम्परा'   की जीत।। काव्य कर्म 'प्रण-भंग'   न हो अब,  करें राष्ट्र निर्माण। ' परशुराम की पूर्ण प्रतीक्षा ' संकल्पित निर्वाण।। चार दिशाएँ अनुगुंजित हैं, लेखन का सारांश। ' रश्मिरथी'.... ।। राजनीति को दिशा दिखाई जातिवाद को भूल। युगधर्मी  ' हुंकार' भरी लिख, शोषण को निर्मूल।। ओज-क्रांति-आक्रोश लिये थी, लेखन की वह धार। संवेदन था अति विशिष्टतम, कुछ अनुपम शृंगार।। चिंतन-मनन प्रसाद गुणों से, विस्तृत हर अक्षांश।  '  रश्मिरथी'....  ।। नवयुवकों! जंजीर तोड़ दो, अभिशापित परतंत्र। अलंकरण भारत माँ का हो,नव स्वतंत्रता मंत्र।। यही कहे हर रचना उज्ज्वल, 'चक्रव्यूह ' को तोड़। चलें 'उर्वशी'   से लेकर हम, राह 'रेणुका' मोड़।।   '...

गीत- हिंदुस्तानी सेना ©सुविधा पंडित

वीर/आल्हा छंद कुल मात्रा 31,  16,15 पर यति अंत गुरु लघु अनिवार्य हिंदुस्तानी सेना आई, महाकाल का ले अवतार। सिंह गर्जना से गीदड़ के, झुंडो में है हाहाकार।। कायर ने बेटी बहनों की, माँगों से पौंछा सिन्दूर। उसकी ही माटी में खूँ की, खेलेंगे होली भरपूर।। केसरिया बाने में निकले, तीनों सेनाओं के शेर। दिन गिन लो प्रतिशोध-अगन में, स्वाहा करने भर की देर।। देश प्रेम की ज्वाला उर में, दहके आँखों में अंगार। धर्म युद्ध यह कलयुग का है, चलता पुनः 'सुदर्शन चक्र' । हर कुत्सित चेष्टा को रौंदा, रिपु की हुई दृष्टि जो वक्र।। चींटी-सा मसला ड्रोनों को, अफ-सोलह कर शक्ति विहीन। रक्षा कवच बेध कर अरि का, दशा बना दी है अति दीन।। साहस हिम्मत के हाथों में, हम लेकर चलते हथियार। गौरवान्वित हूँ आज स्वयं पर, जन्मभूमि मम हिंदुस्तान। नाम सुनेगा भविष्यत में तो, काँपेगा थर-थर शैतान।। इस माटी ने जने सदा ही, लुटे देश पर वीर जवान। सिन्दूरी संकल्प हमारा, तन न्योछावर माँ की शान।। उपद्रवी आतंकी की अब, शर्मनाक निश्चित है हार।  ©सुविधा पण्डित