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जीवन ©सरोज गुप्ता

 जीवन को बहुत करीब से पहचाना है मैनें, जीवन को कई पहलू से जाना है मैनें, जीवन को इक सपने सा जिया है मैनें, जीवन के कड़वे घूंट भी पिया है मैनें ।। जीवन कामनाओं का जंजाल भी है, जीवन भावनाओं का मकड़जाल भी है, जीवन कभी शांत कभी वाचाल भी है, जीवन कभी सुंदर कभी विकराल भी है ।। जीवन किसी का एक अभिशाप सा है, जीवन किसी का अक्षम्य पाप सा है, जीवन किसी का विषैले सांप सा है, जीवन किसी का धवल निष्पाप सा है ।। जीवन हमेशा सुरीला गीत नहीं होता, जीवन हमेशा सुगम संगीत नहीं होता, जीवन हमेशा मन का मीत नहीं होता, जीवन में सदा ही बस प्रीत नहीं होता ।। जीवन एक तपस्या है जो करना पड़ता है, जीवन एक यात्रा है जो चलना पड़ता है, जीवन एक कर्ज है जो भरना पड़ता है, जीवन एक संघर्ष है जो लड़ना पड़ता है ।।  जीवन कभी शिक्षक तो कभी छात्र है, जीवन असीमित शक्तियों का गात्र है, देखो तो ये जीवन एक रंगमंच मात्र है, जहां हर व्यक्ति इस रंगमंच का पात्र है ।।   © सरोज गुप्ता

कविता - नव वर्ष ©सरोज गुप्ता

आओ नव-वर्ष मनाएं हम || नई प्रेरणा नव उमंग से ,  नये जोश के नव तरंग से , देश-प्रेम के शुभ प्रसंग से ,  पुलकित मन कर जाएं हम | आओ नव-वर्ष मनाएं हम || आस का दीपक , नेह की बाती ,  हर  घर  दीप  जलाओ  साथी ,  प्रेम के पुष्प , भाव की पाती ,  बंदनवार   लगाएं   हम  | आओ नव-वर्ष मनाएं हम || दीन  दुखी  का  त्राण  लिए ,  मानव  का  कल्याण  लिए ,  निष्प्राणों  के  प्राण  लिए ,  दलितों के भाग्य जगाएं हम | आओ नव-वर्ष मनाएं हम || आप सभी के लिए कामना ,  दुख का ना हो कभी सामना ,  मन  में  हो  उत्साह  भावना ,  देते  शुभ - कामनाएं  हम | आओ नव-वर्ष मनाएं हम || ©सरोज गुप्ता

मोहन की मीरा ©सरोज गुप्ता

   मीरा के बस कृष्ण कन्हाई मान ली वर मोहन मूरत को माँ ने जो समझाई || मीरा के बस कृष्ण कन्हाई.....  बालकाल छवि मन बैठाई,  रूठी उनसे, उन्हें मनाई | कृष्णमयी जब हुई सयानी, शुरू हुई इक प्रेम कहानी | अपने हिय की बात वो अपने कान्हा को बतलाई || मीरा के बस कृष्ण कन्हाई.....  ब्याह के जो वो सासर आई,  अपने कान्हा को संग लाई | पति का साथ उसे ना भाया,  वो तो थी मोहन की छाया | लोकलाज की चिंता तज के प्रेम की अलख जगाई || मीरा के बस कृष्ण कन्हाई.....  ठाठ राजसी तज बावरिया,  कान्हा जूँ की बन जोगनिया | सांस ली अंतिम मोहन द्वारे,  प्रीत सिखाई जग को सारे | मन की प्रीत लिए हिय में वो कान्हा में ही समाई || मीरा के बस कृष्ण कन्हाई..... ©सरोज गुप्ता

