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अम्मा ©विपिन बहार

 कंधे पर बोझा लेकर भी,हँसती,गाती प्यारी अम्मा । मेरे जीवन की मानो तो,फूलो सी इक क्यारी अम्मा ।। पढ़ना मुझको होता था पर,चिंता उसे सताती रहती । मुझसे ज्यादा करती रहती,मेरी ही तैयारी अम्मा ।। लूडो का हो खेल अनोखा,या शतरंजी बाजी होती । मुझकों खुशियाँ देने खातिर,कितनी पारी हारी अम्मा ।। दासी जैसा रखने वालों,घर की वो रानी थी बाबू । घर के कोने-कोने में अब, फ़िरती मारी-मारी अम्मा ।। जो भी माँगा देती रहती,खुशियाँ अपनी छोटी करके । बाबू जी से पैसे रखकर,देती चीज हमारी अम्मा ।। जीवन की सब खुशियाँ यारा,बस केवल लाचारी थी । मेरी यारा,मेरी रानी,मेरी थी अधिकारी अम्मा ।। © विपिन बहार          

गजल ©विपिन बहार

 भूख खोजें बेतहाशा नून रोटी दाल को । गाँव मे आए विधायक पूछते है हाल को ।। छप्परों से आँसुओ की बूंद टपकी जा रही । काम मंत्री जी करेंगे अब नए ही साल को ।। आग जो फ़ैली तुम्हारा घर जला सकती कभी । गर नही समझें मियाँ तुम इस सियासी चाल को ।। शान-शौकत ,चार पीछे लोग है अब आपके । जानते है हम विधायक आप के भौकाल को ।। तुम शिकंजी पी रहे हो राजशाही ठाठ में । भूख से बेचे गरीबी रोज अपने खाल को ।। दोस्त मेरे दोष मुझकों आप मत देना कभी । एक शायर कह रहा बस आप के ख्याल को ।। ©विपिन बहार

आशिक ©विपिन बहार

 दुनिया कहती... पागल मुझको । वो कहती... आवारा है तू । चाहत कहती... मरना है अब । आदत कहती .. भोला न बन । करवट माँगे.. उसका साया । नींदें माँगे.. उसका सपना । धूप माँगे ... उसकी छाया । आँखे माँगे .. उसका तराना । जीवन माँगे .. उसका होना । बेचैनी बोले .. सिगरेट पियो । तारे बोले .. तन्हा है तू । राते बोले.. भूली-बिसरी । मौसम बोले.. रूखा है तू । चाहत कहती आशिक है तू । आसूँ कहते आशिक़ है तू सारे कहते आशिक है तू  मिलकर कहते  आशिक है तू चारो तरफ से आशिक है तू कैसी आवाजे आशिक है तू हद है यार आशिक है तू चुप हो जाओ आशिक है तू .. आशिक है तू आशिक है तू आशिक है तू © विपिन"बहार"        

माँ ©विपिन बहार

 माँ के चरणों में मिलें,मुझकों चारों धाम । माँ ही मेरी है सुबह, माँ ही मेरी शाम ।। नैनों से आसूँ बहे ,जीवन लगता ख़ार । माँ तुझ बिन कुछ भी नही,मेरा यह घर बार ।। तन मेरा तपता रहा,पर माँ सहती घात । माँ तो रोती ही रही,जगकर सारी रात ।। कंधों पर चलता रहा,घर का सारा भार । माँ ही मेरी जीवनी,माँ ही मेरा सार ।।         ©विपिन बहार

