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इश्क़ ©प्रशान्त

मुझसे मेरी जान इतनी दूर तुम होना नहीं। गैर के शाने पे रखकर सर कभी रोना नहीं। एक ख़्वाहिश की ख़ुदा से जो मुकम्मल हो गई, पा चुका हूँ साथ तेरा और अब खोना नहीं । खूब फलती-फूलती है इश्क़ में दिल की ज़मीं, ये गुज़ारिश है गलतफ़हमी वहाँ बोना नहीं । दाग दामन पे लगाना इस जहाँ का तौर है, पाक़ है परहन मुहब्बत का, इसे धोना नहीं । उस ज़हां के वास्ते भी कुछ खरीदारी करो, रूह लेकर जाएगी... कपड़ा नहीं, सोना नहीं । बात इतनी सी बताने के लिए है ये 'ग़जल' इश्क़ को बाहों में भरना, इश्क़ को ढोना नहीं। ©प्रशान्त ‘ग़ज़ल’

ग़ज़ल ©प्रशान्त

वज़्न- १२२२ १२२२ १२२२ कहीं जाती नहीं राह-ए-तलब मेरी । यही बस एक आदत है अजब मेरी । तुम्हारे इश्क़ में हूँ बा-अदब तुमसे, वगरना शख़्सियत है बे-अदब मेरी । ये मुर्दा पूछता था, जब वो ज़िंदा था, बुझेगी प्यास कैसे और कब मेरी ? करो! नफ़रत करो मुझसे, मगर सुन लो, मुहब्बत और नफ़रत है ग़ज़ब मेरी । हर-इक इंसान की गफ़लत यही तो है , ये दुनिया कल किसी की थी, है अब मेरी । ‘ग़ज़ल’ इस ज़िंदगानी का सबब क्या है ? चली ये जाएगी क्या बे-सबब मेरी ? © प्रशांत ‘ग़ज़ल’

ग़ज़ल ©प्रशान्त

 वो कहते हैं कुछ भी नया ही नहीं है । उन्हें इश्क़ अब तक हुआ ही नहीं है । लबों ने छुपाई, नज़र ने बताई , सुना दिल ने वो, जो कहा ही नहीं है । अगर मर्ज़ होता, तो ईलाज़ करता, मुहब्बत की कोई दवा ही नहीं है । तुम्हें लग रहा हूँ मैं मिश्री सा मीठा, मुझे तुमने अब तक सुना ही नहीं है । है शाहों सा रुतबा , मेरे बाद मेरा , विरासत मिली बादशाही नहीं है । क़लम अब नए हाथ में है मगर अब, क़लम में पुरानी सियाही नहीं है । समझदार सरकार चुनकर दिखाओ, ‘बला पाँच-साला’ , तिमाही नहीं है । वतन का सिपाही ग़ज़ल लिख रहा है, ‘ग़ज़ल’ बस ग़ज़ल का सिपाही नहीं है । ~ ©प्रशान्त ‘ग़ज़ल’

ग़ज़ल ©प्रशांत 'ग़ज़ल'

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी    अगर ज़ज्बात ज़ाहिर हो तो शाइर हो । अगर कहने में माहिर हो तो शाइर हो । मुहब्बत क्या, सियासत क्या, हुकूमत क्या ? हक़ीक़त के मुसाफिर हो तो शाइर हो। जहाँ-भर की ख़बर रखकर अगर फिर भी, जहाँ‌ से ग़ैरहाज़िर हो तो शाइर हो। बड़ा शातिर‌ ज़माना है‌ , मिटा देगा, अगर तुम और शातिर हो तो शाइर हो। किसी के दर्द की हद तक कभी पहुंचो, महज़ हर्फ़ों के साहिर हो तो शाइर हो ? 'ग़ज़ल' तुम कह नहीं पाए, नहीं कुछ गम, अगर औलाद शाइर हो, तो शाइर हो।  ©प्रशांत शर्मा 'ग़ज़ल'

