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कविता- गणतंत्र ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

नमन माँ शारदे नमन ,लेखनी  जागो प्रिय ! स्वागत करो उठो ,  गणतंत्र द्वार पर आया है l बाहें पसार सत्कार करो,  जननी ने तुम्हे बुलाया है l नव स्वर्ण रश्मियाँ वृक्ष शीर्ष, उद्यान पुहुप नव कुसमित हैँ l किसलय सर-सर, मृदु मंगल स्वर,  वन लता कुंज अति हर्षित हैँ l खग कलरव मंगल गान मुदित,  सरि कल-कल धारा का गायन l नव पल्लव तोरण द्वार सजे,  अलि का अभिनंदन गुंजायन l लोहित मनहर पूरब लाली,  रवि प्रथम किरण स्वागत पग-पग l निर्झर उच्छृंखल मुदित नाद,  तृण शीर्ष तुहिन मुक्ता जगमग l उत्साहित पवन झकोर मंद,  द्रुम दल के संग किलोल करें l सुरभित झोंके चंदन वन के,  कण-कण में मृदुल सुगंध भरें l खेतोँ की हरियाली, कछार,  बस्ती, गलियाँ,  चौबारों में  l उत्साह पर्व का छाया है,  घर-घर, आँगन, ओसारों में l सज तीन रंग की चूनर में,  जननी हर्षित मुस्काती है l हिमगिरि किरीट मस्तक सोहे,  पग सिंधु लहर धो जाती है l यह पुण्य,देव दुर्लभ धरती,  आओ हम सौ-सौ नमन करें l इस पावन चंदन माटी को, गर्वित हों सादर शीश धरें l बलिदान प्राण कर जिन वीरों, ...

कविता- कविता ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

 नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  कविता-कविता मेरी कविता ओट लिए है , शांत हृदय के नील निलय में l श्याम मेघ के घूँघट पट में, बैठी है किंचित संशय में l श्वास हृदय के स्पन्दन में, क्षण-क्षण वह जीवित होती है l रुधिर प्रवाहित शिरा -शिरा में ,  प्राणों में संचित होती है l मानस अंतर्मन से उठकर, पीड़ा की सहचर बनती है l होकर वह आरुढ़ समसि में, ज़ब सुंदर अक्षर बनती है l झरझर निर्झर का कलकल रव, खग वृंदों का कलकल गायन l मोहक झोंके चंदन वन के, द्रुमदल पत्रों के वातायन l इंद्रचाप के विविध रंग से, कभी सजाती स्वप्न अलौकिक l कभी तारिका बनी निशा भर, प्रणय वृतांत सुनाती मौखिक l चंद्र वधूटी घूँघट घन से, झाँक कभी ओझल हो जाती l लज्जित दृग सिंदूरी आभा, कभी पवन चंचल हो जाती l एकाकी मन की संगिनि बन, प्रहरों मौन नयन तकती है l कभी कथाएँ प्रेम ग्रंथ की, प्रहरों सुनती है कहती है l मानस पट में कोलाहल कर, कभी कभी विचलित करती है l कभी नील नीरव अंबर का, मौन विचारों में भरती है l अंतर्मन का द्वन्द देखकर, वह अधीर चिंतित होती है l अटल लक्ष्य पथ से विचलन लख, कभी क्षणिक विस्मित होती है l देख दशा अस्थिर अंतर की, मंद मं...

गीत- मधुमास ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

  नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी सरसी छंद( विषम पद मात्रिक छंद) विधान-  मात्रा-२७,  यति - १६,११ चरणान्त - SI  विशेष – सरसी = चौपाई(१६) + दोहा का सम चरण(११) सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद) विधान- मात्रा-२८,  यति - १६,१२ चरणान्त - SS (मुखड़ा, समांत सरसी छंद एवं अंतरा सार छंद आधारित)  गीत-मधुमास तिल-तिल सूरज संग सुलगता, सुधियों क़ा संत्रास l पूरी रात बरसता टप-टप,...... नयनों से मधुमास l अंतर पोखर उफ़नाता है,.......तप्त पीर का पानी, मन की सोन मछरियाँ व्याकुल,पीड़ा से अनजानी l दग्ध हृदय की लपटें देती,पर्वत का आभास l गंगा जमुना धारा बहती,...आँखों क़े कोरों से l स्वप्न चिता की राख टटोलें,ऊँगली क़े पोरों से l अस्थि कलश नातों क़े,हाथों में छलता विश्वास l दूर गगन उड़ गए पखेरू, कल कल कलरव करते l चंदन बिरवा ठूँठ प्राण चढ़,.....सौ-सौ बार उतरते l सोन चिरैया छिपी कहीं, जाकर बादल क़े पास l मुरझाई क्यारी डाली-डाली में पतझड़ आया, विकल भृंग गुन-गुन क्रंदन में,करुण विलाप समाया l  उजड़ी पुष्प वाटिका खोई मोहक सुमन सुवास l विकल प्राण सुधियों के सागर में डूबें उतराऐं, भूले भटके पंछी पिंजड़े,में...

