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नव संवत्सर ©सूर्यम मिश्र

              जिसके मंगलमय होने का, साक्षी प्रत्यक्ष दिवाकर है। जिसकी शुभता का सत्‌प्रतीक, यह धरा अमर, यह अंबर है।। हम ही सदैव से श्रेष्ठ रहे, यह सम्वत्सर इसका प्रमाण। सप्तपञ्चाशत् संवत आगे,  हो किया सृष्टि का विनिर्माण।। वय द्वयसहस्त्रएकाशीति में, हो सुदीर्घ संस्कृति वितान। मनु सम्मोहक कर वसुंधरा, चूमें द्रुत गति से आसमान।। नित रंग भरे नूतनता का, वह विश्व चित्र का चित्रकार। हो परिपूरित प्रतिएक लक्ष्य, हो उन्नति पथ जग समाहार।। नित ही आत्मा के गह्वर में, उपजे शुचिता,आलोक शुद्ध। हो शमन दनुजता का जग में, हो दुर्विकार मनुसुत प्रबुद्ध।। सत शांति समुज्ज्वलता प्रकर्ष, जिससे हो तिमिरों का विकर्ष। सुस्वागत हो इसका सहर्ष, है यह हम सबका नवल वर्ष।। ©सूर्यम मिश्र  आदि नववर्ष विक्रम संवत २०८१ की अनहद मंगलकामनाओं सहित,....🙏

कविता- पुनरावर्तन ©सूर्यम मिश्र

  नियति चाहे प्रतिष्ठित पथ में सदा कंटक बिछाए। चक्षुओं का स्वप्न मोहक भले क्षण में उचट जाए।। चित्त होकर चित्त..कतिपय भीरुता के गीत गाए। राग वो रण-त्यागने के मात्र,...अधरों पर सजाए।। शक्ति की समिधा चढ़ा तब, शौर्य हम भर लाएँगे। फ़िर खड़े हो जाएँगे,हम फ़िर खड़े हो जाएँगे।।  काल क्रंदन मान मंडित,......वंदना के शीश धाए। जग तिमिर को, देवता कह, नेह आनन से लगाए।। पाप का परिमाप,....पुण्यों के हृदय में घर बसाए। या कि उस दुर्बोध को बस,.निरावृत रहना सुहाए।। जब निराश्रित अश्रु के कण,..धरा को अपनाएँगे। फ़िर खड़े हो जाएंगे,हम फ़िर खड़े हो जाएंगे।।  प्रीति का उद्यान,.....उद्यमशील रहना भूल जाए।  नग्न नर्तन काल का वो,...प्रणय पुंजों में दिखाए।।  वेदना ही वेदना बस,........चेतना को नोच खाए। प्रीति शाश्वत देख ले ये मान मद यदि लाज आए।।  ज्ञान बन अज्ञान से तब,.....युद्ध हम कर आएँगे। फ़िर खड़े हो जाएँगे,हम फ़िर खड़े हो जाएँगे।।  गगन अच्युत,.धूरि के एक धुँध से ही ना दिखाए। अमर अंबर उड़ रहा हो,..तितलियों के पंख पाए।। पवन उर आलस्य धर कर,.कंपनों में सकपकाए।  वेदना ब्रह्मांड भर की,..प्रति ...

गीत- नव्यानुराग ©सूर्यम मिश्र

नमन, माँ शारदे नमन लेखनी कल्पना मौन की कल्पना रह गई, कल्पना कल्प की वेदना पी गई । उँगलियों को कलम ने सहारा दिया, मौन विस्मृत हुआ,कल्पना जी गई।। मुक्ति मिलती गई चित्त के द्वंद्व से। तीव्र होते गए भाव सब मंद से। प्राण में प्रीति की बाढ़ सी आ गई। गूथते जब गए भाव सब छंद से। भावमाला महारम्य मोहक बनी। शब्दसागर से जब सीपिजा ली गई।। प्रेम को जो हुआ प्रेम से प्रेम तब। खुल गए रास्ते जल पड़े दीप सब। प्राण में सम्मिलित हो गईं शुद्धता।  प्रेम के आवरण से ढका चित्त जब। चक्षुओं की प्रखरता सहज बढ़ गई। जैसे तिमिरों में घोली प्रभाती गई।। नित्य नवतन दिया राग के भाग को हंसरूपी किया चित्त के काग को साधना साध कर साधु मन हो गया  मानमंडित किया नव्य अनुराग को  प्रेम की बस क्षुदा छा गई रोम पर भाव बन-बन के उर में समाती गई ©सूर्यम मिश्र