ग़ज़ल ©प्रशांत 'ग़ज़ल'

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी   दिल पे पत्थर रख लिया , हालात बेहतर कर दिए , आस्तीनें खोल दीं, कुछ सांप बे-घर कर दिए ।  इश्क़ ढाई अक्षरों का साल ढाई तक पढ़ा, बेवफ़ा ने अश्क़ के फिर ढाई अक्षर कर दिए।  क्या जरूरी है बनाता ताज जैसा इक महल, फर्श, छत, दीवार, दर सब संगेमरमर कर दिए।  कर रहा था हाथ पीले बेटियों के जब जहाँ, बेटियों ने थाम परचम ख़ुद मुक़द्दर कर दिए।  दिल के हर ज़ज्बात को रक्खा छिपाकर आजतक,  पर 'ग़ज़ल' तेरी कलम ने सब उज़ागर कर दिए।  ©प्रशांत 'ग़ज़ल'

ग़ज़ल - चाहत ©प्रशान्त

ख़ुदा से दूर जाना चाहता हूँ । ख़ुदाई आज़माना चाहता हूँ । नई दुनिया बसाना चाहता हूँ । मगर इंसाँ पुराना चाहता हूँ  । चरागों को जलाकर एक दिन मैं, हवाओं में उड़ाना चाहता हूँ । खिलौनों की तरह दिल तोड़ते हो,  ये लो, मैं दिल लगाना चाहता हूँ । सितारों को हटाकर आसमाँ से, वहाँ जुगनूँ बिछाना चाहता हूँ । फ़लक के चाँद-तारों को बुलाकर, उन्हें सूरज दिखाना चाहता हूँ । मुझे अच्छी ग़ज़ल कहनी न आई, ‘ग़ज़ल’ अपनी सुनाना चाहता हूँ । ~ ©प्रशान्त ‘ग़ज़ल’

इश्क़ ©प्रशान्त

मैं अक़्सर सोचता हूँ,  इश्क़ क्या है ? ख़ुदा है , बंदग़ी है, या ख़ता है ll तकल्लुफ़ से मुख़ातिब जो नहीं है, ज़माने से अलग दुनिया कहीं है l गुमाँ है इश्क़ या कोई हक़ीक़त, अधूरी या मुकम्मल है मुहब्बत l कोई माँ-बाप को दिल में बसाए, कोई औलाद पे जाँ तक लुटाए l बहन का हाथ थामे ज़िंदगी भर, कलाई से बँधी राखी कहीं पर l सुख़न ने रूह को जैसे छुआ है, मैं अक़्सर सोचता हूँ,  इश्क़ क्या है ? गया बचपन जवानी पास आई, फ़िजाओं की रवानी पास आई l नज़ारे देखते जब आह निकली ? उमड़ते बादलों के बीच बिजली l मुसलसल करवटों में शब गुज़ारे, सुहाने ख़्वाब, जिनमें चांद-तारे l सनम का दिल लुभाती आज़माइश , मुहब्बत के लिए होती नुमाइश l निग़ाहें मिल रहीं , दिल खो गया है l मैं अक़्सर सोचता हूँ,  इश्क़ क्या है ? अभी तक इश्क़ अच्छा लग रहा था, सुहाना और सच्चा लग रहा था l मगर अब दर्द क्यूँ होने लगा है ? मुहब्बत में मज़ा खोने लगा है l जुदाई अब सहन होती नहीं है, रहाइश एक पल की भी नहीं है l दुआओं में सनम की ख़्वाहिशें हैं , मगर मजबूरियों की आतिशें हैं ll ख़याल-ए-हमसफ़र मुश्किल हुआ है , मैं अक़्सर सोचता हूँ,  इश्क...