कविता- प्राण प्रियतम ©संजीव शुक्ला "रिक्त"

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  नेह उर में ले ,प्रबल विश्वास मन में, ले मिलन का लक्ष्य विह्वल प्राण-प्रण में l दर्श की अभिलाष ले युग तारिका में, बिंब हैं प्रेमाश्रु बूंदों के झरण में l हाथ ले वरमाल प्रत्याशा नयन में, हा,! कठिन अतिकाल प्रियतम के वरण में l मेरु होती पीर व्याकुल प्रियतमा की, दृष्टि फेरो प्राण आश्रय दो शरण में l  युग बिताए शोध में वत्सर गुजारे, अब कदाचित आयु है अंतिम चरण में l हो चुकी प्रियवर प्रतीक्षा की तितिक्षा, तीव्र होती व्यग्रता प्रत्येक क्षण में l व्याप्त हो सर्वत्र चेतन जीव जड़ में, वेद वाणी से सुना मैंने श्रवण में l पुष्प पल्लव तरु तने के मूल में तुम, कंद फल में कंटकों में छाल तृण में l तुम दिशा,नक्षत्र,धरती में गगन में , हो समाहित सृष्टि के आधार कण में l वेग सरिता का ,चपलता निर्झरों की, अग्नि ज्वाला ,वायु, जल ,आकाश मृण में l तुम पराभव हो तुम्ही उद्भव जगत का , सृष्टि सामंजस्य गृह की गति ,भ्रमण में l ग्रीष्म,पावस शीत ऋतु का चक्र तुमसे, तुम विगत हो,और आगत आवरण में l तुम शिराओं में रुधिर बन कर प्रवाहित, स्वास, तन, स्पंद जीवन में मरण में l ज्ञान हो तुम मोक्ष हो उद...

पञ्च-चामर छंद- श्रमिक ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

नमन, माँ शारदे नमन ,लेखनी  छंद - पंच चामर (वार्णिक) चरण - 4,मात्रा - 24,वर्ण - 16 जगण रगण जगण रगण जगण +S सहे सदैव त्रासदा, विपत्ति जो अपार है l अनेक  कष्ट  भोगता परन्तु जो उदार है ll श्रमादिजन्य स्वेद बिंदु देह का सिंगार है l परार्थ का स्वरूप, दीनता, श्रमावतार है ll निरीह दृष्टि से समाज को रहा निहार है l अतृप्त कंठ आर्त  वेदना भरी पुकार है ll प्रकाशवान गेह हों सभी यही विचार है l परन्तु पर्णधाम में  नितांत अन्धकार है ll वरीय अन्य काज,दी स्वयं व्यथा बिसार है l परोपकार जीविका रही....... न रंच रार है ll दरिद्रता दशा विपत्ति का..... न पारवार है l सहे दुरूह कष्ट,ताड़ना........कई प्रकार है ll अगाध नीर के समान शांत निर्विकार है l कठोर  देह  धारता कुदाल औ कुठार है ll विछत्त  पाद,"रिक्त" पेट राष्ट्र कर्णधार है l धरा सुपुत्र हे ! तुम्हे.. प्रणाम बार-बार है ll ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

