अम्मा ©विपिन बहार
कंधे पर बोझा लेकर भी,हँसती,गाती प्यारी अम्मा । मेरे जीवन की मानो तो,फूलो सी इक क्यारी अम्मा ।। पढ़ना मुझको होता था पर,चिंता उसे सताती रहती । मुझसे ज्यादा करती रहती,मेरी ही तैयारी अम्मा ।। लूडो का हो खेल अनोखा,या शतरंजी बाजी होती । मुझकों खुशियाँ देने खातिर,कितनी पारी हारी अम्मा ।। दासी जैसा रखने वालों,घर की वो रानी थी बाबू । घर के कोने-कोने में अब, फ़िरती मारी-मारी अम्मा ।। जो भी माँगा देती रहती,खुशियाँ अपनी छोटी करके । बाबू जी से पैसे रखकर,देती चीज हमारी अम्मा ।। जीवन की सब खुशियाँ यारा,बस केवल लाचारी थी । मेरी यारा,मेरी रानी,मेरी थी अधिकारी अम्मा ।। © विपिन बहार