रामस्तुति !! ©सूर्यम मिश्र

  नमो रामाय,राग-रागाय,राज-राजाय धीमहि! रामचन्द्राय, राम-भद्राय, राम-रामाय धीमहि!! नमो पाराय पराकाशाय प्राप्तिपर्वाय धीमहि! धर्म-अर्थाय,धर्म-खंडाय,स्वयं धर्माय धीमहि!! नमो जैत्राय,जितामित्राय,प्रियंमित्राय धीमहि! सूर्य-वेशाय,सूर्य-अंशाय, सूर्य-वंशाय धीमहि!! नमो लोकाय,लोक देवाय,देवलोकाय धीमहि! त्रियंनूपाय, त्रियुगरूपाय,त्रिपुरभूपाय धीमहि!! नमो सत्याय,सत्यश्रेष्ठाय,श्रेष्ठ-सत्याय धीमहि! अवधईशाय,अवधदेशाय,अवधपुत्राय धीमहि!! नमो यज्ञाय,यज्ञकर्माय,यज्ञ-यज्ञाय धीमहि! वेद-वेदाय, वेद-साराय, वेद-पाराय धीमहि!!  नमो पुंजाय,परं-धामाय,परं-ब्रह्माय धीमहि! शूर-शूराय, शूर-वीराय, शूर-धीराय धीमहि!! नमो रामाय,राम-रामाय,राम-रामाय धीमहि! नम: रामाय,राम-रामाय राम-रामाय धीमहि!! !नम: राम: ईश्वरम अस्य,रामस्य ईश्वरम च! ©सूर्यम मिश्र

ग़ज़ल ©सूर्यम मिश्र

मेरा दिल वो दुखाएगी, उसे थी ये ग़लतफहमी। मेरा सर वो झुकाएगी, उसे थी ये ग़लतफहमी।। खुदाया यार खरबूजे_हुए हैं हम बिना उसके। छुआरे सा सुखाएगी__उसे थी ये ग़लतफहमी।। हमारे कान कौवे से,___हमारी आंख गिद्धों सी। वो हमसे सब छुपाएगी,उसे थी ये ग़लतफहमी।। उसे मालूम ना सूर्यम कलम फ़न है तुम्हारा जो। कहानी वो सुनाएगी,__उसे थी ये गलतफहमी।। कसम से एक टॉफी भी,_नहीं हमने खरीदी है। वो हमसे भोज खाएगी,उसे थी ये ग़लतफ़हमी।।                    ©सूर्यम मिश्र

