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विरह ©अभी मिश्रा

  बेरंग   थीं   उस   रोज़    फिज़ाएं,  उस  रोज़  सुहानी  शाम  ना   थी l एक    लम्हा    ऐसा    ना    बीता,  जिस पल को घड़ी बदनाम ना थी l वो   पास   था   मेरे   इस   लम्हे, अगले   लम्हे    में     ना    होता l ऐसे    हालातों      में     आख़िर, मैं  करता  क्या   जो   ना   रोता। उस  रोज़  को   मैंने   सजदे   में, बरसों  तक  रब   से   माँगा   था l एक  चेहरे   की    तस्वीरों    को, दिल - ओ - दीवार  पे  टांगा  था। तब  वक्त  जो   दौड़ा  जाता   था, तुझ बिन  अब   जैसे   ठहरा   है l मदमस्त  हुआ  ...

इंतज़ार ©अभी मिश्रा

  उस नील गगन के अश्रु  को,  मेरा  मस्तक  छू   जाने   दो, फिर  गूँज  उठेंगे  गीत  यहाँ, बरसात का मौसम आने दो। फिर   नई   लताएँ    झूलेंगी,  मरघट  सा  पतझड़  भूलेंगी, बस वक्त को मरहम लाने दो,  बरसात का मौसम  आने दो। फिर से छुप कर के  रो लूँगा,  फिर तुमको होगी खबर नहीं, उस गरज में आह  छुपाने दो, बरसात का मौसम  आने दो। उसमें  ना  मेरा   हित  होगा,  मन भी मेरा विचलित  होगा, चेहरों के रंग  धुल  जाने  दो,  बरसात का मौसम आने दो। फिर जलमय  हर  बस्ती  होगी, और जान भी फिर सस्ती होगी, इस बाँध को बस खुल जाने दो,  बरसात  का  मौसम  आने  दो। मेंढक जब  सब  नाहर  होंगे, और नाग  सभी  बाहर  होंगे, फिर आत्मधैर्य आजमाने दो,  बरसात का मौसम आने दो।                          ©ab...