छंद -सवैया ©संजीव शुक्ला

 नमन, लेखनी l तिन नैनन गेह सनेह कहाँ, जिन नैनन नीर बहे न बहे l नहिं जानत जो जन के मन की,तिन का मन पीर कहे न कहे ll कबहूँ नहिं हाथ धरे जिन काँधन का तिन संग रहे न रहे l मझधारन छाँड़ि दए बहियाँ, जिन का तिन बाँह गहे न गहे ll मन भीगत नाहिं न भीगत जा तन का रस धार बहे न बहे l जिन के मन पीर न औऱन की,तिन का निज पीर सहे न सहे ll दुख औऱन के नहिं पीरक भे, तिन का नित मोद लहे न लहे l निज संतति संपति नारिहि के, हित जानत ते न महे न महे ll ©संजीव शुक्ला

मुनि शेखर छंद- श्री कृष्ण ©संजीव शुक्ला "रिक्त"

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी  छंद- मुनि शेखर छंद वर्णिक छंद (वर्णवृत)। चरण- ४ वर्ण - २० मात्रा - २८ गणक्रम- सगण,जगण,जगण,भगण,रगण,सगण, लघु गुरु  दो-दो चरण समतुकांत _____________________________________ सत आन धर्म निशान वेद पुरान शाश्वत ज्ञान हैं ।  छवि ध्यान चंद्र समान मोहन चित्त जीवन प्रान हैं । अभिमान का अवसान निर्मल ज्ञान का अवधान हैं । गुण ज्ञान रूप निधान कष्ट निदान प्रेम प्रधान हैं । चहुँ ओर भीषण शोर चित्त हिलोर संकट घोर हैं । अरि जोर निश्चर खोर यामिनि भोर कष्ट कठोर हैं । सिर मोर माखन चोर भाव विभोर नैन चकोर हैं । प्रभु नेग दृष्टि बहोर कातर सिक्त लोचन कोर हैं  । ©संजीव शुक्ला "रिक्त"

कविता-पुष्प की व्यथा ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी बीज नष्ट कर दो कितने, पौधे कितने निर्मूल करो । नव पराग परिमल अंकुर के , उन्मूलन की भूल करो । पुष्प लताओं की जड़ काटो , या अबोध कलिका नोचो। निश्छल निरपराध कलियों की, पीड़ा रंच न तुम सोचो । फूलों को रौंदो कोमल, कलियों पर अत्याचार करो । कुत्सित चित में पुष्प विरोधी , पैदा नए विकार करो । कर लो यत्न अनेक ,सुमन का , सौरभ का न अंत होगा । मुस्काएंगीं कलियां ,फूलों का, खिलता बसंत होगा । ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

  कोई टूटा हुआ गुलदान बनकर देख लेना । कभी बेकार सा सामान बनकर देख लेना । नसीहत हर कदम पर खुद-ब-खुद मिलने लगेंगी.. किसी दिन बस ज़रा नादान बन कर देख लेना । चले आएंगे पीछे लोग जितना दूर जाओ.. किसी सहरा में नखलिस्तान बन कर देख लेना । नए हर रास्ते पर जा-ब-जा काँटे मिलेंगे.. हमारी राह से अनजान बनकर देख लेना । नया मिसरा कोई जो भी सुनेगा जोड़ देगा.. अधूरी नज़्म का उन्वान बन कर देख लेना । मिलेगी तालियाँ हर बात पर ये सोचना मत.. सुखनवर हो कभी इंसान बन कर देख लेना । ©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'

लघुकथा-नन्हा परिंदा ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी एक चिड़िया का जोड़ा.....एक दिन दोनों मिलकर  बेहद खुश एक छोटा सा घोंसला बनाने लगे ..चिड़िया चोंच में दबा के तिनके बीन के लाती और चिड़ा खूबसूरती से उन तिनकों से घोंसला बनाता .घोंसला तैयार हुआ ..कुछ दिनों बाद एक नन्हा परिंदा घोंसले में आ गया ..जोड़े की दुनिया नन्हे परिंदे की नटखट ची ची ..की आवाज़ों से आबाद थी ..दोनों रोज सुबह दाने की तलाश में दूर उड़ जाते .और शाम को वापस तेज़ी से पंख फड़फड़ाते वापस लौट आते ..अक्सर खाली पेट पर दोनों की चोंच में कुछ दाने नन्हे के लिए जरूर दबे होते ..लौट कर नन्हे को देखते ही थकन भूख सब खो जाती .बारी बारी दोनों अपनी चोंच में छुपा के रखे  दाने  नन्हे की नन्ही चोंच में डालते .. कुछ दिनों बाद नन्हे परिंदे के रूपहले पंख आने लगे ..दोनों उसके पंखो को बढ़ता देख बेहद खुश थे .नन्हा धीरे धीरे फुदकता हुआ घोंसले के बाहर आ जाता ..चलने की कोशिश में लड़खड़ाता तो दोनों का कलेजा मुँह तक आ जाता ..दोनों झपट कर नन्हे को संभालते ..अजीब कश्मकश थी .नन्हे को उड़ता भी जल्द  से जल्द देखना चाहते थे और मन में कही उसे अकेले उड़ने देने से डर भी ..खैर ..वक्त क...