ये जिन्दगी है एक जादुई किताब ©सरोज गुप्ता

 जिसमें होते हैं हर सवालों के जवाब, कहीं होती है खुशी की कोई कविता कहीं बेइंतेहां गमों का आजाब । ये जिन्दगी है एक जादुई किताब ।। किसी पन्ने में है दादी नानी के जादुई किस्से, किसी में दादा नाना संग सैर सपाटे के किस्से, किसी पन्ने में बचपन है भरा-पूरा बेहिसाब । इसीलिए ये जिन्दगी है एक जादुई किताब ।। कहीं हैं रंगीन त्योहारों के रंग-बिरंगे नजारे, कहीं है मातमी माहौल, आंसुओं की कतारें, कहीं महबूब की गुफ्तगूं और इश्कियां ख्वाब । इसीलिए ये जिन्दगी है एक जादुई किताब ।। किसी पन्ने में छाई बच्चों की उन्मुक्त किलकारी, किसी पन्ने में घर परिवार की भरपूर जिम्मेदारी, कहीं जिन्दगी के रोजमर्रा के हजारों अस्वाब । इसीलिए ये जिन्दगी है एक जादुई किताब ।। ©सरोज गुप्ता

गीत ©सरोज गुप्ता

 जय जय जय महिषासुर मर्दिनी रूप अनूप देखाई ।  कइस बखान करुअ मैं मूरख सबद मिलत नहिं माई ।।   कंचन वरन, नयन अनुरंजित ओंठ पुहुप मुस्काई,  कानन कुंडल, नथ नकुनन मा मांग सिंदूर लगाई ।।  शंख गदा तिरसूल लिए माँ घातक बन ललकारी,  सिंह चढ़े रजनीचर मारे कोप भरहिं फुफकारी ।।  वासर रयन दिवस पखवाड़े विनती करूँ तोहारी,  करहुँ कृपा अब मात भवानी, कष्ट हरो महतारी ।।     ©सरोज गुप्ता

गज़ल ©सरोज गुप्ता

आज खामोशियाँ कर रहीं गुफ्तगू ।  आ भी जाओ सनम तुम मेरे रूबरू ।।  आपको इल्म हो या न हो जानेमन ।  मेरी उल्फ़त को है आपकी जुस्तज़ू ।।  मैंने मांगा नहीं आपसे कुछ सनम ।  पूरी कर दो मेरी आज ये आरज़ू ।।  आप मशरूफ़ हैं ये हमें है पता । ऐसी मसरूफ़ियत अब लगे फ़ालतू ।।  वो हंसी खो गई आपकी जानेजाँ ।  जो लुटाती रही प्यार की मुश्कबू ।।  आँख मेरी टिकी देहरी पर सनम ।  आके रख लो सनम इश़्क की आबरू ।।    ©सरोज गुप्ता

लेखनी परिवार ©सरोज गुप्ता

 लेखनी शब्द है, लेखनी सार है। लेखनी भावनाओं का आकार है। भाव मन के समर्पित करे पृष्ठ को, लेखनी अपने लेखन का आधार है।। छंद दोहा सवैया गज़ल गीत में, शब्द शृंगार कर बोलते प्रीत में। गुनगुनाने लगे शून्य भी श्वास ले भाव सजधज के आये जो संगीत में। मौन को तोड़ कर वार्ता जो करे, ऐसी अभिव्यक्ति का एक संचार है।। सीखते हैं यहाँ और सिखाते भी हैं, भावों को शिल्प से हम सजाते भी हैं। नित नई इक वधू रूपी कविता से हम एक दूजे का परिचय कराते भी हैं। शब्द को पूजते जो यहाँ ईश सम ऐसे ही पूज्य वृंदों का संसार है।। ©सरोज गुप्ता

कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं ©सरोज गुप्ता

 यादों की खिड़की खोलूॅं तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं। बचपन की बातें बोलूॅं तो कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।। वो बातें बड़ी निराली थीं, नटखट सी प्यारी प्यारी थीं, स्कूल की राहें लम्बी थीं पर आज भी मन को भाते हैं। कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।। इमली कमरख और कैथों का, वो तेल से भरे अचारों का, बॅंटवारा करते खानों का, सौहार्द का पाठ पढ़ाते हैं। कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।। एक दूजे के घर आ जाना, घंटों बैठे बस बतियाना, फिर लौट के बुद्धू घर आना, वो सोच सोच मुस्काते हैं। कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं।। @सरोज गुप्ता