ग़ज़ल ©प्रशांत

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 2122 1212 22 वक़्त लेते नहीं गिराने में, बे-रहम लोग हैं ज़माने में। आप रिश्ता नया बनाते हैं, क्या नफ़ा अब नहीं पुराने में? जान झोंकी कभी कहाँ किसने, एक रिश्ता यहाँ निभाने में ? ज़िन्दगी सिर्फ़ चार दिन‌ की थी, उम्र गुज़री ये जान पाने में। आशियाँ फ़िर किसी परिंदे का, छिन गया है मकाँ बनाने में। हाथ था हर दफ़ा सियासत का, आपसी फ़ासले बढ़ाने में। ज़िन्दगी रोज ख़र्च करते हैं, हम महज़ ज़िन्दगी कमाने में। शेर मारो 'ग़ज़ल' मगर सुन लो, तीर जाकर लगे निशाने में। ©प्रशांत "ग़ज़ल"

स्वतंत्रता महोत्सव ©प्रशांत

 हरा, सफेद, लाल रंग ले अशोक चक्र संग, राष्ट्र की ध्वजा त्रि-रंग डोलती । हिलोर ले रही तरंग , अंग-अंग अंतरंग, देशप्रेम की उमंग   घोलती । भविष्य, भूत, वर्तमान, लोकतंत्र, संविधान, हिंद आन बान शान चूम के । सुनें वसुंधरा, वितान,  बाल, वृद्ध, नौजवान गा रहे स्व-राष्ट्रगान झूम के । सदैव जो रही अजीत,  ईश की धरा पुनीत, प्रेम-रीत विश्व को सिखा रही । कुबुद्ध युद्ध हार, जीत से अभीत हो विनीत गीत प्रीत के महान गा रही । स्वतंत्र देश के विशेष पर्व का हुआ प्रवेश, देशभक्ति का निवेश कीजिए । 'प्रशांत' हो रहे प्रदेश, लेश-मात्र हो न द्वेष, यों नवीन श्रीगणेश कीजिए। ~©प्रशांत

भारतवर्ष ©प्रशांत

 जय हो भारतवर्ष की ,  कहिए मिलकर आज l 'जन-गण-मन' गायन करे, जन-जन की आवाज l जन-जन की आवाज में, गूॅंज उठे कर्तव्य l निज भारत फिर से बने, श्रेष्ठ, सनातन, सभ्य l श्रेष्ठ सनातन सभ्यता, परम श्रेष्ठ इतिहास l सर्वश्रेष्ठ है विश्व में, भारत का विन्यास l भारत का विन्यास है , ज्यों मानव का वेश l हिम-पर्वत निर्मित मुकुट , हिम-तरंग हैं केश l हिम तरंग हैं केश सम, चरणों में जल-धाम l वाम-हस्त घनघोर घन , दक्षिण-कर घनश्याम l दक्षिण-कर घनश्याम जी, उत्तर राम नरेश l घट-घट वासी है यहाॅं , ब्रह्मा , विष्णु, महेश l ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने ,  लिया जहाॅं अवतार l वहाॅं जन्म पाकर हुआ , निज जीवन साकार l निज जीवन साकार कर , किया देशहित कर्म l पूज्यनीय वे आज भी ,  जान गए जो मर्म l जान गए जो मर्म वे, देते हैं संदेश l वसुंधरा परिवार है , त्यागो सारे क्लेश l त्यागो सारे क्लेश अब, जाति, पंथ, दुष्कर्म l भारत उनका देश है , भारत जिनका धर्म l भारत जिनका धर्म हो, उनसे क्या संघर्ष ? भारतवासी बोलिए, जय हो भारतवर्ष l ~ ©प्रशांत

