संदेश

#दीप्ति सिंह लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गीत- ज़िन्दगी ©दीप्ति सिंह "दीया"

 नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  छुपाया है मैंने...बहुत अपने गम को  मगर जिंदगी तेरा नाम आ रहा है  लबों की हँसी से नज़र की नमी को  छुपाना हमारे भी काम आ रहा है    मैं अपने सफ़र में...अकेला चला था  यूँ ही रास्ते में .... मुझे गम मिला था  मेरा गम है साया.... मेरी जिंदगी का मेरे साथ ग़म वो तमाम आ रहा है   बनाया है मैंने...गमों को ही साथी  मेरी जिंदगी में... हैं बस दर्द बाकी हमारा सफर तो...यूँ ही चल रहा है  जिकर गम का तो सुबहो शाम आ रहा है निराशा के बादल... यूँ हमको हैं घेरे  मेरे रास्तों पर  ....... घने  हैं  अंधेरे कभी तो कहीं पे... सहर भी खिलेगी  यही हौसला मेरे काम आ रहा है   ©दीप्ति सिंह 'दीया'

ग़ज़ल ©दीप्ति सिंह "दीया"

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी 2122 1212 22 याद जब आपकी चली आए, जैसे खुशबू कोई चली आए। हमने महसूस है किया जिनको , बात में वो खुशी चली आए। आपके दिल में उतर आने से , रूह में रौशनी चली आए। दिल को आराम भी नहीं मिलता , आँख में जब नमी चली आए। आपका इश्क़ ऐसे हासिल हो , साँस में आशिक़ी चली आए। इश्क़ तब और ख़ूबसूरत हो, साथ पाकीज़गी चली आए। ये तो दीया की ख़ुशनसीबी है , पास यूँ ज़िंदगी चली आए। ©दीप्ति सिंह "दीया"

दोहावली - नटवर नंद किशोर ©दीप्ति सिंह 'दीया'

राधेश्याम नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी अधरों पर मुरली सजे,शीश सजाए मोर। कोटि काम लज्जित करें, नटवर नंद किशोर ।। राधा उर जिनके बसें, मीरा हिय में आप। प्रेम सहित सुमिरन करें, मिट जाएँ संताप ।। सब के स्वामी साँवरे, हरते मन की त्रास । अर्जी है ये आपसे, करिये अंतर वास।। नाम सुधा-रस आपका, करता भाव विभोर । कृष्ण कहें, कान्हा कहें, कहते माखनचोर।। छवि अति न्यारी आपकी,देखे मन के नैन। किस विधि पाऊँ आपको,सोचे ये दिन-रैन ।। ©दीप्ति सिंह "दीया"

जय सियाराम ©दीप्ति सिंह

 राम नाम रट रे मना, राम जगत आधार। जग में प्रभु के नाम की,महिमा अपरंपार ।। निर्मल मन से कीजिये, सुमिरन बारम्बार । राम करेंगे आपको,भव सागर से पार।। राम नाम औषधि बड़ी, कहता है संसार ।  पीड़ा मिट जाती सभी, उर आनंद अपार।। उर में राम बसें सदा,मुख से जपते नाम । मिल जाए संतसंग जो, गृह भी बनता धाम ।। पाप मिटे शत जन्म के, प्रभु हैं नाम अधीन । भक्त वही बलवान है, नाम रहे तल्लीन ।। ताप त्रिगुण सागर बड़ा, इसमें नौका राम । जग की आशा त्यागिये, हरि आएँगे काम ।। दीया के प्रभु साँवरे,राम कहो या श्याम ।   अंतर उजियारा करे, अंतिम है विश्राम ।। ©दीप्ति सिंह 'दीया'

गीत- कविता ©दीप्ति सिंह 'दीया'

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी  जब समसि शब्द को भाव के संग पिरोती है, कविता संवेदनशील तभी होती है । जब जन-जन की पीड़ा पृष्ठों पर बोती है , कविता संवेदनशील तभी होती है । जब अन्न उगाने वाला भूखा सोता है,  और करता जो निर्माण वो बेघर होता है। जब कष्ट देख इन सबके मसि भी रोती है,  कविता संवेदनशील तभी होती है । परिवर्तन संभव है मानस के चिंतन का, आधार रही है कविता जन आंदोलन का, जब जन हितार्थ मसि संकल्पों को ढोती है,  कविता संवेदनशील तभी होती है । ©दीप्ति सिंह 'दीया'

ग़ज़ल ©दीप्ति सिंह 'दीया'