ग़ज़ल ©सरोज गुप्ता

नमन माँ शारदे  नमन लेखनी  जुदाई में किसी को डूब करके याद करना क्या,  उदासी की घटाओं को निगाहों में उतरना क्या ।  दिखे जो आइना हमको तो पूछे सौ सवालों को,  न हो दीदार दिलबर का तो फिर सजना सँवरना क्या ।  भरें हो अश़्क आँखों में, बहा दो खुद-ब-खुद इनको,  वगरना डूब कर इनमें अजी फिर रोज़ मरना क्या ।  मोहब्बत की खुशी चेहरे पे दिखती नूर बन करके, सजावट के हज़ारों दाँव पेंचो से निखरना क्या ।  ये मुश्को-इश्क छिप सकती नहीं यारों छुपाने से, गुले-गुलशन को गुलफामों से दूरी अब ये करना क्या ।  परिंदे घोंसले में लौट आते...... शाम होने पर, बिना मकसद गली की धूल कदमों से बिथरना क्या ।  ©सरोज गुप्ता

मोरे सँवरिया ©सरोज गुप्ता

 मइया से सिकवा करूँगी ना तोरी,  कान्हा करो नाहीं बरजोरी,  रोको नाहीं मोरी डगरिया । छेड़ो नाहीं मोरे सँवरिया ।।  जब भोरहरी में जाऊँ मैं यमुना के तट पर,  तबहीं छेड़े मोहें तुम ओ काहें को गिरधर,  मारे कंकरिया सिर की गगरिया पे नटवर,  फोरे गगरिया, तु जो सँवरिया,  तु जो सँवरिया, फोरे गगरिया,  भीगे मोरी कोरी चुनरिया,  छेड़ो नाहीं मोरे सँवरिया ।।  बैरी प्रीत निगोड़ी सुने नहिं बतिया, काहें चैन चुरा के छुपे मन बसिया,  तेरी याद में बीते न दिन न ये रतिया, तेरी बसुँरिया, सुनूँ सँवरिया,  सुनूँ सँवरिया, तेरी बसुँरिया,  दौड़ी आऊँ तेरी नगरिया, छेड़ो नाहीं मोरे सँवरिया ।।  @सरोज गुप्ता

ग़ज़ल ©सरोज गुप्ता

नमन, माँ शारदे  नमन लेखनी बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 1222 1222 1222 1222 मुझे वो खूबसूरत सा, फ़साना याद आता है ।  मिरी ख़ातिर तुम्हारा गुनगुनाना याद आता है ।।  वो मुझसे प्यार का इज़हार, करने के इरादे से ।  मिरे घर का तेरा चक्कर लगाना याद आता है ।।  दिलाई थी कभी चूड़ी जो तुमने लाल रंगों की ।  खुशी से चूड़ियों का, खनखनाना याद आता है ।।  खुले गेसूँ से मेरे खेलना औ उंगलियाँ करना । उन्हीं गेसूँ में तेरा जग भुलाना याद आता है ।।  महकते से ख़तों में इक, खुमारी साथ रहती थी ।  ख़तों को वो क़िताबों में, छुपाना याद आता है ।।  कभी रूठे अगर तुमसे, हमारी दिल्लगी थी वो ।  मनाना वो तेरा, अपना सताना याद आता है ।।  न भूली हूँ न भूलूँगी, वो वादे, वो मुलाकातें ।  मुझे मंज़र जवानी का, सुहाना याद आता है ।।  ©सरोज गुप्ता

तेरी याद ©सरोज गुप्ता

 यार जब तुझको याद करते हैं,  तेरे जलवों की झलक हर तरफ़ बिखरते हैं । जान देते हैं आज भी तुम पर, जाने जां बात यही कहते हुए डरते हैं । मेरी आदत नहींं गई अब तक,  तुझसे ख़्वाबों में रोज शामों-सहर मिलते हैं ।  ज़िक्र जब भी तेरा कहीं होता,  बीते लम्हों से हम-ख़्याल हो गुज़रते हैं ।  दिल में तुम अब भी मुस्कुराते हो,  अश़्क पलकों पे सनम अब नहींं ठहरते हैं ।  तेरी यादों में लिखने बैठूँ जो,  लफ़्ज़ फ़ूलों की तरह बेशुमार झड़ते हैं । ©सरोज गुप्ता