हिंदी प्रसारण ©प्रशान्त

 पठन-पाठन, सृजन, लेखन , श्रवण, गायन किया जाए l यथासंभव समय 'हिंदी', प्रसारण को दिया जाए l सनातन गीत-गायन हो , नवल कविता विधायन हो l पुरातन मातृभाषा का , निरन्तर सोम-पायन हो l विविध छंदों, अलंकारों , विधानों के जलाशय में  ,  भिगोकर भावनाओं के रसायन को पिया जाए l कहानी, जीवनी , नाटक,  कथाओं, संस्मरणों में l उपन्यासों , समीक्षाओं , निबंधों, उद्धहरणों में l महाग्रंथों व पत्रों में, समाहित मातृभाषा के ,  विवेचन, शिल्प-निर्धारण , सुलेखन को जिया जाए l जहाँ सम्मान भाषा का , वहीं वासी विधाता है l नमन उस मंच को जिस पर , व्यवस्थित लेख आता है l समय की भांति अक्षुण्ण हो , सदा अस्तित्व हिंदी का ,  शपथ परिपूर्ण आयोजन सुनिश्चित कर लिया जाए l पठन-पाठन, सृजन, लेखन , श्रवण, गायन किया जाए l यथासंभव समय 'हिंदी', प्रसारण को दिया जाए l ©प्रशांत

कर्म ©प्रशान्त

 ढह जाता है जब रेणु-भवन , आधार बचा रह जाता है l नित दिनकर तम हरने आए , रजनीचर शीतल कर जाए l नव पल्लव, पुष्प सुगंध भरे , खग कलरव नित उर हरषाए l निष्प्राण-पवन परिमार्जित हो, नित श्वाँस सुधारस बन जाती,  भोजन नित शान्त बुभुक्षा कर , नव ऊर्जा अन्तर भर जाए l है शाश्वत चक्र समय का ज्यों, त्यों सत्य, अटल है नश्वरता,  मिल जाता है माटी में तन , संसार बचा रह जाता है l ढह जाता है जब रेणु-भवन , आधार बचा रह जाता है l उल्लेख नहीं होता जिसका, वह लेख नियति नित लिख लेती l मानव संचय करता रहता , यह व्यय का कारण दे देती l धन-धान्य तथा यश-अपयश सब, विधि के कर की कठपुतली हैं,  भव सागर पार तभी होता जब कर्म-तरणि नर को खेती l कर्मठता फल तब ही देगी , जब मानव धर्म निभाएगा ,  जीवन-पय मंथन से उपजा दधिसार बचा रह जाता है l ढह जाता है जब रेणु-भवन , आधार बचा रह जाता है l यह मानव देह अलौकिक है, मिट जाना ध्येय नहीं इस का l परिवार गठन, एकाकीपन, ऐसा मर्दित तन-मन किसका ?  चिरकाल वही जीवित रहता, जिसने सत्कार कमाए हों,  परहित हित जो निस्वार्थ जिए , सम्मान करे नर-कुल जिसका l व्यवहार सदा तय करते...

शहादत और आजादी ©प्रशान्त

पहुँच कर मंजिलों पर क्यूँ सफ़र हम भूल जाते हैं ?  सदाएँ  वक़्त  देता  है , अगर  हम  भूल  जाते  हैं  l नहीं!  हम शाम  नब्बे  साल  पहले की  नहीं  भूले l भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव फाँसी चूम जब झूले l शहादत  मार्च  तेइस  को  हुई  थी, याद  है  हमको,  शहादत का सबब क्या था , मगर हम भूल जाते हैं l पहुँच कर मंजिलों पर क्यूँ  सफ़र हम भूल जाते हैं ? पले थे सैकड़ों तूफान , जिनकी  नब्ज़ में  आकर l मशालों ने पकड़ ली आग, जिनसे  रौशनी पाकर l जगी आवाम तब जाकर, हुआ आजाद  हिंदुस्ताँ,  खुली कैसे मगर उसकी नज़र , हम भूल जाते हैं ?  पहुँच कर मंजिलों पर क्यूँ सफ़र हम भूल जाते हैं ?    लहू सत्रह-अठारह साल में जिनका बहा होगा l न  जाने  इंकलाबी  हौसला  कैसा  रहा  होगा ?  वतन के आशिकों की हर कहानी याद है हमको,  वतन पर जाँ लुटाने का हुनर हम भूल जाते हैं l पहुँच कर मंजिलों पर क्यूँ  सफ़र हम भूल जाते हैं ? फिरंगी उस...

ग़ज़ल ©प्रशान्त

 2122 1212 22 बात इतनी समझ न आई है l दर्द है इश्क़ या दवाई है l आंख से नींद गुमशुदा सी है,  आंख जबसे कहीं लड़ाई है l रात भर करवटें हमारी हैं,  और सिलवट भरी रज़ाई है l ज़िक़्र जब भी हुआ गुलाबों का,  याद उसके लबों की आई है l जिस्म बेजान था ज़माने से जान आई तो जान आई है l दूर रहना शरीफ़ लोगों से,  ये नज़र देखती बुराई है l राह की ठोकरें तज़ुर्बा थीं,  ज़िंदगी अब समझ‌ में आई है l आज ज़ज़्बात लिख रहा हूं मैं,  बात सारी सुनी-सुनाई है l मौत क्या है 'ग़ज़ल' हक़ीक़त में,  जीस्त की क़ैद से रिहाई है l © प्रशान्त

ग़ज़ल ©प्रशान्त

 क्या ख़्वाब ख़त्म होंगे 'ख़्वाब-ए-अदम' के बाद ? फिर इश्क़ में मिलूंगा मैं इस जनम के बाद l पहली नज़र से बिस्मिल दोनों हुए थे लेकिन,  हम भी सुकून से हैं, दिल भी ज़ख़म के बाद l जब इश्क़ कर रहा था तब क्यूँ खिलाफ़ थे वो ?  जो इश्क़ पढ़ रहे हैं, कागज़-कलम के बाद l इतने शरीफ़ तो हम पैदाइशी नहीं थे,  सब ऐब गुम हुए हैं उनकी क़सम के बाद ll हमको ज़ुदा करेगा अब ये जहान कैसे ?  हम-रूह बन चुके हैं हम, हम-क़दम के बाद l मेरा ज़ुदा तलफ़्फुज़, है शख्सियत उन्हीं की ,  मुझको 'ग़ज़ल' लिखा है, मैंने सनम के बाद l ©प्रशान्त

भ्रमर दोहे ©प्रशान्त

 मगण तगण गुरु मगण तगण SSS SSI S SSS SSI पाला-पोसा प्राण दे, माता ने संसार l हे देवी माँ! आपकी, पूजा बारम्बार l छाया देते वृक्ष-सी , झेलें झंझावात l ऐसी मेधा धन्य है, जै जै जै श्री तात l भाई जैसी मित्रता, दीदी जैसा प्यार l दूजा होता ही नहीं,  ढूँढे लाखों द्वार l नारी में नारायणी , नारी ही उत्थान l भार्या के सम्मान से, भर्ता आयुष्मान l संतानों के रूप में , आता है उल्लास l आरोगी संतान से , आनंदी आवास l सत्याग्राही विश्व को, देते जो सद्-ज्ञान l रिश्तों से ऊँचे गुरू, शिष्यों के सम्मान l © प्रशांत

किताब ©प्रशान्त

 बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 1212 1122 1212 22   कहीं पे ख़ार , कहीं पे गुलाब होता है l यहाँ नसीब के ज़रिए हिसाब होता है l सफ़र में दूर करे जो सियाह अंधेरा ,  चराग़-ए-इल्म वही आफ़ताब होता है l अमीर हो तो सुनो ऐब सैकड़ों पालो ,  ग़रीब हो तो हुनर भी ख़राब होता है l मुझे सवाल परेशान कर नहीं सकते ,  अजी! ज़वाब मेरा लाज़वाब होता है l मशाल कौन जलाए, किसे थमाए अब ?  लहूलुहान बड़ा इंकलाब होता है l शराब प्यास बुझा दे , कबाब बिस्मिल्ला,  तलाश कौन करे क्या सराब होता है?  जह-ए-नसीब अगर ये समझ सके दुनिया,  'ग़ज़ल' का शेर मुकम्मल किताब होता है l ©प्रशान्त