राधेश्याम  नमन,माँ शारदे नमन, लेखनी बहर -122  122  122  122 तेरी नेमतों से शिकायत नहीं है, मगर ख़ुश रहें ये भी हालत नहीं है।   सज़ा बेक़सूरों को भी मिल रही है , जो उनपे तुम्हारी इनायत नहीं है।  है महरूम इंसानियत आदमी से, कि अब आदमी  से मुहब्बत नहीं है।   शिकायत तुम्हारी कहाँ लेके जाएँ , कि तुमसे बड़ी तो अदालत नहीं है ।  सदा रौशनी हो जो "दीया" जलेगी, कि ये तीरगी दिल की फितरत नहीं है।   ©दीप्ति सिंह 'दीया'

दोहा ©दीप्ति सिंह

 रे मन मन को मार के, बने न कोई काज । सबही भूल बिसार के, सुंदर बनता आज ।। जीवन सुख दुख से बना, ये जीवन आधार । धीरज मन में राखिये, करिये सब स्वीकार ।।  मन की निर्मलता रहे, बचे न कोई काँट । सुख दुख जो प्रभु से मिले, दीजै सबमें बाँट ।। सुख में सब साथी बनें, दुख में छोड़ें हाथ  । रहिये प्रभु के आसरे,  सदा रहेंगे साथ  ।। उर आनंद बसाइये, लीजै प्रभु का नाम । प्रभु के ही गुण गाइये, पूरन होंगे काम ।। © दीप्ति सिंह ' दीया'

गज़ल ©दीप्ति सिंह

 इस क़दर मुहब्बत कर जाओ,कि जिस्म समंदर हो जाए । मैं तेरे अंदर खो जाऊँ, तू मेरे अंदर खो जाए। ये ख़ुशियाँ कुछ पल की भी हों,तो भी है ये मंज़ूर मुझे,  बस लम्हा इतना क़ाबिल हो,कि ख़ास वो मंज़र हो जाए । पहलू में इतने पास रहो,कि साँसों में साँस घुल जाए, और इन साँसों की गर्मी से, हर ख़्वाहिश बंजर हो जाए । जब-जब ये नज़रें मिलती हैं, तू रूह मेरी छू लेता है, नज़रों के यूँ ही मिलने से, हर ग़म छूमंतर हो जाए । ये हवा तुम्हें जब छूती है, महसूस मुझे हो जाता है,  जो छूले मुझको ग़र यूँ ही, तो आज बवंडर हो जाए । तू आज मयस्सर हो न हो, तू साथ उमर भर हो न हो,  बस नाम हो तेरा साँसों में, और साँसे पत्थर हो जाए । मन प्यासा है मन काला है, बिन तेरे कहाँ उजाला है,  जो तू बस जाए रग-रग में, तो 'दीया' बेहतर हो जाए । ©दीया

गज़ल ©दीप्ति सिंह

आजकल सुनता नहीं दिल क्या करें । शायरी लिखना है मुश्किल क्या करें ।  है ज़हन ख़ाली मेरा अल्फ़ाज़ से... और उलझन भी है शामिल क्या करें । आपसे कैसे करें चाहत बयाँ...  जब नहीँ अल्फ़ाज़ काबिल क्या करें । आप तो रहते हैं सबकी रूह में...  बस नहीं होते हैं हासिल, क्या करें । आपकी खुशबू नहीं जिस साँस में... लग रही वो साँस कातिल क्या करें ।  आपका चर्चा नहीं होता जहाँ... है बड़ी मनहूस महफ़िल क्या करें । आपकी 'दीया' में कुछ बाक़ी नहीं,  दे चुके जब आपको दिल क्या करें । ©दीप्ति सिंह "दीया"

गीत- दरसन ©दीप्ति सिंह

  राधेकृष्ण नमन,माँ शारदे नमन, लेखनी तोरे दरसन को तरसे अँखियाँ  बिनु दरसन के बरसे अँखियाँ  तोहे खोजन को बेकल होकर निकली कबसे घरसे अँखियाँ   तोहे खोजूँ बृज की गलियन में  तोहे खोजूँ मैं वृंदावन में  तोहे खोज न पाऊँ जो मन में  भींजी हैं इस डर से अँँखियाँ  तुम हो पायल की रूनझुन में  तुम हो मुरली की गुनगुन में  तुम हो इस धड़कन की धुन में  ये सोचूँ तो हरसे अँखियाँ तुम नामी हो,तुम नाम भी हो। तुम श्यामा हो,तुम श्याम भी हो। तुम ही सब तीरथ,धाम भी हो। सुनती ये गुरुवर से अँखियाँ ।। जो तेरा सुमिरन हो जाए  तो मन वृंदावन हो जाए  बस अविरल चिंतन हो जाए  ये ही चाहे भीतर से अँखियाँ । ©दीप्ति सिंह "दीया"