खालीपन ©विपिन बहार

आसूँ में पत्थर लेकर भी,जीवन चले रवानी में । चाहत,धोखा,खालीपन है, शायरों की कहानी में  ।। आँसू को तो हमने पोछा,छुप-छुप कभी रजाई में । शादी उसकी होती देखी,भीगीं हुई जुलाई में ।। मंडप में जलते सपने थे,प्रेयसी राजधानी में । चाहत, धोखा,खालीपन है, शायरों की कहानी में  ।। नजरों की खामोशी में तो,यारा बहुत बवंडर था । हल्दी के लेपन में उसके,उर का हाल भयंकर था ।। फेरो में जो सपने टूटे,काँपे बदन बयानी में । चाहत,धोखा,खालीपन है, शायरों की कहानी में  ।। नाचे,झूमे,बाराती को,देखे खड़े किनारे में । सखियाँ तेरी बैठे गुपचुप,अंतर करे हमारे में ।। यादे तेरी गंगाजल है,हमकों मिली निशानी में । चाहत,धोखा,खालीपन है, शायरों की कहानी में ।। ©विपिन"बहार"          

लाचारी ©विपिन बहार

चित्र
 जिंदगी में वो करूँ तुमसे नही इंकार हों । मौत का सजदा करूँ फिर मौत से इजहार हों ।। चोट खाकर अब हमें ये तो भरोसा हो गया । प्यार जिससे कर रहे हो प्यार के हक़दार हों ।। तोड़ देती हर तरफ से ये किताबी आशिकी । आदमी यूँ प्यार में ऐसे नही बीमार हों ।। कर रहे हैं हम ख़ुदा से बस यही अब आरजू । अब हमारा एक डेरा चाँद के ही पार हों ।। हम तड़प कर ना मरे कुछ तो करो मेरे खुदा । मौत के सर पर कभी ना आँसुओ का भार हों ।। आशिक़ी ने यार हमकों यूँ मिलाया मौत से । एक शायर फिर कभी ऐसे नही लाचार हों ।।          ©विपिन"बहार" Click Here For Watch In YouTube

फ़ाग ©विपिन बहार

 दिल हमारा गुनगुनाता,प्यार जाता जाग जानम । गाल हो जाते गुलाबी,सोचकर वो फ़ाग जानम ।। ओढ़नी तो झिलमिलाती,सप्तरंगी मोतियों से । रंग फेंका जा रहा था,संगमरमर खिड़कियों से ।। तुम लजाई झाँकती थी,क्या करूँगा आँकती थी । इस नजर में देखकर तुम,मन हमारा भाँपती थी ।। जब नजर की हो लड़ाई,तो बदलते राग जानम । गाल हो जाते गुलाबी,सोचकर वो फ़ाग जानम ।। नाम बिन बोले हमारा,बात सब कहती हमें थी । रंग हाथों में लिए तुम,ढूंढती फिरती हमें थी ।। लाल-केसर आसमानी,रंग कैसा घोल जाता । जब तुम्हारी इक छुअन से,मन कुँवारा डोल जाता ।। सब जला कर राख करती,दिल लगी ये आग जानम । गाल हो जाते गुलाबी,सोचकर वो फ़ाग जानम ।। फागुनी मौसम हसीं था,खेत मे सरसों लगें थे । दिल तुम्हारा जीतने में,यों बहुत बरसो लगें थें ।। तुम ख़ुदी को खोजती थी,यार मेरी शायरी में । शायरी को तुम छुपाकर,रख रही थी डायरी में ।। चाहकर भी मिट सके ना,मन जगा अनुराग जानम । गाल हो जाते गुलाबी,सोचकर वो फ़ाग जानम ।। ©विपिन"बहार"          

गीतिका ©विपिन बहार

 जीवन मे तूफान बहुत है । जीने में नुकसान बहुत है ।। सब दिखते बरसाती मेढक । कहने को इंसान बहुत है ।। पीड़ा,आसूँ, चाहत,धोखा । मरने का सामान बहुत है ।। भूख,गरीबी खालीपन की । आपस मे पहचान बहुत है ।। खुद को समझे खुदा सरीखा । मानव को अभिमान बहुत है ।। आओ बहनों रौशन कर दो । घर मेरा सुनसान बहुत है ।। कौन सुनेगा भूखें मन की । वैसे तो दीवान बहुत है ।।    ©विपिन बहार

गजल ©विपिन बहार

 सुकूँ से तोड़ के डाली,जहालत मौज लेती है । लड़ाकर धर्म से देखों, सियासत मौज लेती है ।। हमें उड़ते परिंदे ही मियाँ अच्छे बहुत लगते.. परिंदे कैद करके तो,शराफत मौज लेती है ।। मिली तारीख पर तारीख फिर भी आस क़ायम है.. कटा कर रोज यूँ चक्कर,अदालत मौज लेती है ।। ख़ुदा ने यार सब कुछ छोड़कर उसको बनाया है... हमारा दिल वहाँ लट्टू,इबादत मौज लेती है । सभी के साथ रहने से इमारत की बुलंदी है... हुआ जब घर में बँटवारा,अदावत मौज लेती है ।। हमारे शेर सुनकर के सुनों तारीफ कम करना.. अजी तारीफ ज्यादा हो,इनायत मौज लेती है ।। © विपिन"बहार"        

गीत ©विपिन बहार

 दर्द की क्या कहानी बताऊँ प्रिये । गीत यह तुम बिना अब बढ़ा ही नही ।। बंदगी को छुपाना कहाँ है सरल । प्यार क्या है बताना कहाँ है सरल ।। बस तुझे लिख दिया,भाव में गढ़ दिया । और फिर तुम बिना कुछ गढ़ा ही नही ।। गीत यह तुम बिना अब बढ़ा ही नही ।। जिंदगी से हमे कुछ गिला ही नही । चाहने से हमे कुछ मिला ही नही ।। यों खुदी से लड़ा बेवजह हर घड़ी । बाद तेरे किसी से लड़ा ही नही ।। गीत यह तुम बिना अब बढ़ा ही नही ।। दर्द को शायरी से सनम पी रहा । छोड़ तो तू गई पर तुझे जी रहा ।। लाख आए गए चेहरे तो कई । दूसरा चेहरा तो पढ़ा ही नही ।। गीत यह तुम बिना अब बढ़ा ही नही ।। ©विपिन "बहार"          

भुखमरी ©विपिन बहार

नून रोटी भी नही अधिकार में । घास खाती जिंदगी परिवार में ।। बैठ कलुआ ज्ञान अब यों झोंकता । श्वान जैसे बेसबब वह भौंकता ।। दाल-चावल जो धरा पर है पड़े । दीन अब वह भूख वश यों घोटता ।। मौत दिखती भूख के आकार में । घास खाती जिंदगी परिवार में ।। दो टका भी तो नही इस हाथ हैं । दर्द की रेखा उभरती माथ है ।। ना वसन है,ना जतन ना चादरें । शीत में बस कँपकपी ही साथ है ।। नींद रोती दीन के किरदार में । घास खाती जिंदगी परिवार में ।। दीनता यों वेदना से जा लड़ी । जिंदगी किस राह पर आकर खड़ी ।। भुखमरी की क्या सुनाऊँ दास्ताँ । आँसुओं की दाल कुकर में पड़ी ।। दर्द,आसूँ ही मिले आहार में । घास खाती जिंदगी परिवार में ।।   © विपिन"बहार"

साप्ताहिक कार्यक्रम©विपिन बहार

 कोई भी काव्य-पाठ तभी सफल होता है...जब श्रोता उच्च-कोटि के हो...सच मे गुरुजनों के सामने काव्य-पाठ करना किसी बड़े अनुभव से कम नही है...लेखनी परिवार के सभी गुरुजनों के सामने काव्य-पाठ करने का सुअवसर प्राप्त हुआ...मैं इसका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ... आप सभी का ऐसे ही आशीर्वाद बना रहे है....   © विपिन बहार Video 1:    Video 2: Video 3: Video 4: Video 5: Video 6:   Video 7: Video 8: Video 9: Video 10: Video 11: Video 12:        

