कविता- गणतंत्र ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'
नमन माँ शारदे
नमन ,लेखनी
नमन ,लेखनी
जागो प्रिय ! स्वागत करो उठो ,
गणतंत्र द्वार पर आया है l
बाहें पसार सत्कार करो,
जननी ने तुम्हे बुलाया है l
नव स्वर्ण रश्मियाँ वृक्ष शीर्ष,
उद्यान पुहुप नव कुसमित हैँ l
किसलय सर-सर, मृदु मंगल स्वर,
वन लता कुंज अति हर्षित हैँ l
खग कलरव मंगल गान मुदित,
सरि कल-कल धारा का गायन l
नव पल्लव तोरण द्वार सजे,
अलि का अभिनंदन गुंजायन l
लोहित मनहर पूरब लाली,
रवि प्रथम किरण स्वागत पग-पग l
निर्झर उच्छृंखल मुदित नाद,
तृण शीर्ष तुहिन मुक्ता जगमग l
उत्साहित पवन झकोर मंद,
द्रुम दल के संग किलोल करें l
सुरभित झोंके चंदन वन के,
कण-कण में मृदुल सुगंध भरें l
खेतोँ की हरियाली, कछार,
बस्ती, गलियाँ, चौबारों में l
उत्साह पर्व का छाया है,
घर-घर, आँगन, ओसारों में l
सज तीन रंग की चूनर में,
जननी हर्षित मुस्काती है l
हिमगिरि किरीट मस्तक सोहे,
पग सिंधु लहर धो जाती है l
यह पुण्य,देव दुर्लभ धरती,
आओ हम सौ-सौ नमन करें l
इस पावन चंदन माटी को,
गर्वित हों सादर शीश धरें l
बलिदान प्राण कर जिन वीरों,
ने गौरव गीत सुनाया है l
उनको हम करते रहें नमन,
गणतंत्र सँदेशा लाया है l
©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'
अत्यंत उर्जावान एवं प्रभावशाली कविता 💐🙏
जवाब देंहटाएंसादर आभार ,नमन लेखनी 🇮🇳🇮🇳🙏 l
हटाएंअत्यन्त ही सुन्दर और सराहनीय सृजन 🇮🇳🙏
जवाब देंहटाएंस्नेहिल आभार ऋषभ जी 🇮🇳🇮🇳
हटाएंअत्यंत उत्कृष्ट प्रवाह है सर🙏 वंदनीय सृजन
जवाब देंहटाएंAdbhut
जवाब देंहटाएंAdbhut
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