गज़ल ©सरोज गुप्ता


आज खामोशियाँ कर रहीं गुफ्तगू । 
आ भी जाओ सनम तुम मेरे रूबरू ।। 

आपको इल्म हो या न हो जानेमन । 
मेरी उल्फ़त को है आपकी जुस्तज़ू ।। 

मैंने मांगा नहीं आपसे कुछ सनम । 
पूरी कर दो मेरी आज ये आरज़ू ।। 

आप मशरूफ़ हैं ये हमें है पता ।
ऐसी मसरूफ़ियत अब लगे फ़ालतू ।। 

वो हंसी खो गई आपकी जानेजाँ । 
जो लुटाती रही प्यार की मुश्कबू ।। 

आँख मेरी टिकी देहरी पर सनम । 
आके रख लो सनम इश़्क की आबरू ।।

   ©सरोज गुप्ता

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