गज़ल ©दीप्ति सिंह

बह़्र -  मुतदारिक मुसम्मन सालिम अरकान-फ़ाइलुन/फ़ाईलुन/फ़ाइलुन/फ़ाइलुन   वज़्न-    212   212   212  212   साँवरे जबसे तुमसे मुहब्बत हुई  ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हुई दिल धड़कता है अब तो तेरे नाम से  ये इबादत भी दिल की जरूरत हुई   तेरी आँखों में है ज़िंदगी का नशा  मंद मुस्कान उसपर क़यामत हुई  बाँसुरी मेरे कानों में बजती रहे  दीद हो जाए बस इतनी हसरत हुई   नाम जपती हूँ जब साँस लेती हूँ मैं  तुझमें रहना मगन मेरी आदत हुई  आख़िरी साँस में बस तेरा नाम हो दिल में हर बार पैदा ये मन्नत हुई   आज 'दीया' है रौशन तेरे नाम से  तेरे दम से ही आबाद किस्मत हुई ©दीप्ति सिंह 'दीया'

मान लेते हैं ©दीप्ति सिंह

 जो अक्सर दूसरों की बात,यूँ ही मान लेते हैं । बड़े नादान होंगे वो,ये हम भी मान लेते हैं । अजी आसाँ नहीं है, आजकल इंसान रह पाना , हमारी सादगी को, बेवक़ूफ़ी मान लेते हैं । हमें तो बात सीधे साफ़, लहज़े में कही जाए, नहीं पढ़ते छुपी बातें, जो दिखती मान लेते हैं ।  कभी भी बेहिचक कर दें, बयाँ जज़्बात को अपने,  सभी की नेक नीयत है , ये जल्दी मान लेते हैं । कभी लगता है 'दीया' भी, किसी की आरज़ू  होती ,        मगर रहती हैं कुछ ख़वाहिश, अधूरी मान लेते हैं । ©दीप्ति सिंह 'दीया'

प्यार की बदरा ©दीप्ति सिंह

 तेरे प्यार की बदरा बरसे ज़रा  मन भीगे थोड़ा... तरसे ज़रा जज़्बातों की बिजुरी चमके ज़रा  कभी ज्यादा और कभी....थम के ज़रा  आज मौसम की नीयत बेईमान है दिल के अंदर ये कैसा तूफान है  यूँ मुहब्बत की ख़ुशबू महके ज़रा  मन झूमे और तन बहके ज़रा    अब के सावन यूँ ही बीते ना कोई कोना मन का रीते ना आज भीगे तो अरमाँ निकले ज़रा  तेरी बाहों में आके पिघले ज़रा  तेरी उल्फ़त में है डूब जाना मुझे  चाहे दुनियाँ बोले दीवाना मुझे  तेरी चाहत की बारिश कर दे ज़रा  मेरी ख़्वाहिश का दामन भर दे ज़रा  ©दीप्ति सिंह "दीया"

मुहब्बत हो ही जाती है ©दीप्ति सिंह

जो तुमसे बात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है ।  हसीं शुरुआत होती है,मुहब्बत हो जाती है । हमारी फिक़्र है तुमको, बयाँ करती हैं नज़रें भी, दुआ दिन-रात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । भिगोया है हमारी रूह को, भी इश्क़ नें तेरे,  जो अब बरसात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । हमें महसूस होती है, मुहब्बत की वही ख़ुशबू,  जो महकी रात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । तेरे होने से रौशन है,मेरी दुनियाँ मुहब्बत की, मिली सौगात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । मुहब्बत करने वालों का,कोई मज़हब नहीं होता,  जुदा ये ज़ात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । छुपा सकती नहीं 'दीया', कभी जज़्बात को अपने,  खुली हर बात होती है, मुहब्बत हो ही जाती है । ©दीप्ति सिंह 'दीया'

बजरंग वंदना ©दीप्ति सिंह

हे बजरंगी नाम तिहारा । अब जीवन को एक सहारा ।। आपन कृपा सबै पर कीजै । दुख दारिद संकट हर लीजै ।। संकट मोचन हैं महवीरा । हरते हैं सब जन की पीरा   ।। हाथ गदा भगवन के साजै । हिरदै में प्रभु राम विराजै ।। संकट भ्रात लखन के टारै । रघुवर के तुम बने सहारे ।। लै सुधि मातु सिया की आये । छन में लंका दिये जराये ।। संकट में जो नाम उचारे । विपदा से हनुमान उबारे ।। आये हम प्रभु सरन तिहारी । लीजै सुध बुध नाथ हमारी ।। स्वरचित- ©दीप्ति सिंह 'दीया'

मुकरियाँ ©दीप्ति सिंह

 बैरी हमको बहुत सताये लाख बुलाऊँ पास न आये  कर डारा है मोहे पागल  का सखि साजन? ना सखि बादल । मन करता है उसकी बातें  सारा दिन और सारी रातें  क्षण भर को भी ना बिसराती का सखि साजन? ना सखि पाती । वो आये तो मन हरसाए  घर को उजियारा कर जाए  घर आंगन की सूरत बदली  का सखि साजन? ना सखि बिजली । देखूँ उसको मन खो जाए  सारी सारी रैन जगाए  लागे मोहे कितना प्यारा  का सखि साजन? ना सखि तारा ।        ©दीप्ति सिंह 'दीया'