मन-सरोवर ©विपिन बहार

वज्न -2122,2122 विधा-गीत  ताप तन का बढ़ रहा है । मन सरोवर सूखता है ।। तोड़ डाला खास ने अब । साथ छोड़ा आस ने अब ।। पीर तन की भाँपता हूँ । कब मरूँगा आँकता हूँ ।। रात-भर बस कँपकपी है.. ज्वार-भाटा फूटता है ।। मन सरोवर सूखता है.. भावनाएँ खार लगती । जिंदगी अब भार लगती ।। चित रहा अब विचलनों में । झूठ सच के उलझनों में ।। ये धरा भी खूब रोती.. आदमी जब टूटता है ।। मन सरोवर सूखता है... जिंदगी की ये कहानी । फूल बिन बस बागवानी ।। कह रही अब शायरी है ।  अब सफर बस आख़िरी है ।। साँस से है अब लड़ाई । यार जीवन छूटता है ।। मन सरोवर सूखता है...   ©विपिन बहार

घाट पर(श्मशान घाट) ©विपिन बहार

 आग की तो आतिशे थी घाट-पर । यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर ।। सोचकर भावुक हमारा रग हुआ । कौन है जो जिंदगी का ठग हुआ ।। चल रहे सब रेल की रफ़्तार में... मोह-माया क्षोभ-काया जग हुआ ।। अंत होती दिख रही थी लालसा... जल रही सब साजिशें थी घाट-पर ।। आग की तो आतिशे थी घाट-पर.. यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर.. नैन की ये पुतलियाँ अब थक गई । बेरहम ये जिंदगी अब पक गई ।। राख होने को बदन तैयार है.. लकड़ियों में आरजू अब ढक गई ।। कौन अपना है पराया क्या पता... दूर सारी बंदिशे थी घाट-पर ।। आग की तो आतिशे थी घाट- पर ... यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट-पर... दर्द को अपने समेटें मैं चला । छोड़कर सब यार भेटें मैं चला ।। मोल मेरा तुम लगा लो अब यहाँ ... पाप की गठरी लपेटें मैं चला ।। कर भला तो हो भला की तर्ज़ पर... छोड़ दी जो रंजिशें थी घाट पर ।। आग की तो आतिशे थी घाट पर ... यूँ दफ़न सब ख्वाहिशें थी घाट पर... © विपिन "बहार"           

चाय पर ©विपिन बहार

 बारिशो में तुम मिली थी चाय पर । बादलों में तुम खिली थी चाय पर ।। वक्त का मानो पता ही ना चला... बात यारो यूँ चली थी चाय पर ।। हम अकेले ही अकेले रह गए । याद तेरी मखमली थी चाय पर ।। प्यार का दीपक बुझा तुम चल दिए.. आरजू की लौ जली थी चाय पर ।। दो नयन मिलते रहे यूँ मिल गए । मनचला था ,मनचली थी चाय पर ।। भीड़ सब तुमको निहारे दिलरुबा । यार कितनी खलबली थी चाय पर ।। © विपिन"बहार"

