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गीत ©नवल किशोर सिंह

 भास तुल्य सपने दिखला कर। करते गोपन नहीं उजागर। पका-पका कर तर्क-तरावट। तथ्यों में कर दिए मिलावट। कहते झींगुर बोल रहा है, झुनकी जब वासव की पावट। रखते उदयन को बहला कर। दाँव बना यह बहुत प्रभावी। लिए विविध ही दर्प दुरावी। त्याग नीति को राज जमाते, मानस पर हो जाते हावी। बातों की कुंडली जमाकर। चख अंगूरों की लस्सी को। साँप बना देते रस्सी को। दया भाव दिखलाते निशिदिन, अभयदान देकर खस्सी को। तंदूरों में रान पकाकर। -©नवल किशोर सिंह

सपनों की यह खंड-कहानी। ©नवल किशोर सिंह

 मंजरियाँ मनमोहक वन में, एक तिलंगी लहराती। कोकिल कंठ विराजे जैसे, श्याम अधर वंशी गाती। मन उपवन में पुलक प्रीति पल, नाच रही चंचल डाली। भृंग झूमते मोद मनाते, कुसुमों की हर्षित आली। किसलय कोमल स्निग्ध सरोवर, संचित अमिरस अम्लानी। कुसुम कलश से छलके शीतल, तृषा-हरक निर्मल पानी। बैठ बटोही निर्जन तटपर, गढ़ता नूतन परिभाषा। संधित करता वह सरिता उर, होती पूरन अभिलाषा।    साल रहे थे शूल नुकीले, या कलकल तरल तरंगें। पा न सका पर्याय पंथ का, झोली में दमित उमंगें।   उद्गम के आगे स्वयं साधते, कहते सारे विज्ञानी । पाँव शिथिल अनुराग तिरोहित, भीत क्रीत या अभिमानी।    चंद चरण चंचल चलकर वह, जाने किस मग में खोता। हवन-कुंड में अनल धधकता, पास नहीं पर वह होता॥ तिल-यव का आहुति सौरभ, सुरभित जग को कर जाता।  एक छलावा धूम मचलकर, लोप अनिल में तर जाता॥ संदेशा रग भावन भरता, अधरों का कर अगवानी।  साँस विलय मकरंद मलय में, ललिता कलिता अवधानी। पलकों पर है भार लाज का, या छलना है अपनों का। चिंतन में मुकुलित नयनों से, पथ निहारती सपनों का। नील निलय निस्पंद खड़ा है, टिमटिम करते क्यों तारे? ...

गीत बुधनी ©नवल किशोर सिंह

 जलती-भुनती बुधनी मन में, और तवे पर रोटी। आँगन में मुनिया चिल्लाती, मैया कर दो चोटी। ढली रात तो आया कलुआ, बोतल चार चढ़ाकर। माँग रहा वह दाल-बघाड़ा, थाली को टरकाकर। मान-मनौवल के चक्कर में, बनती बुधनी बोटी। ऐसे ही वह रात गुजारी, और उठी भिनसारे। गौशाले में गाय रँभाती, अम्मा उसे पुकारे। फूट फफोले निकले दिल के, जैसे हो पनगोटी। भावों के नवनीत बिना ही, निशिदिन दही बिलोना। छलछल मट्ठा बटलोही में, नीचे पड़ा सिरोना। नयनों के दो खाली दोने, बूँदें मोटी-मोटी। -©नवल किशोर सिंह

दोहा: माता ©नवल किशोर सिंह

1. चला चाक निर्माण का, माता बनी कुम्हार। माटी कच्ची पाथकर, देती है आकार। ** 2. यह तन बर्तन के सरिस, माता एक कुम्हार। अंतस आँवे में पका, गढ़न करे साकार। * 3. माता ममता मंगला, ईश्वर के अनुरूप। पंचतत्व के योग से, गढ़ती रूप अनूप। * 4. माता निश्छल लेखिका, सृजन सार उरुगाय। अक्षर अर्पण नेह से, रचती नव अध्याय। * 5. माता मेरी साँस में, हाड़-माँस में पैठ। दूर कभी होती नहीं, रही रुधिर में बैठ। -©नवल किशोर सिंह