नज़्म- चाँद उतरेगा ©सूर्यम मिश्र

भरूँगा आंख में पानी, तो उसमें चाँद उतरेगा। निकल कर फिर लड़ेंगे हम, उसी के दरमियां आकर। बढ़ा कर हाथ हम उस तक, कहेंगे घूम लो चल कर।। यकीं है, वो न आएगा, मगर कहने में खामी क्या? रहेंगे साथ उसके हम, वफ़ा की इब्तिदामी क्या? भगाएगा वो चौखट से, मगर हम भी न मानेंगे। कहेंगे, इश्क है तुमसे, तुम्हारा ग़म न जानेंगे।। मगर इस बार रो करके, वो मुझसे हाथ जोड़ेगा। कहेगा यार तुम जाओ, मेरा वो क़ल्ब तोड़ेगा।। मेरा फिर ख़्वाब टूटेगा, ये आंखें ख़ुश्क होंगी जब। उठूंगा, चल पडूंगा मैं, किसी इक रास्ते पर तब।। चलूंगा और चलूंगा मैं, चलूंगा चल सकूं तब तक। भरूंगा सांस भर-भर के, भरी जाएगी वो जब तक।। मगर फिर ख़त्म होगी हद, उलट कर गिर पडूँगा मैं। न उठ पाऊंगा मैं अब फिर कहो कब तक लडूंगा मैं! गिरा बेजान मैं बस यूँ, कहूंगा फिर कि आ जाओ। हैं नीली पड़ गईं आँखें, तुम आओ औ समा जाओ।। मगर फिर से वो दिन आकर, उसे ले साथ जाएगा।  वो अपने पास रख लेगा, मुझे वो ना दिखाएगा।। जमीं पर हम गिरे होंगे, लिखेंगे आखिरी ग़ज़लें। न चाहेंगे कि फिर से सांस, उखड़ी है वो अब सम्हले।। मेरे सँग यार फ़िर ऐसे, वबा का दौर गुज़रेगा। भरूंगा आँख में पानी, तो ...

कविता ©सूर्यम् मिश्र

 निलय भर भीरुता अनहद, व्यथित अनुनाद अंतस में। निराशा पूर्ण अवरोधी, व्यथा का वास नस-नस में ।। प्रवर्धन भाग्य का किंचित, सदा दुर्भाग्य हावी है। अकिंचित चेतना अभिमत, प्रखरता रक्त स्रावी है।। सुनो हे! अग्नि के पोषक, कहाँ, क्या, कौन हो? सोचो। विफलता घूर कर देखे, उठो उसके नयन नोचो।। करो निश्चय अटल यदि तुम, रहेगा शक्ति का मेला। पिपासा शांत कर देगी, महासंग्राम की बेला।। पवन के पंख धारण कर, गगन को भूमि पर लाओ। शिराओं में भरो विद्युत, भुवन में गड़गड़ा जाओ।। मनुज तुम मौन मत बैठो, दहाड़ो सिंह से बढ़कर। लगा दो पाँव की रज को, नियति के वक्ष पर चढ़कर।। धमकते आ रहे तम को, उठो पथभ्रष्ट ही कर दो।  कराओ काल नतमस्तक, "नहीं" को नष्ट ही कर दो।। समय का चक्र मोड़ो तुम, न सीधी चाल हो पाए। हथेली भींच कर मारो, धरा पाताल हो जाए।। ©सूर्यम् मिश्र

श्री महाकाल स्तुति ©सूर्यम मिश्र

 नमामीश शंभू ......त्रिकालं नमामी l महाकाल कालं,.....कृपालं नमामी l महेश्वर, सुरेश्वर...... कु-संतापहारी। प्रभो चंद्रशेखर........भुजंगेशधारी। त्रयंतापहारी...........जटाजूट शंभो, दिगंबर दिशाधिप,.....प्रणम्यं पुरारी।  पिनाकी, त्रिलोकी, विशालं नमामी l महाकाल कालं,.....कृपालं नमामी l। ललाटाक्ष मोहक कृपानिधि जटाधर। परमवीरभद्रं......कपर्दी......धराधर। महादेव_मृत्युंजयं_आदिदेवं, स्वयं शून्यनंतं,__,स्वयंभू  चराचर। परशुहस्त,_गंगालभालं__,नमामी। महाकाल कालं,.....कृपालं नमामी।। नमो चारुविक्रम,..जगद्व्याप्त शंकर । सुखं सृष्टि मूलं,......सुपर्याप्त शंकर । अनघरूप,अव्यक्त,_आसक्तिहीनं ,  सदा शक्ति,..शाश्वत समनुरक्त शंकर । गिरीशं नमो,......चंद्र भालं नमामी l महाकाल कालं,.....कृपालं नमामी l। ©सूर्यम मिश्र

