विरह ©अभी मिश्रा
बेरंग थीं उस रोज़ फिज़ाएं, उस रोज़ सुहानी शाम ना थी l एक लम्हा ऐसा ना बीता, जिस पल को घड़ी बदनाम ना थी l वो पास था मेरे इस लम्हे, अगले लम्हे में ना होता l ऐसे हालातों में आख़िर, मैं करता क्या जो ना रोता। उस रोज़ को मैंने सजदे में, बरसों तक रब से माँगा था l एक चेहरे की तस्वीरों को, दिल - ओ - दीवार पे टांगा था। तब वक्त जो दौड़ा जाता था, तुझ बिन अब जैसे ठहरा है l मदमस्त हुआ ...