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कुछ वक्त तुम्हारे शहर में गुजार के देखते हैं ©विराज प्रकाश श्रीवास्तव

 चलो कुछ वक्त तुम्हारे शहर में गुजार के देखते हैं , वो भूली यादें तुम्हारी रातों में निहारते हैं ! मैं जब भी मिलता हूं तेरे शहर के लोगों से , वो मुझे मुझसे नहीं ,तेरे नाम से पुकारते हैं ! चलो कुछ वक्त तुम्हारे शहर में गुजार के देखते हैं ..... रंजीदगी से लबरेज है तेरे शहर की हवा , चलो सेहर को खूबसूरत बना के देखते हैं ! तेरे शहर में जो भी मिला गमजदा मिला , चलो भीड़ में हम अपनी पहचान बना के देखते हैं !  चलो कुछ वक्त तुम्हारे शहर में गुजार के देखते हैं ..... फूल भी खिलना भूल चुके हैं अब तेरे शहर में , कांटे भी अब अपना हक मुझपर जताना जानते हैं ! और जब भी मैं याद करता हूं वो रूहानी रात , लोग मुझे सपने में भी तेरा होने से रोकते हैं !  चलो कुछ वक्त तुम्हारे शहर में गुजार के देखते हैं ..... © विराज प्रकाश श्रीवास्तव

कल्पना ©विराज प्रकाश श्रीवास्तव

 महज कल्पना थी मेरी या इत्तेफाक था , मसला मोहब्बत का था जो मेरे साथ था ! तस्वीर हाथों में ले के खोया रहता था रातों में, ये उदासी मेरे दिल की थी या मौसम खराब था!  मैं उलझा रहता था उसे सोचते हुए , हां ये सपना अधूरा सही पर मेरे साथ था !  काफी मशवरा भी लिखा मेरे नाम पे उसने , मोहब्बत का रास्ता भी मुझसे अनजान था!  कबूल कर के मोहब्बत को मैं कहां जाता , वो मुझे मिल जाए ये किस्सा अब कुछ आम था !  मैं कल्पना करता रहा उसके आने की , खामोशियां ने दम तोड़ा ,मेरा लहजा खराब था !  मैं महफूज हूं अब जो वो मेरे साथ नहीं , दिल से दिल का रिश्ता था,जो अब सिर्फ मेरे साथ था !                             ©  विराज प्रकाश श्रीवास्तव