पुरुष ©सरोज गुप्ता

पुरुष को पुरुषार्थ से ना जानिये,  कष्ट होता है उसे भी मानिये ।  एक अस्फुट भाव ले मन में रहे,  प्रस्फुटित उसको है करना, ठानिये ।।  है बना यदि वो चरित्र, विचित्र सा,  रह ना जाये मात्र वो इक चित्र सा ।  कुछ करो वो खिल उठे बनके कमल,  महक जाये घर औ आँगन इत्र सा ।।  पति पिता,भाई बना घर का क्षितिज,  दायित्व धर कर रह न जाये वो तृषित ।  प्रेरित करें कुछ इस तरह खुल कर हॅंसे,  गुनगुनायें हम सभी संग हो मुदित ।।  नारी है जननी, तो नर भी है जनक,  नारी आभूषण है यदि, नर है कनक ।  दिल से करें आभार हर पुरुषार्थ का,  गूॅंजे फिर चॅंहु ओर खुशियों की खनक ।।  ©सरोज गुप्ता

गीत - तुम बना दो ©सरोज गुप्ता

 अधर की तेरे बनूँ जो मुरली तो धुन प्रणय की कोई बना दो । मैं राधिका यदि बनूँ तुम्हारी,  स्वयं को घनश्याम तुम बना दो ।।  तेरे ही रंग में रंगी हूँ प्रियतम,  बनी हूँ श्यामा न जाने कब से ।  बना दूॅं निधिवन मैं ऑंगना जो तो घर ये वृजधाम तुम बना दो ।।  रहूँगी संग में सदा तुम्हारे,  डगर भले हो कठिन कोई भी ।  रहूँ निछावर सिया सी बनके स्वयं को श्री राम तुम बना दो ।।  ©सरोज गुप्ता

मइया की लीला ©सरोज गुप्ता

 छवि माँ की अद्भुत पलक ना समाय ।  मइया की लीला सुनाई न जाय ।।  महिष यातना से, हुआ विश्व आहत,  मनुज, देव सारे किये माँ से मन्नत ।  किया युद्ध माता ने,नौ दिन निरंतर, हुए रक्त रंजित धरा और अंबर ।  महिष मर्दिनी अम्बिका माँ कहाय ।।  मइया की लीला सुनाई न जाय ।। रकतबीज का रक्त पी खड्गवाली,  किया नाश अरि का बनी मात काली ।  निशुम्भ-शुम्भ संहार, चंड मुंड मारी,  असुर का किया वध, जगत मात तारी । जगत तार जगदम्ब लीला दिखाय ।।  मइया की लीला सुनाई न जाय ।। नवल रात्रि में नित्य जो भक्त ध्याता, सभी सुख जगत के सहज व्यक्ति पाता । सभी कष्ट बाधा मेरी मात हरती, मनोकामना पूर्ण सब मात करती । सदा अपनी छाया में रखती छुपाय ।।  मइया की लीला सुनाई न जाय ।।  ©सरोज गुप्ता

लेखनी की होली ©सरोज गुप्ता

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बुरा न मानो होली है 😃😃😃🥳🥳🥳🥳 हमरे गाँव लेखनी में हल्ला हुल्लार भइले हो  होली कमाल भइले हो........  भाई रिक्त बइठ के खटिया,  जोह रहें सबही के बटिया, कउनो सुने कवीरा जे लिख के तैयार कइले हो होली कमाल भइले हो..........  भइया नवल लिए पिचकारी,  रंग लगावैं गजब करारी, उनकैं गीतन से सब बच्चा,बूढ़ जवान भइले हो होली कमाल भइले हो...........  भइया विपिन की जिम्मेवारी, भंग घोटाई अबकी बारी, पिछले साल घोट के आशिष जी बेहाल भइले हो होली कमाल भइले हो...........  दीदी अनिता लिए मिठाई, टेर लगावें कहाँ हो भाई, उनकै दीवाली कै मीठाइया बसियार भइले हो होली कमाल भइले हो...........  दीप्ति दूर झरोखे झकनी,  कहाँ पे बइठल हमरी रजनी, फागुआ गीत, मजीरा, ढोल संग लहकार भइले हो होली कमाल भइले हो............  गुझिया लइ सरोज जो आवैं, बहिन वंदना पापड़ लावैं, सौम्या भाँग पीस कै ठंडाई तैयार कइले हो होली कमाल भइले हो.............  लिए परशांत चले ठंडाई,  लपके झट से संजय भाई,  चढ़ी जो भाॅंग, परम-आनंद के सीमा पार कइले हो होली कमाल भइले हो............  पीपर...

