ग़ज़ल ©सरोज गुप्ता

नमन, माँ शारदे 

नमन लेखनी

बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222




मुझे वो खूबसूरत सा, फ़साना याद आता है । 

मिरी ख़ातिर तुम्हारा गुनगुनाना याद आता है ।। 


वो मुझसे प्यार का इज़हार, करने के इरादे से । 

मिरे घर का तेरा चक्कर लगाना याद आता है ।। 


दिलाई थी कभी चूड़ी जो तुमने लाल रंगों की । 

खुशी से चूड़ियों का, खनखनाना याद आता है ।। 


खुले गेसूँ से मेरे खेलना औ उंगलियाँ करना ।

उन्हीं गेसूँ में तेरा जग भुलाना याद आता है ।। 


महकते से ख़तों में इक, खुमारी साथ रहती थी । 

ख़तों को वो क़िताबों में, छुपाना याद आता है ।। 


कभी रूठे अगर तुमसे, हमारी दिल्लगी थी वो । 

मनाना वो तेरा, अपना सताना याद आता है ।। 


न भूली हूँ न भूलूँगी, वो वादे, वो मुलाकातें । 

मुझे मंज़र जवानी का, सुहाना याद आता है ।। 


©सरोज गुप्ता

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