कविता-कविता ©संजीव शुक्ला

 नमन, लेखनी  कविता कवि का..अंतर्मन द्वार बनी l दृग से बहकर निकली जलधार बनी ll अति दुसह वेदना.... रक्त प्रवाह बनी,  ज़ब रुधिर शिरा में कण-कण बहतीं हैँ l कुछ कष्ट पराये,....दुख कुछअपनों के,  ज़ब हृदय तंत्रिका..... दुर्बल सहतीं हैँ l आघात अदृश्य असंख्य शूल मन पर, पीड़ा दायक क्षण-क्षण जीवन दुष्कर l हो व्याप्त व्यथा,..ज़ब प्राण,चेतना में ,  विष दंश गड़ाए हों.... लाखों विषधर l ज़ब कालकूट का... काट न हो कोई,  कविता अस्फुट स्वर का आधार बनी ll ज़ब प्राण वायु में हो-होकर मिश्रित,  नित पीर स्वास बन,हृदय प्रवेश करे l प्रति स्पंदन अस्फुट मर्मर ध्वनि कर,   संताप हृदय में..... नित्य निवेश करे l अभिव्यक्ति द्वार पट पर लटके ताले, घन घोर मेघ.... उर-नभ छाये काले l ज़ब गिरा क्षीण हो, शब्दहीन निर्बल,  व्याकुल करते मन, भाव प्रलय वाले l मसि समसि सहारा मात्र शेष हो ज़ब,  पृष्ठों पर भावों का....... विस्तार बनी ll कविता कवि का..अंतर्मन द्वार बनी l दृग से बहकर निकली जलधार बनी ll ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

कविता-बादल का टुकड़ा ©संजीव शुक्ला

खुला आसमा एक बादल का टुकड़ा ...... हवा के थपेड़ों से लड़ता हुआ सा ...... परेशान फिरता भटकता फलक पर... कभी लड़खड़ा कर संभलता हुआ सा... हसीं हम सफर खूबसूरत जहां था.. घटाओं का अपना बड़ा कारवां था... भटक कर फ़लक में कहीं खो गया था...  न जाने वो कैसे ज़ुदा हो गया था ...... बहुत दूर अपनी जमी छोड़ आया .......  डगर पूछता आगे बढ़ता हुआ सा ...... वो अपनी घटा आसमाँ खोजता सा...... वो खोया हुआ आशियाँ खोजता सा.... नए मोड़ पर कुछ अटकता हुआ सा..... सहमता डरा सा झिझकता हुआ सा.... बड़ा कोई बादल मिला रास्ते में ..... उसे देख ठिठका सहमता हुआ सा ........ कहीं रौशनी दूर देखी शफ़क पे ... उसी ओर बढ़ने लगा वो फ़लक पे..... ज़ुदा कारवां से भटकता मुसाफिर ... उम्मीदों के दामन पकड़ता हुआ सा.. निगाहों में शोला कोई जल रहा था... कोई ख्वाब टूटा हुआ पल रहा था... लिए प्यास रंजूर पाँवों में छाले....  संभाले मुकम्मल नमी चल रहा था ....... बहुत प्यासी अपनी ज़मीं खोजता सा ..... बदस्तूर मुश्किल सफर थक चुका सा..... खुला आसमाँ एक बादल का टुकड़ा... हवा के थपेड़ों से लडता हुआ सा..... ©संजीव शुक्ला रिक्त

ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

  वो जिससे दुआओं में,मन्नत में असर आया l गुमनाम सितारा था टूटा तो नज़र आया l जुगनू की टिम टिम सा बारिश की रिमझिम सा.... मायूस हुईं आँखें ,पलकों में उतर आया l यादों में शरारत का शोखी का कोई लम्हा.. इक रेख हंसी की ले होठों पे बिखर आया l तारों की टोली ले..माझी का कोई मंजर... जब जब नींदें रूठीं, सपने ले कर आया l माझी की किताबों के पन्ने ज़ब-ज़ब पलटे... धुंधला सा अक्स कोई हर्फों में उभर आया l  ©संजीव शुक्ला रिक्त

ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

 भरोसा है जिन्हे खुद पर,खज़ाने छोड़ देते हैँ l परिंदे पेट भर जाए........तो दाने छोड़ देते हैँ l हवाएं नीम की,आँगन से अक्सर पूछ लेती है... घरों के लोग कैसे घर पुराने छोड़ देते हैँ l वो गलियाँ गाँव की,शादाब बचपन की हसीं यादें.. शहर की चाह मे मौसम सुहाने छोड़ देते हैं l वो जिनके आ चुके हैँ आग की ज़द में कभी दामन.. वो अक्सर दूसरों के घर जलाने छोड़ देते हैँ l कहाँ हैं,ज़िन्दगी में हर कदम जिनकी जरूरत है .... गुज़र जाते हैं दुनियाँ से,फ़साने छोड़ देते हैँ l बुलंदी की हवस में,'रिक्त' मैं हैरान हूँ कैसे ... न जाने लोग क्यूँ गुज़रे जमाने छोड़ देते हैँ l ©रिक्त

कविता-पथ परिवर्तन ©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  नूतन किसलय निश्छल को,  इस मृदु लता सुकोमल को l नव विकसित शिशु कोपल को,या अबोध पल्लव दल को, तज... कर लूँ पथ परिवर्तन?  किंचित स्लथ, जीर्ण नहीं,  जरठ, किन्तु हूँ शीर्ण नहीं l कर्षण कर निज संबल को, निरवलम्ब कर निर्बल को, तज..कर लूँ पथ परिवर्तन ? निज सुख़ की प्रत्याशा में,  विस्तृत घोर निराशा में l सघन तिमिर में पल पल को,कातर लोचन के जल को, तज...कर लूँ पथ परिवर्तन? माना घोर अमावश है, विधि की भाषा कर्कश है l मर्दन कर के करतल को,बल दे भावी के छल को, तज... कर लूँ पथ परिवर्तन?? ©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'

गीत-जिंदगी ©संजीव शुक्ला

 तलाश में उम्र जिसकी गुज़री,वो जिंदगी भी न पास आई सभी के हिस्से में आए सागर , हमारे हिस्से में प्यास आई l अज़ब कहानी है तिश्नगी की, हमें भी चाहत थी जिंदगी की l खुदा की मूरत बसा के दिल में, अजीब ख़्वाहिश थी बन्दगी की l वो घर खुदा को न रास आया,न घर को मूरत ही रास आई l ये वादियाँ बाग ये बहारें, हसीं गुलों की खिली कतारें l हवा के ठंडे शरीर झोंके, जवान सावन नरम फुहारें l हसीन रंगत महक गुलों की,पसंद रिमझिम न खास आई l कभी हसीं था जहान सारा, हसीन लगता था हर नज़ारा l हसीन गुलशन जमीन सारी, क़े बाँह में आसमान सारा l मगर ख्यालों की क्यारियों में, न फूल महके न घास आई l खयाल ख्वाबों का वो जहाँ था, हसीन फूलों का आशियाँ था l ये ज़ख्म, राहों में बिखरे काँटे, ये ठोकरों का सफर कहाँ था l सुबह तमन्ना जो हँस के निकली, वो शाम को घर उदास आई l ©रिक्त

ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

 बारिश का आसमाँ है सहाबों में रहेंगे l यूँ चंद आफ़ताब नकाबों में रहेंगे l ज़ज़्बात शाइरी की शक़्ल ले सके अगर...  तहरीर-ए-वफ़ा बन के निसाबों में रहेंगे l सहरा की रेत औऱ अक़्स माहताब का....  हम बस इन्ही हसीन सराबों में रहेंगे l गुलदान में सजें ये मुकद्दर में कहाँ है....  काँटों के साथ सुर्ख गुलाबों में रहेंगे l गर बेखयाल हो के कभी छू गया कोई...  छेड़ेंगे कोई तान रबाबों में रहेंगे l खामोश क़ब्र में जो उतर जाए, हम नहीं...  तहरीर में मिलेंगे........ क़िताबों में रहेंगे l आया करेंगे 'रिक्त'ज़हन में कभी कभी..  बाक़ायदा माज़ी के हिजाबों में रहेंगे l © संजीव शुक्ला रिक्त

छंद पंच चामर ©संजीव शुक्ला

 दिया जले दिशा दिशा प्रकाश का प्रसार हो l अनेक ज्योति पुंज एक भावना विचार हो ll समस्त शक्ति राष्ट्र भक्ति संग जो अपार हो l अवश्य राष्ट्र मुक्त... कष्ट से सभी प्रकार हो ll सवाम सप्त कोटि कंठ वीरता हुँकार हो l समूह शंखनाद.....विश्व भेदती पुकार हो ll विभिन्न वेश जाति किंतु एक संसकार हो l समस्त शक्ति साध लक्ष्य में कड़ा प्रहार हो l विपत्ति आपदा विलुप्त हो व्यथा सँहार हो l विनष्ट वेदना...... समूल आपदा निवार हो l विलुप्त मेघ कष्ट के ....उछाह द्वार-द्वार हो l मयंक राहु मुक्त हो.... विलुप्त अंधकार हो ll © संजीव शुक्ला रिक्त

गीत - सुधियाँ ©संजीव शुक्ला

 सुधियाँ परछाईंहोती हैँ, आजीवन पीछा करतीं हैँ l अमर सदा रहती हैँ मन में कभी नहीं मरतीं हैँ l बादल बन कर नील गगन में,  पल पल में आकार बदलतीं l कभी भोर का उजियारा फिर ,  शाम सुनहरी बन कर ढलतीं l कभी ज्योत्सना जगमग शशि की,कभी अमा निशि बन डरतीं हैँ l धूल बनी बिखरी मरुथल में,  रजकण बनी कभी सागर तट l कभी अधर पर स्मित ज़ब-ज़ब   सुधियाँ मुखर हुईं मानस पट l कातर नयनों के निर्झर से,बनकर अश्रु कभी झरतीं हैँ l श्रावण में दामिनि कि द्युति बन,  सहसा चमक उठीं अंबर पर l सरि की कल-कल जलधारा में,  डोलें डगमग नौका बन कर l स्मृति नभ के इंद्र धनुष में, रंग अनेक कभी भरतीं हैँ l बनकर सर-सर मंद झकोरे,  पत्तों से गाथा कहतीं हैँ l भूले बिसरे गीत सुनातीं,  स्वर लहरी बनकर बहतीं हैँ l एकाकी मन की संगिनि बन,विविध रूप सुधियाँ धरतीं हैँ l वेद ऋचा बन वर्ण-वर्ण से,  ज्ञान शाश्वत दे जाती हैँ l शांत सरोवर निर्मल मन में, कभी लहर बन लहराती हैँ l सुधियाँ पीड़ा हुईं कभी तो,औषधि बनीं पीर हरतीं हैँ l ©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'

ग़ज़ल © संजीव शुक्ला

 अक्स दिखलाते थे जब किरदार दिखलाने लगे l आइने भी सरफिरे .... ..तब से नजर आने लगे l  देख कर इन आईनों की यूं बदलतीं फितरतें....  लोग इनके सामने जाने से .....कतराने लगे l इसलिए शाइर की बातों पर यकीं आता नहीं .. देखिए दिन में सितारे ....आप गिनवाने लगे l हम सुनाना चाहते थे हाल-ए-दिल अपना मगर..  आप फिर अपने........ पुराने मर्सिये गाने लगे l और रिश्ते के लिए इससे ज़ियादा क्या करें.... हम अना पीने लगे हैं...और गम खाने लगे l  छोड़ जाते साथ गर...... नाराज़गी ही थी हुज़ूर... आप तो अब दिल जहन भी छोड़ कर जाने लगे l  रिक्त अब खामोशियों से भी जमाने को गिला.. हिल गए गर लब जरा अल्फाज भी ताने लगे  © संजीव शुक्ला