कविता- शिव संस्थापन ©सूर्यम् मिश्र

नमन, माँ शारदे  नमन, लेखनी    लंका पर विजय कामना से। रावण-वध प्रबल भावना से ।। श्री राम उदधि के कूलों पर। थे सत्य साधना मूलों पर ।। तब मन में एक विचार हुआ। यूँ भक्ति भाव विस्तार हुआ।। निकला हूँ विजय साधने जब। शिव संस्थापित हो जाएँ तब।। यह सोच राम विदुजन समक्ष। आए रखने यह दक्ष पक्ष।। यह मत विद्वानों को भाया। सबका मन इससे हर्षाया ।। बोले प्रभु है यह कार्य उचित। हो शीघ्र कार्य संसार विदित।। शिव सफल करेंगे मत निश्चय। प्रमुदित हो बोले सब जय जय।। शिवलिँग स्थापित करवाएँ। आकर उसमें शिव बस जाएँ।। धारें प्रभु अब वेदादि मर्म। संपन्न करें यज्ञादि कर्म।। सत कोटि सुमंगल दायक है। यह कार्य हृदय हर्षायक है।। आचार्य धार, कर विधि-विधान। पूरा कर दें यह अनुष्ठान।। आचार्य सुशोभित हो वैसा।  जो वैष्णव हो शिव के जैसा।। जो कर्म कांड का ज्ञाता हो। वैदिक,प्रकांड आध्याता हो।। सबने सबका मस्तक देखा। खिँच उठी रंज रंजित रेखा।। आचार्य कहाँ से लाएँ अब। गुण जिसमें यह भर जाएँ सब।। चिर मौन सभा भर में छाया। श्री जामवंत मन कुछ आया।। वह बोले विसरित शंका में।  है वैष्णव ऐसा लंका में।। है व्यक्ति किंतु ल...

कविता- प्रार्थना ©सूर्यम मिश्र

नमन, माँ शारदे  नमन लेखनी हे देवता स्वामी प्रभो, नित शांति का वरदान दो। छल दंभ मन से दूर कर,  उर को प्रकाशी ज्ञान दो।। नित शक्ति का संचयन हो, हो क्षीण मन से भीरुता। करुणा, दया, तप, त्याग दो, सुचरित्रता का भान दो।।  उन्माद मन के मेट सब, भर दो सुसंयम साधना। सत आचरण हो कार्य में, आराधना का दान दो।। उल्लास लेकर हास का, प्रभु कष्ट को कर लूँ सहन। निःशुल्क देना कुछ नहीं, उद्योग को बस मान दो।। हर वेदना हर लो विधाता, भ्रांत उर को शांत कर। इस दीन जन को हे प्रभो, निज चक्षु में स्थान दो।। ©सूर्यम मिश्र

नज़्म- वहशी दरिंदा © सूर्यम् मिश्रा

नमन, माँ शारदे नमन, लेखनी देख इक वहशी दरिंदा,  भीड़ मुर्दा हो गयी थी। एक वो वहशी दरिंदा, खा गया इक फूल को जो। नोच कर कलियाँ वो सारी, रौंद डाला पैर से सब।। चीखते उस फूल का पर, दर्द कम तो हो ना पाया। लाश उसकी जा रही थी, फूल के नज़दीक से तब।। फूल अब वो पूछता है, क्या थी उसकी गलतियाँ तब। मालियों से पूँछता वो, क्या कहीं तुम मर गए थे?  पर वो माली कह रहा है,  यार बगिया सो गयी थी। देख इक वहशी दरिंदा, भीड़ मुर्दा हो गयी थी।। आदमी जो था वहाँ पर, था लहू जिसका वो गंदा, खून बहता देख करके,  वो बहुत खुश हो रहा था। पर मेरा है प्रश्न उनसे,  पास से जो जा रहे थे। और भारी प्रश्न उससे,  जिसने उस मंजर को पूरा  देख कर, देखा खुशी से। ना जगा पौरुष भी उसका, फाड़ कर रख दे उसे वो। बाद में चाहे कि वो फ़िर, झूल फाँसी पर ही जाए। हाँ मगर अब याद आया, सब के सब मुर्दे ही थे ना। लाश थे सब जा रहे थे, क्यूँकि उनकी कुछ नहीं थी, जो कि नोची जा रही थी। ना ही थी उनकी बहन वो, ना ही बेटी और पत्नी भी नहीं थी। थी मगर ऐसी कड़ी वो, चेन की उस जा रही जो,  उनकी बहनों बेटियों से। खैर छोड़ो और लिख दो, लाइने...