लाश ©विपिन बहार

 देख खाते चील-कौवे राह में उस लाश को । खींचते अब जानवर भी छाह में उस लाश को ।। कौन से मद में सुनो अब जल रही ये भीड़ है । मतलबी हाँ मतलबी इस पल रही ये भीड़ है ।। आँख अपने बंद करके बढ़ रही है शान से... लाश के ऊपर यहाँ अब चल रही ये भीड़ है ।। यार कुछ ने तो जहालत की हदें यूँ पार की... चाहते है कैमरे की चाह में उस लाश को... देख खाते चील-कौवे राह में उस लाश को.. खींचते अब जानवर भी छाह में उस लाश को.. कौन है जो दर्द अब यूँ बॉटने में लग रहा । दर्द की बदरी घनी को छाटने में लग रहा ।। लोग आपस मे यहाँ तो टाँग ही अब खींचते.. आदमी ही आदमी को काटने में लग रहा ।। लाश छूना अब यहाँ पर तो बड़ी सी बात है .. कौन अब भर ले यहाँ पर बाह में उस लाश को.. देख खाते चील-कौवे राह में उस लाश को.. खींचते अब जानवर भी छाह में उस लाश को... बेसहारो का यहाँ कोई सहारा ही नही । भुखमरों का अब यहाँ कोई गुजारा ही नही ।। बात हमको ये समझ मे अब यहाँ पर आ गई.. आदमी की जात का कोई किनारा ही नही ।। सोचने के बाद भी हमको नही मालूम है..  कौन लेकर अब चलेगा दाह में उस लाश को.. देख खाते चील -कौवे राह में उस लाश को.. खींचते अब जानवर भी छ...

ग़ज़ल ©विपिन"बहार"

 हाथ अपने अब घुमाकर बैठ जा । काम अपने सब बताकर बैठ जा ।। लोग जल कर ख़ाक हो ही जा रहे । आग सारी तू लगाकर बैठ जा ।। राजशाही ने हमे ये सीख दी । दूसरो को यूँ हटाकर बैठ जा ।। आजकल के लोग देते मशवरा । साथ वालो को लड़ाकर बैठ जा ।। राज करने का सुनो तुम ये जुगत । ताज-कुर्सी से उठाकर बैठ जा ।। यार गूंगो का शहर है चुप रहो तू गजल अपनी सुनाकर बैठ जा ।।   ©   विपिन"बहार"

काशी ©विपिन बहार

 #गीतिका #मंगलमाया छंद प्रत्येक चरण 22 मात्राएं(11-11 पर यति) भोले की जयकार,हमारे काशी में , पूजा है साकार,हमारे काशी में । तर होते सब पाप,यहाँ पर जो आते, पावन गंगा धार,हमारे काशी में । संगी साथी साथ,चले आओ मिलकर, नौका नदिया पार, हमारे काशी में । तुलसी मानस धाम,लिए संकट मोचन, भावों का अंबार, हमारे काशी में । दोहावली कबीर,लिए कलम सिपाही, कविता की झंकार,हमारे काशी में । जीवन का सब ज्ञान ,यहाँ सब पाते है, जीवन का है सार,हमारे काशी में । जो भी करे निवास,यहाँ का हो जाए । खुशियों की बौछार, हमारे काशी में । © विपिन"बहार"         

मौत © विपिन बहार

  जिंदगी से हारना भी मौत है । मौत को यूँ चाहना भी मौत है ।। बंद कमरे ,बंद घड़िया कह रही । दर्द को यूँ काटना भी मौत है ।। बढ़ रही है जमघटो में त्रासदी । साथ खुशियां बाटना भी मौत है ।। शक किया बस शक किया है आज-तक । प्यार को यूँ मापना भी मौत है ।। चाल बाजों का जहाँ है ऐ मियाँ । झूठ खुद पर लादना भी मौत है ।। जिंदगी में बात ये अब गाँठ लो । आरजू का काँपना भी मौत है ।। © विपिन"बहार"

गजल © विपिन बहार

 मौत ये अब खुदा पर टली जा रही । जिंदगी जानलेवा चली जा रही ।। एक ताइर हुई यार यूँ जिंदगी । यूँ कफ़स में कही अब पली जा रही ।। कौन अजमत करें कौन खिदमत करे । दूर तक बस यही खलबली जा रही ।। मखमली दिलरुबा पास आओ जरा । आरजू आस की यूँ जली जा रही ।। देख ले आसमाँ, देख ले कारवाँ । बारिशों में कही मनचली जा रही ।। लोग क्यों मतलबी से लगे है यहाँ । बात मुझको यहीं अब खली जा रही ।। © विपिन"बहार"