ग़ज़ल ©प्रशान्त

वज़्न- १२२२ १२२२ १२२२


कहीं जाती नहीं राह-ए-तलब मेरी ।

यही बस एक आदत है अजब मेरी ।


तुम्हारे इश्क़ में हूँ बा-अदब तुमसे,

वगरना शख़्सियत है बे-अदब मेरी ।


ये मुर्दा पूछता था, जब वो ज़िंदा था,

बुझेगी प्यास कैसे और कब मेरी ?


करो! नफ़रत करो मुझसे, मगर सुन लो,

मुहब्बत और नफ़रत है ग़ज़ब मेरी ।


हर-इक इंसान की गफ़लत यही तो है ,

ये दुनिया कल किसी की थी, है अब मेरी ।


‘ग़ज़ल’ इस ज़िंदगानी का सबब क्या है ?

चली ये जाएगी क्या बे-सबब मेरी ?


© प्रशांत ‘ग़ज़ल’


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