कविता ©सूर्यम् मिश्र

 छंद- विधाता (कुल मात्रा- 28, 14-14 पर यति, 1ली ,8वीं ,15वीं ,22वीं मात्रा लघु अनिवार्य) निलय भर भीरुता अनहद, व्यथित अनुनाद अंतस में। निराशा पूर्ण अवरोधी, व्यथा का वास नस-नस में ।। प्रवर्धन भाग्य का किंचित, सदा दुर्भाग्य हावी है। अकिंचित चेतना अभिमत, प्रखरता रक्त स्रावी है।। सुनो हे! अग्नि के पोषक, कहाँ, क्या, कौन हो? सोचो। विफलता घूर कर देखे, उठो उसके नयन नोचो।। करो निश्चय अटल यदि तुम, रहेगा शक्ति का मेला। पिपासा शांत कर देगी, महासंग्राम की बेला।। पवन के पंख धारण कर, गगन को भूमि पर लाओ। शिराओं में भरो विद्युत, भुवन में गड़गड़ा जाओ।। मनुज तुम मौन मत बैठो, दहाड़ो सिंह से बढ़कर। लगा दो पाँव की रज को, नियति के वक्ष पर चढ़कर।। धमकते आ रहे तम को, उठो पथभ्रष्ट ही कर दो।  कराओ काल नतमस्तक, "नहीं" को नष्ट ही कर दो।। समय का चक्र मोड़ो तुम, न सीधी चाल हो पाए। हथेली बाँध कर मारो, धरा पाताल हो जाए।। ©सूर्यम् मिश्र

कविता ©सूर्यम् मिश्र

 शांति के वो श्वेत से कपोत खूब उड़ें किन्तु, शत्रुखोर सिंह व्याघ्र व्यग्रकारी भी रहें। सद्भावना के अग्रदूत संग इस धरा पे, युद्ध भावना प्रबल प्रखर प्रहारी भी रहें। भोले भोली भावना को कभी नहीं भूलें किंतु, संग- संग रूप  उनका रौद्रधारी भी रहें। औ मंदिरों से प्रेम मेरा और भी बढ़ेगा, यदि देवताओं संग वहां क्रांतिकारी भी रहें।  ©सूर्यम् मिश्र

महाभारत ©सूर्यम मिश्र

 सब एकत्रित हो रहे,सैन्य साधन समस्त  रणक्षेत्र सज रहा करने को भू विपर्यस्त  छा रहा धरा पर एक भयानक अंधकार  रह-रह गरजे आकाश कर्ण पर कर प्रहार  चहुँओर गर्जना भीषण,ध्वज उड़ते भर-भर  टकटकी लगाए देव, काँप उठते थर-थर  चमका हो जैसे,नभ से एक प्रलयी विनाश  मस्तक पर बैठा काल कर रहा अट्टहास दोनों पक्षों से खड़े सज्ज सैनिक समर्थ करने को एक दूजे के अरि का शौर्य व्यर्थ सब वृक्ष वनस्पति सज्ज आज बनने पिशाच  चहुँओर मृत्यु ही मृत्यु कर रही नग्न नाच अब त्याग, धर्म, सत्यता और न्यायी प्रवृत्ति  कुरु दल के आगे द्रोण भीष्म बन खड़े भित्ति देने निज रण कौशल का,बल का,शुचि प्रमाण थे खड़े कर्ण, ले चाप्‌ हस्त में, बन पहाड़  फ़िर शल्य,शकुनि,भगदत्त,जयद्रथ औ बृहद्वल सौ भाई ले, दुर्योधन हँसता है, खल-खल  रह-रह उत्तेजित करता वह सेना अपार  मानो रण से ही प्राप्त करेगा सहस्त्रार  निज सेना का वीरत्व भाँप कर रहा गर्व  ना दिखता उसको नाश वंश का वह अखर्व उसकी आँखों में दृश्य एक बस राज्य पूर्ण  उन्मत्त हृदय करता मानवता चूर्ण-चूर्ण  दूसरे पक्ष की सेना का...