गीत- प्रतीक्षा ©प्रशान्त

 कष्टकारी , क्षोभदायी ,  दीर्घकालिक वेदना l रुग्ण तन, भयग्रस्त मानस, रक्तरंजित चेतना ll शब्द तज नि:शब्द होती , लेखनी संतप्त है l आर्तनादों में प्रकट यह यातना अभिशप्त है ll काल-कवलित लुप्त वंशज, शोकमय परिवारजन , जग सकल निर्वात-सम है, मौन वाणी सुप्त है ll ईश! रक्षा प्रियजनों की , मन समर्पित प्रार्थना l रुग्ण तन, भयग्रस्त मानस, रक्तरंजित चेतना ll सूक्ष्म विषधर जीव जिनसे , है जगत संताप में l काल हाहाकार करता ,  रोष एकालाप में ll प्राकृतिक अज्ञात कारण, क्यूँ मिली संसार को , सृष्टि की विध्वंशकारी आपदा अभिशाप में ll चीत्कारों के श्रवण में , क्या करें आराधना ? रुग्ण तन, भयग्रस्त मानस, रक्तरंजित चेतना ll यह परीक्षा का समय है , ईश‌ पर विश्वास हो l उग्र परिवर्तन समय का , शांति से गृहवास हो ll त्याग सामंजस्य मानव ,भीष्म-प्रण का यह समय, क्या असम्भव है प्रतीक्षा , मृत्यु यदि आभास हो ? जान‌ लो कुछ ही समय अब शेष है यह यातना l  रुग्ण तन, भयग्रस्त मानस, रक्तरंजित चेतना ll ~ © प्रशांत

ग़ज़ल ©प्रशान्त

 आज सुबहा भूल जाओ , जो सुनी कल रात को l और हाँ! देखो नफा हो तो पकड़ लो बात को ll जिंदगी है या बना लो चार दिन की चाँदनी.... या सजा लो चार-चाँदों से हरिक लम्हात को ll झूठ सच क्या था न जानूं, पर कहानी खूब थी....  जिन्न आदम ढूँढते थे , आदमी जिन्नात को ll आँख पे पट्टी बँधी , काले लिबासों में जिरह....  जुल्म है! ऐसी अदालत सुन रही ज़ुल्मात को ll अब वतन में बम-धमाके बारहा होते नहीं.....  इस तरह भी देख लेना आज के हालात को ll कल शहादत हो गई तो काम ये करना 'ग़ज़ल'...  इक तिरंगा भेज देना कानपुर देहात को ll © प्रशान्त

प्रार्थना : माँ शारदे ©प्रशान्त

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 आधार छन्द - गंगोदक विधान - रगण X ८  शारदे माँ कृपा चाहिये आपकी, लेखनी कर्म-निष्ठा निभाती रहे l श्रेष्ठ शब्दावली,भाव रत्नावली , शिल्प संसर्ग छन्दादि लाती रहे ll    ज्ञान समृद्धशाली रहे सर्वदा, सत्य-मिथ्या विभेदी बने नित्यदा l कामना की करें पूर्ति माँ शारदा, लेखनी शोधकर्ता बनाती रहे ll पारदर्शी महा-सूक्ष्मदर्शी बने, भावना की सदा संस्पर्शी बने  l सज्जनों की करे वन्दना लेखनी, चेतना दुर्जनों में जगाती रहे ll सैनिकों नौजवानों किसानों तथा देशवासी जनों की बने भावना l मुक्त आकाश में शब्द-तारे भरे , लेखनी मातृ-भू को सुहाती रहे ll धर्मवादी रचे, सत्यवादी रचे , राष्ट्रवादी व आदर्शवादी रचे l  काव्य हिन्दी महाक्रान्तिवादी रचे , राष्ट्रभाषा ससम्मान गाती रहे ll काव्य के रूप में मित्र ऐसा मिला , वेदना, हर्ष दोनों सुसंतृप्त हैं l पूर्ण तल्लीन हो लेखनी यूँ चले , शारदे-हस्त आशीष पाती रहे ll       © प्रशान्त       Click Here For Watch In YouTube