शिव ©सरोज गुप्ता

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ब्रह्मा भी शिव, जीव भी शिव हैं,  जीवन के दृढ़ नीव भी शिव हैं । श्वास भी शिव, प्रश्वास भी शिव हैं,  जीने का विश्वास भी शिव हैं ।।  छाॅंव भी शिव औ धूप भी शिव हैं,  ऊर्जा के प्रतिरूप भी शिव हैं ।  जीवन के अवसान भी शिव हैं,  परमज्ञान व्याख्यान भी शिव हैं ।।  नर में शिव, नारी में शिव हैं,  जग के हर प्राणी में शिव हैं ।  बारम्बार नमन उस शिव को जो भोले भंडारी शिव हैं ।। © सरोज गुप्ता

दोहावली - जाड़ा ©सरोज गुप्ता

 शीत लहर ये कर रही, जीना अब दुश्वार ।  जीव जंतु इंसान पर, घातक किये प्रहार ।।  दुबके दुबके हैं नगर, सिकुड़े सिकुड़े गाँव ।  मिलती राहत धूप में, चुभती है अब छाॅंव ।।  पौधे भी अकड़े पड़े, मचा हुआ कुहराम । चंदा तारों के सहित, रवि को हुआ जुकाम ।।  ओढ़े कंबल धुंध की, प्रकृति खड़ी चुपचाप ।  माफ करो हे शीत जी, अब जाओ घर आप ।।  दिन बीते ये फुर्र से, खिंचती जाती रात ।  गिरती आँगन ओस यूँ, जैसे हो बरसात ।।  ठहरो थोड़ा धूप जी, जाड़ा जाये भाग ।  धरा गगन के बीच में, छिड़े बसंती राग ।।  ©सरोज गुप्ता

नव वर्ष का अभिनंदन ©सरोज गुप्ता

 नव पल में हम नव उमंग से अभिनंदन नव वर्ष करें ।  नव विहान में नव स्वप्नों को  पल्वित कर परिपूर्ण करें ।।  नव युग का निर्माण करें हम मन को नवचेतन बल दें,  भूख, गरीबी, बेकारी को दूर भगा नूतन कल दें, भ्रष्टाचार मिटा करके हम नव भारत निर्माण करें ।  नव विहान में नव स्वप्नों को पल्वित कर परिपूर्ण करें ।।  वो पल फिर आयेगा जब सोने की चिड़िया फिर होगी,  राजगुरु संग भगत सिंह झाॅंसी की रानी फिर होगी, जन्मभूमि के हित के खातिर निज स्वार्थों का बलिदान करें ।  नव विहान में नव स्वप्नों को पल्वित कर परिपूर्ण करें ।।  जब हम स्वार्थ रहित होंगे तब ही नव जागृति होगी, नव रूप मिलेगा स्वप्नों को नव पर, नव आकृति होगी, ( नव पर* नये पंख)  प्रेम भाव के पुष्पों से माँ भारत का श्रृंगार करें ।  नव विहान में नव स्वप्नों को पल्वित कर परिपूर्ण करें ।।   ©सरोज गुप्ता

तुम याद आये ©सरोज गुप्ता

 जब लिये लालिमा गालों पे रक्तिम आँचल को लहराये, जब चली उषा मिलने रवि से कलरव नभ में मधुरिम छाये, तब श्याम से श्यामल संध्या में मनमीत मेरे तुम याद आये ।।  सूरज की स्वर्ण किरण से जब हिमशिखर स्वर्ण सम बन जाये, अस्तित्व पिघल प्रिय बाहों में आलिंगित  होकर  लरजाये,  तब श्याम से श्यामल संध्या में मनमीत मेरे तुम याद आये ।।  बिखरा  के  सिंदूरी  रंगत बेला गोधूलि की जब छाये, पंछी की टोली मस्त मगन नीड़ को निज वापस आये,  तब श्याम से श्यामल संध्या में मनमीत मेरे तुम याद आये ।।  सुरमई श्याम सी रातों में तारों से अंबर भर जाये,  चाँद भ्रमण करते-करते जब छत पर मेरे आ जाये,  तब श्याम से श्यामल संध्या में मनमीत मेरे तुम याद आये ।। ©सरोज गुप्ता