हमारा नववर्ष ©सूर्यम मिश्र

 जिसके मंगलमय होने का, साक्षी प्रत्यक्ष दिवाकर है। जिसकी शुभता का सत्‌प्रतीक, यह धरा अमर, यह अंबर है।। हम ही सदैव से श्रेष्ठ रहे, यह सम्वत्सर इसका प्रमाण। सप्तपञ्चाशत् संवत आगे,  हो किया सृष्टि का विनिर्माण।। वय द्वयसहस्त्रएकोनशीति में, हो सुदीर्घ संस्कृति वितान। मनु सम्मोहक कर वसुंधरा, चूमें द्रुत गति से आसमान।। नित रंग भरे नूतनता का, वह विश्व चित्र का चित्रकार। हो परिपूरित प्रतिएक लक्ष्य, हो उन्नति पथ जग समाहार।। नित ही आत्मा के गह्वर में, उपजे शुचिता,आलोक शुद्ध। हो शमन दनुजता का जग में, हो दुर्विकार मनुसुत प्रबुद्ध।। सत शांति समुज्ज्वलता प्रकर्ष, जिससे हो तिमिरों का विकर्ष। सुस्वागत हो इसका सहर्ष, है यह हम सबका नवल वर्ष।। ©सूर्यम मिश्र  आदि नववर्ष विक्रम संवत २०७९ की अनहद मंगलकामनाओं सहित,....🙏

शिवस्तुति ©सूर्यम मिश्र

चित्र
  नमामीश शंभू.......त्रिकालं नमामी l महाकाल कालं,......कृपालं नमामी। महेश्वर,सुरेश्वर........कु-संतापहारी l प्रभो चंद्रशेखर.........भुजंगेशधारी l त्रयंतापहारी............जटाजूट शंभो,  दिगंबर दिशाधिप,.....प्रणम्यं पुरारी l पिनाकी,त्रिलोकी,...विशालं नमामी l महाकाल कालं,......कृपालं नमामी l ललाटाक्ष मोहक कृपानिधि जटाधर l परमवीरभद्रं......कपर्दी......धराधर l महादेव,....मृत्युंजयं,.......आदिदेवं, स्वयं शून्यनंतं,......स्वयंभू  चराचर l परशुहस्त........गंगालभालं नमामी l महाकाल कालं,......कृपालं नमामी l नमो चारुविक्रम,..जगद्व्याप्त शंकर l सुखं सृष्टि मूलं,......सुपर्याप्त शंकर l अनघरूप, अव्यक्त,......आसक्तिहीनं,  सदा शक्ति,..शाश्वत समनुरक्त शंकर l गिरीशं नमो,........चंद्र भालं नमामी l महाकाल कालं,.......कृपालं नमामी l ©सूर्यम मिश्र

कान्हा ©सूर्यम मिश्र

 वैसे जग मा नाम बहुत है आपन एक घनश्याम बहुत है, मोहन मूरत गिरधारी की शोभित छवि श्री बनवारी की लट जैसे हैं मेघ मनोहर नयन रम्य ज्यों, गावें सोहर सबकौ सबका गोरा प्यारो आपन सांवर श्याम बहुत है मन मोरा त केशवमय है   मोसे वा का मिलना तय है  वा से हमरी चोखी यारी  आग लगे यो दुनिया दारी सबको जग भर प्यारा होगो  आपन गोकुल धाम बहुत है  थोड़ा वा से चित्त खिन्न है  लेकिन यो बस भाव भिन्न है  सखा देवता भाई मोरा  धूप छाँव परछाई मोरा  दुनिया वैसे सुंदर है पर  कन्हुआ वो अभिराम बहुत है  © सूर्यम मिश्र