वो....खो गई है ©दीप्ति सिंह

विधा-नज़्म   वज़्न- 122 122 122 122 मुतक़ारिब मुस्समन सालिम  वो मासूम लड़की... कहीं खो गई है । जो थी मेरे जैसी... कहीं खो गई है । वो शामें सँवारे...  अगर मुस्कुरा दे । निगाहें उठाए... तो लम्हे सजा दे  । वो उसकी हँसी भी... कहीं खो गई है । बहुत बचपना था... बड़ी सादगी थी । वो बातों की ख़ुशबू...  बड़ी ताज़गी थी । वो ख़ुशबू महकती... कहीं खो गई है । बड़ी चुलबुली थी... वो लड़की सयानी । वो नादान थोड़ी... ज़रा थी दीवानी । वो आवारगी भी... कहीं खो गई है । वो रहती है गुमसुम  हैं ख़ामोश नज़रें ... लगाए हैं उसने  लबों पे भी पहरे । कहानी है जिसकी ... कहीं खो गई है । वो धड़कन थी दिल की...  ये दिल आशना था । मेरा काम तो बस... उसे चाहना था । वो उल्फ़त सुनहरी... कहीं खो गई है । वो मदहोशियाों में.. जुनूँ बन गई थी । वो बेचैनियों में... सुकूँ दे रही थी । वो लोरी वो थपकी... कहीं खो गई है । हमें आजकल वो... बहुत याद आए । वो आकर ज़हन में... भी हमको सताए ।  जो है तिश़्नगी सी... कहीं खो गई है । मेरी इल्तिजा है... कोई ढूँढ लाए । कभी रूबरू हो...  जो ख़्वाबों में आ...

अक्सर भूल जाते हैं ©दीप्ति सिंह

 वज़्न- 1222 1222 1222 1222 अजी हम भी सुख़नवर हैं... ये अक्सर भूल जाते हैं ।  लिखे अल्फ़ाज़ दिल पर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । हमीं नें क़ैद रक्खा है...ज़हन में याद को अपनी, अजी यादें भी नश़्तर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । ख़ताएँ याद कर अपनी...ये दिल नाशाद रहता है,  मगर हालात बेहतर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । भले ही उम्र ढल जाए...मगर बचपन नहीं जाता, हज़ारों ख़्वाब भीतर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । हमें इंसान ही रहने... दिया जाए तो बेहतर हो, जो ख़ुश देवी बनाकर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । हज़ारों ख़्वाहिशें औरत... दफ़न करती है सीने में, के उसके हक़ बराबर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । मुहब्बत है अगर दिल में ...तो इज़्जत हो निगाहों में,  जो ख़ुश रिश्ते निभाकर हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । हमारे चैन की ख़ातिर... सुक़ूँ मिलता नहीं जिनको, खड़े सरहद पे डटकर हैं... ये अक्सर भूल जाते हैं । मुनासिब तो नहीं होता...किसी को दर्द दे देना, छुपे लफ़्ज़ों में ख़ंज़र हैं...ये अक्सर भूल जाते हैं । लगाते हैं बड़े ही शौक़...से इल्ज़ाम ग़ैरों पर, नज़र उनकी भी हमपर हैं...ये अक्सर भू...

इश्क़ ©दीप्ति सिंह

 वज़्न-2122 2122 212 इस क़दर मत आज़माया कीजिए  इश्क़ शिद्दत से निभाया कीजिए   उम्रभर ये रूह भी महका करे  इस तरह पहलू में आया कीजिए  आपके जाने से जाँ भी जा रही  इस तरह उठ के न जाया कीजिए  हम सुकूँ से आपको देखा करें  वक़्त इतना साथ लाया कीजिए  आज 'दीया' हो गई है कीमती  बस यूँ ही दिल में बसाया कीजिए   ©दीप्ति सिंह "दीया"

मेरा साया ©दीप्ति सिंह

 वज़्न -  2122  1212   22 वक़्त ये ऐसा आज है आया । मुझसे है दूर मेरा ही साया । तुमको सीने से लगाकर रो लें... दिल में हर-बार ये ख़याल आया । हम नहीं ज़ार- ज़ार रो सकते... इसलिए ख़ुद को हमनें समझाया । तेरी ख़ुशियों की बस तमन्ना है... दिल यही सोच कर है मुस्काया । तुम धड़कती हो मेरे सीने में... जिंदगी का हो तुम ही सरमाया ।  ©दीप्ति सिंह 'दीया'