किरदार ©नवल किशोर सिंह

 हार जो पाया नहीं तलवार से। जीत उसको ले गए तब प्यार से। प्रेम-पल्लव हीन मुंडित पेड़ पर, पुष्प भी विकसित हुआ मनुहार से। देखकर वीभत्स आँगन युद्ध का, बुद्ध विचलित हो उठे संसार से। वेग जब देती तरंगित ऊर्मियाँ, पार पाती नाव भी मँझधार से। लूट का चरखा भला क्यों टूटता, पूछते वंचक वजह सरकार से। प्रात की किरणें ठहरती शाम को, मोल लेकिन पूछतीं अखबार से। झट मुखौटे को बदलना भी कठिन, तंग है खुद आदमी किरदार से। -©नवल किशोर सिंह

गीत ©नवल किशोर सिंह

 मेरे हिस्से हे सखी, मास मधुर कब आया?   कोयल कूके बाग में, आँगन बौर नवेली। बालम बतरस के बिना, सूनी पड़ी हवेली। दीदा फाड़े कोठरी, नजर गड़ाये कोना। खाट-पाट उच्चाट-सी, बेकल मन से सोना।   दूर सरक तकिया निठुर, बहुत मुझे तरसाया।   गुमसुम बैठी देहरी, ताखे ढिबरी पीली। अंगीठी की आँच में, सुलगे लकड़ी गीली। एक भगोना भाव का, और उबलता पानी। फदके चावल प्रीति का, बहे झाग बेमानी।   धू-धू जलती आग से, अदहन को खौलाया।   पोंछा पोतन मार के, चौके को चमकाते। राखों का अंबार है, देख कहाँ पर पाते। राख बनी लकड़ी बुझी, या चूल्हे की ज्वाला।  ऊहापोह की जिंदगी, मकड़ी बुनती जाला।   उन जालों के बीच में, मन मेरा अकुलाया।   रूप राशि निष्काम है, पीर हृदय की सोचे। बैठ अकेली जोगनी, काली अलकें नोचे। अलकों के जंजाल से, दूर भँवर वनवासी। कली-कामिनी ताकती, वन में बन उपहासी।   किस कमली की क्रोड में, भँवरा है बिलमाया। मेरे हिस्से हे सखी, मास मधुर कब आया?   -©नवल किशोर सिंह

मतदान ©नवल किशोर सिंह

 अपनी ताकत को पहचान। ताकत तेरी है मतदान। सत्यनिष्ठ की शपथ उठाना। सोच-समझ कर मुहर लगाना। मत अपना देने से पहले, राष्ट्र-धर्म का रखना ध्यान। आए कोई पास शिकारी। रत्न-रजत से भरे पिटारी। चमक-दमक में भूल न जाना, चेतन का करना सम्मान। स्वार्थ बोध को ज़रा घटाकर। जाति-धर्म को दूर हटाकर। सुखद आज कल भी पुलकित हो, उँगली में धर वही निशान। -©नवल किशोर सिंह

कागज वाली नाव ©नवल किशोर सिंह

कागज वाली नाव चली है, ढोल बोल की लिए पिटारी। सहमी सरिता पानी कम हैं। पतवारों की आँखें नम हैं। करवाने में भान भगीरथ, भाट हुए जाते बेदम हैं। माँझी जाल लिए हाथों में, ढूँढ़ रहा है मीन-सवारी। चमक-दमक है लिए किनारा। मृग-तृष्णा बन बहती धारा। घाट कहाँ बस भँवर दूर तक, नाव यही बस एक सहारा। शुल्क नहीं सुविधा का कोई, महज वोट की है घटवारी। नाव मचल जब चली धार में। जाकर फँसती बीच ज्वार में। प्रत्यावर्तन गुण भाटों का, खेना दुर्वह सिंधु-सार में। परनाले का दिए भरोसा, रेतों से तब करते यारी। देख उधर रेतों के टीले। अपने ही हैं कुटुमकबीले। निकल नहीं वे रहे वहाँ से, दलदल होते बड़े रसीले। स्रोत कहाँ सागर में मीठा? खारे जल का वह अधिकारी। खेतों में भी रेती बोना। रेतों में ही फलता सोना। जल की चिंता छोड़ सनेही, जल देगा घड़ियाली रोना। बीत चुनावी जाता सावन, कहो किधर फिर नाव उतारी? -©नवल किशोर सिंह

रेंगनी ©नवल किशोर सिंह

 मोह माहुर ले मिलन का, मुग्ध मन मनुहार संचित।  जेठ की धधकी तपन में। स्वेद-बूँदें हैं नयन में। श्रांत बैठा उर-श्रमिक है, वात वैभव चाह मन में। साँस सुरभित हो मलय से, प्राण पुलकित सार संचित। मास जब आषाढ़ आया। गोखरू में पात लाया। नेह पुष्पित कंटकों से, पाट कर पथ को सजाया। कंटकों के बीच चलना, पग महावर खार संचित। गात पुलकित हास लेकर। प्रीति पावन आस लेकर। खुल रहे द्वय बाँह मेरे, बैंगनी अकरास लेकर। एक लतिका बन सिमटती, सावनी अँकवार संचित। लाजवंती-सी छुअन में। ओढ़नी सहमी बदन में। रेंगनी-सा रोम मेरा, है विकर्षण इस मिलन में। वेदना सजती नयन में, भाद्रपद जलधार संचित। -©नवल किशोर सिंह

मानभंग ©नवल किशोर सिंह

चित्र
 लुंचित पड़ी भू पर लुठित, आखेट कोई कर गया । चैतन्य को दल घात से, संताप मन में भर गया । पीड़ा कहर से शीत सी, वो काँपती भयभीत सी, हैवान तेरा कर्म यह, ममता विलज्जित कर गया ॥ सिंगार है खंडित हुआ, चीत्कारती वह ज़ोर से । कल्याण को आया नहीं, कोई किसी भी ओर से । संभालती परिधान को, मर्दित हुये उस मान को, मोहन मगन निज भाव में, अंजान बन उस शोर से॥ यह काल है विकराल सा, संस्कार है लोपित हुआ । भौतिक विषय मदपान से, उजियार फिर गोपित हुआ। अंधेपना में ढूंढते,  कारण पकड़ के मूढ़ते , वो क्यों चली उस ओर थी, आरोप यह रोपित हुआ ॥  माता कहो किस भाव से, संतान को है पालती । यह वेदना कब चूकती, उनके हृदय भी सालती ॥ हम नीव ऐसी ढाल दें , साहस सुता में डाल दें, दुर्गा कहाएँ बेटियाँ, दुष्कर्मनों को बालती ॥ -©नवल किशोर सिंह Click Here For Watch In YouTube

कागज वाली नाव ©नवल किशोर सिंह

 कागज वाली नाव चली है, बोल-वचन की लिए पिटारी। सहमी सरिता पानी कम है। पतवारों की आँखें नम है। करवाने में भान भगीरथ, भाट हुआ जाता बेदम है। माँझी जाल लिए हाथों में, ढूँढ़ रहा है मीन-सवारी। चमक-दमक है लिए किनारा। मृग-तृष्णा बन बहती धारा। भीट कहाँ बस भँवर दूर तक, नाव यही बस एक सहारा। शुल्क नहीं सुविधा का कोई, महज वोट की है घटवारी। नाव मचल जब चली धार में। जाकर फँसती बीच ज्वार में। प्रत्यावर्तन गुण भाटों का, खेना दुर्वह सिंधु-सार में। परनाले का दिए भरोसा, रेतों से तब करते यारी। देख उधर रेतों के टीले। अपने ही हैं कुटुमकबीले। निकल नहीं वे रहे वहाँ से, दलदल होते बड़े रसीले। स्रोत कहाँ सागर में मीठा? खारे जल का वह अधिकारी। खेतों में भी रेती बोना। रेतों में ही फलता सोना। जल की चिंता छोड़ सनेही, जल देगा घड़ियाली रोना। बीत चुनावी जाता सावन, किसने फिर उस पार उतारी? -©नवल किशोर सिंह

जीवन तुमसे गुंजार प्रिये ©नवल किशोर सिंह

 तुम आशा का संचार प्रिये। तुमसे जीवन गुंजार प्रिये।  दूर देश के दो खग प्यारे।  उड़ते योजित पंख सहारे। भावों के बंधन में बँधकर, दो दिल अब एकाकार प्रिये।   दूर गगन का खाली कोना। प्रेम-सितारे उसमें बोना। जुगनू जगमग भर मुठ्ठी में, करती पथ को उजियार प्रिये।  वीरान हृदय था मरुथल-सा।  आना तेरा तब कलकल-सा।  सिकता में ज्यों सार बसाने, सोता कोई रस-धार प्रिये।  कुसुमित पुष्पों से बाग हरा। मधुबन मलयज अनुराग भरा।  पतझड़ के सूने आँगन में, हुलसे अब हरसिंगार प्रिये।  गीत गज़ल फिर छंद बनी तुम।  भावों का मकरंद  बनी  तुम।  छेड़ चली साँसों का सरगम, ले पायल की झंकार प्रिये।  मन खोया तेरे अलकों में।  तुम बसती चातक पलकों में।  घुल जाती हर राग-रंग में, बनके मोहक अभिसार प्रिये।  खिलती है जीवन की क्यारी।  कुसुमित कोमल किल-किलकारी।  गढ़ती फिर से नव-जीवन को, रूप रंग भी निज हार प्रिये।  -©नवल किशोर सिंह

गाँव ठिठका ©नवल किशोर सिंह

 गाँव ठिठका चौमुहाने,  ढूँढ़ता अस्तित्व अपना। वृद्ध बरगद दंड पाया, नीम अंदर जेल में है। ठूँठ पीपल हाशिये पर, नव्यता के खेल में है। कोख ठंढ़ी सभ्यता की , आँकती दायित्व अपना। ओढ़ती पगडंडियाँ हैं, डामरों की स्याह चादर। बीच खड्डों के झरोखे, झाँकती है रेत आकर। एक झाँवाँ देखता है, दर्प से व्यक्तित्व अपना। देख गोधन वीथियों में, धार बधिकों की ठठाती। दूध दुर्मिल डेयरी पर, गाय संसद में रँभाती। लेख पोस्टर कागजों का, हाँकता अहमित्व अपना। राहु ग्रसता चाँद-रोटी, पाव बर्गर अब सगा है। बालियों के रंग उतरे, भंग खेतों में लगा है। मेड़ भी तो धान वाला, बेचता स्वामित्व अपना। -©नवल किशोर सिंह

विमर्श ©नवल किशोर सिंह

#चामर छंद (15 वर्ण- र ज र ज र)  मेढ़की जुकाम से उदास हो कराहती। नीर की निवासिनी अधीर हो विलापती। मेघ रेख देख के विराग को सुजापती। नेत्र नीर धार ले तड़ाग को सरापती। लोग क्या न जानते जुकाम के प्रमाद को। लोभ से सने सभी निरर्थ के विवाद को। जीव आज मग्न मत्त सावनी फुहार में। ताप का तड़ाग चाह है कहीं जवार में। भेक का विलाप देख देख विज्ञ देश को। ग्राह राह में पड़ा लिए अबूझ वेश को। श्याम मेघ व्योम में छटा घटा सुदर्श है। सोखना न पोखरा यही भला विमर्श है।     -© नवल किशोर सिंह

गीत ©नवल किशोर सिंह

 चरते चारे बन बेचारे, साँढ़ सकल सरकारी। बीच खेत में भेड़ भटकती, सूखी घासें सारी।   वादा करके हरे भरे का, पहले तो फुसलाया। परती धरती के प्रांगण में, फिर खदेड़ पहुँचाया। रेह गेह में धूप धमक से, करती काया छटपट, बैठ मेड़ पर चतुर गड़रिया, करता पहरेदारी।   सूख गईं बूँदें रेतों में, नयनों से जल प्लावन। डूब गया मन-मरुथल लेकिन, सिकता में है सावन। ठूँठ ठठेरा मुँह बिचकाता, खड़ा बिजूका जैसे, घिसे अँगूठे से खेतों को, लील गया पटवारी ।   साहस संबल खूब जुटाकर, निकला बाहर भेड़ा। मिमियाकर निज कथा सुनाया, समझे सभी बखेड़ा। पत्ते हरे शिकारी लेकर, बहलाता भेड़ों को, समय देखकर कुर्बानी का, काट गया पद-धारी। -© नवल किशोर सिंह