हिंदुस्तान की ©सूर्यम मिश्र

 साजिशों में कैद है अब आन हिंदुस्तान की रोज कम अब हो रही है शान हिंदुस्तान की खूँ नहाई बेटियाँ है क्या बताऊँ दास्ताँ । खत्म होती जा रही मुस्कान हिंदुस्तान की ये गगन पूरा भरा है ,आज खूनी बाज से इक कबूतर में बसी है जान हिंदुस्तान की  गाल पे गज़ले बनीं यूँ भाल तो है लापता  बस भुलाई जा रही अब तान हिंदुस्तान की   अब कि फूलों की जगह, काँटे हैं डेरे डाल के हो रही कलियाँ हैं अब,बेजान हिंदुस्तान की  यूँ कलमकारों,कलम का सर,कलम होने न दो  है तुम्हारे हाथ अब पहचान हिंदुस्तान की   ©सूर्यम मिश्र

केशवानंदी ©सूर्यम मिश्र

आज घर में चारो ओर बड़ी चहल-पहल थी। सब जगह से मेहमान आ रहे थे। पूरा घर मेहमानों से भर चुका था। घर के एक कोने में कुछ बच्चे बहुत तेज़ शोर करते हुए लुका-छिपी खेल रहे थे। एक तरफ़ कई औरतें बैठ कर ढोलक बजाते हुए प्रसन्नता के गीत गा रही थी। आज मानों पूरा संसार ही उत्सवमय हो चुका था,आज गोपाल काका की सबसे छोटी बेटी "आनंदी" का ब्याह जो था।  माँ जी घर के अंदर ब्याह की सारी रस्में, पूजा-पाठ करवा रही थी। वो कभी शृंगार दान से सिंदूर लाने के लिए दौड़ती तो कभी दिया जलाने के लिए घी लाने तो कभी गाय के उपलो के आग की ज़रूरत पड़ जाती। पिता जी सभी अभ्यागतों के सत्कार में व्यस्त थे। कभी किसी को पानी पिलाने के लिए मीठा लाने दौड़ते तो कभी किसी का पाँव धुलने को परात ढूंढ़ने लगते तो कभी किसी के लिए तकिये का इंतज़ाम करने लगते। बड़े भैया बाहर हलवाई के कहे अनुसार सामाग्री उपलब्ध करवाते, टेंट की व्यवस्था में देरी पे दाँत भींचते।  घर में ढोल और शहनाई के बाद आनंदी के सखियों की पायलों की छुन-छुन की आवाज़ गज़ब का वातावरण तैयार कर रही थीं। आनंदी की सखियाँ मधुर गीत गाकर उसे उबटन और हल्दी लगा रही थी। उसकी सखियाँ कभी-कभार बीच...

साप्ताहिक कार्यक्रम©सूर्यम मिश्र

 मेरी अत्यंत अप्रौढ़ रचनाओं को सुनकर,उनमें आवश्यक संशोधन करने के लिए मुझे प्रेरित करके,शब्द साधक बनने में मेरा सहयोग कर रहे लेखनी परिवार के सभी सदस्यों का हृदय से आभार। आप समस्त के साथ काव्य पाठ का अनुभव अत्यधिक प्रेरणा-प्रद एवं शानदार रहा। मुझे यह अवसर प्रदान करने के लिए "लेखनी परिवार" को बहुत-बहुत धन्यवाद।  ©  सूर्यम मिश्र Video1: Video2: Video 3:  Video 4: Video 5: Video 6: Video 7: Video 8: Video 9: