ग़ज़ल ©प्रशान्त

 क्या ख़्वाब ख़त्म होंगे 'ख़्वाब-ए-अदम' के बाद ?

फिर इश्क़ में मिलूंगा मैं इस जनम के बाद l


पहली नज़र से बिस्मिल दोनों हुए थे लेकिन, 

हम भी सुकून से हैं, दिल भी ज़ख़म के बाद l


जब इश्क़ कर रहा था तब क्यूँ खिलाफ़ थे वो ? 

जो इश्क़ पढ़ रहे हैं, कागज़-कलम के बाद l


इतने शरीफ़ तो हम पैदाइशी नहीं थे, 

सब ऐब गुम हुए हैं उनकी क़सम के बाद ll


हमको ज़ुदा करेगा अब ये जहान कैसे ? 

हम-रूह बन चुके हैं हम, हम-क़दम के बाद l


मेरा ज़ुदा तलफ़्फुज़, है शख्सियत उन्हीं की , 

मुझको 'ग़ज़ल' लिखा है, मैंने सनम के बाद l


©प्रशान्त

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