मणिमय भारत ©नवल किशोर सिंह

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं  भूमंडल में सबसे न्यारा । मणिमय भारत देश हमारा ।। आर्षजनों की धरा सुहावन। सत्य सनातन प्रज्ञा पावन ॥ सकल भुवन में गूँज अपरिमित, अनुनाद अलौकिक ओंकारा । मणिमय भारत देश हमारा ॥ दीप्ति दिव्य मेधा में जागे । बनके तुरग तिमिर तम भागे ॥ अरुण किरण फूटे पूरब में, फैले अग-जग में उजियारा ।   मणिमय भारत देश हमारा ॥ विद्रुम वैभव कनक कलश से । पुलक पात नित सिद्धि हुलस से ॥ स्वयं रमा रमकर करती है, नित वैभव को जहाँ निहारा। मणिमय भारत देश हमारा ॥ हिमगिरि उन्नत सिर नभतल में। सागर सविनय है पगतल में। अभिसिंचित करती है हरदम कलकल सुरसरि अमरित-धारा। मणिमय भारत देश हमारा ॥ -© नवल किशोर सिंह

भाग मुनव्वर ©नवल किशोर सिंह

 नीरस है यह बाग मुनव्वर। चलो कहीं अब भाग मुनव्वर।1 घास फूस पर डाल किरासन, सुलगा दे तब आग मुनव्वर।2 लाल रंग है कुर्बानी का, कहकर खेलो फाग मुनव्वर।3 जन्नत के जिंदा पीरों का, कैसा है यह राग मुनव्वर।4 शायद बोटी पर हैं ताले, बोतल भी बिन झाग मुनव्वर।5 पट्टी डाले सोयी आँखें, धुंध हटाकर जाग मुनव्वर।6 जीनेवाले बन हिंदुस्तानी, रहते नित बेलाग मुनव्वर।7     -©नवल किशोर सिंह

बँधी कलम ©नवल किशोर सिंह

 कलम बँधी है जंजीरों में, कैसे फिर उद्गार लिखें? सूखी स्याही मसिधानी में, कैसे विषय विचार लिखें? शब्द बिखरते कंकड़ पत्थर, भावों का सूना आँगन, तप्त बालुका में पग रखकर, स्वामी की जयकार लिखें। धूप खिली है सन्नाटे की, छाया में बोली बहरी, अधरों पर बस मौन सजाकर, प्रीतम का अभिसार लिखें। मानस-मिट्टी खोद-खोद कर, नागफनी बोते केवल, पुष्प बबूलों के तब खिलते, उनका ही आभार लिखें। एक छलावा सोत उमड़ता, दम्भ हृदय धर सरिता का, उठी उर्मियाँ कंकड़-कृत जो, उनको कैसे  ज्वार लिखें? -©नवल किशोर सिंह

छलिया ©नवल किशोर सिंह

 नेह नटखट डोर छलिया। तोड़ता चितचोर छलिया। नेत्र मुकुलित जागरण से। छाद तन श्वेतावरण से। लेप पीड़ा बोध आनन। भीत बेला बीच कानन। बेकली घनघोर छलिया। भाग्य छल को योजती है। मीत मन को खोजती है। तरु तना कादम्ब बनके। पास था आलम्ब बनके। छल गया मन मोर छलिया। डाल टूटा भरभराकर। पाँव में खटका लगाकर। चार पथ से सामना है। एक लेकिन थामना है। पग धरूँ किस ओर छलिया। -©नवल किशोर सिंह

धुंध (गीतिका) ©नवल किशोर सिंह

  धुंध आँखों से हटाने कौन आयेगा। पंथ को उज्ज्वल बनाने कौन आयेगा। घात के खड्डे भरे हैं पंथ प्रांगण में, दीप ले खड्डे बताने कौन आयेगा। चाँद खंडित पूर्णिमा में घोर संशय है, राहु को नभ से भगाने कौन आयेगा। स्वप्न सिरहाने सहमते रात सोयी सी, नींद से उसको जगाने कौन आयेगा। भेंट चढ़ते दीमकों की ग्रन्थ के पन्ने, धूप अक्षर को दिखाने कौन आयेगा। -©नवल किशोर सिंह