गीत- ज़िन्दगी ©दीप्ति सिंह "दीया"
नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी छुपाया है मैंने...बहुत अपने गम को मगर जिंदगी तेरा नाम आ रहा है लबों की हँसी से नज़र की नमी को छुपाना हमारे भी काम आ रहा है मैं अपने सफ़र में...अकेला चला था यूँ ही रास्ते में .... मुझे गम मिला था मेरा गम है साया.... मेरी जिंदगी का मेरे साथ ग़म वो तमाम आ रहा है बनाया है मैंने...गमों को ही साथी मेरी जिंदगी में... हैं बस दर्द बाकी हमारा सफर तो...यूँ ही चल रहा है जिकर गम का तो सुबहो शाम आ रहा है निराशा के बादल... यूँ हमको हैं घेरे मेरे रास्तों पर ....... घने हैं अंधेरे कभी तो कहीं पे... सहर भी खिलेगी यही हौसला मेरे काम आ रहा है ©दीप्ति सिंह 'दीया'