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गीत- युद्ध ©सम्पदा मिश्रा

 नमन, माँ शारदे नमन लेखनी विधा- गीत युद्ध खुद से लड़ रहा है। कोई दुखी नहीं है जग में  क्यों कर कुुण्ठा पाल रहे तुम जीवन मेरा दुख मय सबसे   मन में भ्रम क्यों डाल रहे तुम अब निकलो फिर शोध करो तुम कौन अधीर नहीं दुनिया में  छप्पन भोग प्राप्त है जिनको  मन की शांति नहीं कुटिया में  जिसका बेटा बोल सके ना  ना ही कोई संवाद करें  उसकी भी समृद्धि का यह  जन जन बस उपहास करें  कौन वेदना का अंदाज़ा उसके मन की कर पाएगा  क्या तब भी इस कलयुग में  आबाद जहाँ वह पायेगा ? उसकी लेश मात्र की त्रुटि का  भार उस पर क्यों पड़ रहा है विकसित सुगठित सुन्दर मानव  भी युद्ध खुद से लड़ रहा है  पहुंच चुके है विकसित पथ पर  पर प्रभु की सत्ता मान रहे  विधना की कठिन परीक्षा से  वह लड़ने की फिर ठान रहे  बेबस होकर नतमस्तक है  विधि की निर्मित सत्ता से  वार सभी खाली जा रहे  उस नासग्रिक गुण वत्ता से  विधि ने खुद की इच्छा से ही  शोषित साम्राज्य बनाया है  मानव को इस भरम जाल से  क्षण क्षण पल पल  भरमाय...

कविता ©सम्पदा मिश्रा

  जैसे हम सब गांव पधारे अम्मा झट से शर्बत लायीं।  रोटी रण में पड़कर हम तो  दुख भी स्वजनों का सहते थे सारा घर था द्रव्य भरा पर हम तो बस छुट्टी तकते थे, कोई मन आहत करता था हमको घर की याद सताती चाहे जिसको भी डिव भाये हमको गुड़ की राब सुहाती आने पर सबके झट से माँ पहले जग में राब मिलाई जैसे हम सब गाँव पधारे अम्मा झट से शर्बत लायीं।  में में जब करती फिर मुघनी   जो थी घर की नौकर दासी  खाने वह मट्ठा तरबूजा - वह मालिक के घर ही आती   आगे हम होकर फिर क्यों ना गढ़ इस दास प्रथा का तोड़े मुघनी जिसमे है जकड़ी सी फिर ज़ंज़ीर वही क्यों जोड़े माज़ा जब अब प्यास बुझाये  राब दिखी तो वह ललचायी जैसे हम सब गांव पधारे अम्मा झट से शर्बत लायीं प्रारम्भिक क्षण में शहरों से  गांव कभी जब वापस आते  अम्मा झटपट राब उठाती खुश होकर रोटी हम खाते  अब तो सबको मालुम होगा कैसी विपदा राब हुई है  पेप्सी अब तो फैशन में है सबका यह अभिशाप हुई है   स्लाइस डिव आने पर सबने देसी स्वाद दिए विसरायी जैसे हम सब गाँव पधारे अम्मा झट से शर्बत लाय...