हिंदी दिवस प्रतियोगिता परिणाम

 हिंदी दिवस पर आयोजित छंद लेखन प्रतियोगिता के परिणाम। इस प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रदत्त विधाता छंद पर सभी रचनाकारों ने विधाता छंद पर आधारित सुंदर सृजन कर हमें भेजे। चयन निश्चित रूप से कठिन था। सभी विजेता रचनाकारों को अनंत शुभकामनाएं। सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की शुभकामनाएं💐




रचनाएं एवं रचनाकार



*प्रथम - आ० रश्मि शुक्ल 'किरण' जी*



नमन लेखनी 

विधाता छंद आधारित गीत


मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मान है हिंदी।

अगण इसमें विधाएंँ हैं, गुणों की खान है हिंदी।।


सुग्रंथों में प्रवाहित हो, रही है ज्ञान की गंगा।

करे हर चित्त को निर्मल,मनोबल को रखे चंगा।।

लिखे साहित्य हैं अगणित, अनेकों ही विधाएंँ हैं।

सुवासित ग्रंथ हैं पावन, विदूषी सी ऋचाएंँ हैं।।

प्रवाहित हो रही सुर में,सुरीली तान है हिंदी।

मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मान है हिंदी।।


व्यथित कोमल द्रवित हृद में,बरसता आ गया सावन।

मिले स्वर साथ में व्यंजन,सुघड़ अक्षर हुए पावन।।

खिले नव छंद से उपवन,अनोखी बह रही सरिता।

पहन कर भाव के भूषण, अलंकृत हो गई कविता।।

प्रचुर भंडार शब्दों के,अतुल विद्वान है हिंदी।

मधुर भाषा सहज बोली, हमारा मान है हिंदी।।


नवांकुर को करे पोषित, सुदृढ़ आधार है अपना।

उतर कर शुभ्र पत्रों पर,सजाती नित नया सपना।।

मनोहारी 'किरण' गायन,प्रिए है कर्ण सुखदायक।

क्षितिज के अंक में बैठी,अटल जय हिन्द परिचायक।।

निराला सूर दिनकर की,बनी पहचान है हिंदी।

मधुर भाषा सहज बोली,हमारा मान है हिंदी।।


©️रश्मि शुक्ल 'किरण'


*द्वितीय -  आ० मधु झुनझुनवाला "अमृता" जी*


विधाता छंद आधारित गीतिका 


१२२२-१२२२,१२२२-१२२२


पड़ी मझधार में नैया, नहीं मिलता किनारा है ।

छुपे हो तुम कहाँ केशव, तुम्हीं से आस तारा है ।।


घिरी श्यामल घटाएँ घन, रहे अब छूटता धीरज,

भँवर में डूबता ये मन, करुण हो के पुकारा है।।


कहें भू चाँद तारे नभ, भरो आलोक चहुँदिशि में ,

कृपा हो नेह की माधव,सहारा बस तुम्हारा है ।।


खिले शुभ भोर जीवन में, उदित आदित्य हो उज्ज्वल,

विनय कर जोड़ करता यह, अधम संसार सारा है।।


रहे प्रभु क्षेम इस दिल में, घटे अँधियार पग-पग पर,

धवल हो दीप्तियाँ अंतस, दिखे आलोक न्यारा है।।


झुके यह शीश चरणों में, रखो अनुराग हे गिरधर ,

बड़ा विह्वल हुआ मधु मन, जगत ये मिथ्य कारा है।।


©️मधु झुनझुनवाला 'अमृता' 

जयपुर (राजस्थान)

दि: १७.०९.२०२५


*तृतीय - आ० कामना पांडेय जी*



विधा----विधाता छंद

मात्रा भार -----

1222 1222,1222 1222


                        *गंगा*


लगी  गंगा  नदी खोने,हिमालय भी पिघलता है |

अजब-सा रूप है देखो,सतत् वह भी बदलता है ||


धरा  यह  पुण्य  की कहते,जहाँ पर पाप छाया  है |

अनोखा ताप उपजा कर,दुखद परिणाम पाया है ||

मनुज जो कर्म है करता,लगे उसकी विफलता है |

अजब-सा रूप है देखो,सतत् वह भी बदलता है ||1||


भगीरथ ताप  के  कारण,धरा  पर आप आई थी |

अमिय- सा शुद्ध गंगा जल,बहाकर साथ लाई थी ||

लगे हैं पाप सब धोने, कहां दिखती सबलता है |

अजब - सा रूप है देखो, सतत् वह भी बदलता है ||2||


मिटा  दी  शुध्दता  सारी,बहाकर राख पानी में |

क्षमा भी पा नही सकते,गिराकर साख धानी में ||

किनारा ढूंढते जब हम,निगाहों में तरलता है |

अजब - सा रूप है देखो, सतत् वह भी बदलता है ||3||


               || कामना पांडेय ||

           17/09/2025



*विशिष्ट - आ० कीर्ति मेहता 'कोमल' जी*


विधाता छंद- कन्या


करो सम्मान कन्या का, तभी होगी सफल पूजा।

चरण पूजा करो भक्तों, भवानी रूप सिन्धुजा।।


कभी मत कोख में मारो,  सजा मिलती बड़ी भारी।

क्षमा के पात्र कब होते, जगत जननी वही तारी।।


जगत में लोग है ऐसे, दिखाने को बँधे खूटे।

नवम दिन पूजते कन्या, दशम दिन आबरू लूटे।।


धरा पर बीज कन्या का, हुआ जो नष्ट तो जानो।

सभी कुछ अंत तब होगा, हमारी बात तुम मानो।।


सुनो अब धर्म का सच्चा, यही संदेश है प्यारा।

स्वयं माता बसे कन्या, वही संसार है सारा।।


जहाँ भी जन्म ले बेटी, वहीं संम्पन्नता मिलती।

मिटे अँधियार जीवन का, प्रभासित सौम्यता खिलती।।


जहाँ सम्मान हो कन्या, वहाँ माता कृपा होती।

पिता की लाडली घर में, पिता की आँख का मोती।।

 

©️कीर्ति मेहता"कोमल"


*विशिष्ट - आ० प्रिया 'ओमर' जी*


छंद - विधाता


विषय - सावन 


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सघन  घन  से सजा  अंबर , धरा  भी  मुस्कुराई  है ।

झरोखे  पर  नज़र अपनी , सभी ने  फिर  टिकाई है ।।


भला  पदचाप  किसकी है , हवा सौंधी  महकती है ।

कली थी अनमनी जो कल, कि अब देखो लहकती है।।


दमक  सौदामिनी लाई , विहग कलरव बिखेरे हैं ।

मही  को प्रेम करने को , जलद  सावन  घनेरे हैं ।।


हुआ जो आगमन देखो, विटप सिर को झुकाते हैं।

पपीहा  मोर  बुलबुल  भी , सुरीले  गीत  गाते  हैं।।

 

जगे  उल्लास  आशाएँ , गिरीं बूँदें मनोहर  जब ।

सकल जगती हुई हर्षित,भरीं नदियाँ सरोवर सब ।।


सुमन  सुंदर  नदी  नर्तन , हरे  पल्लव  छटा नूतन।

करे शृंगार  यूँ अचला , हरित साड़ी सुवासित तन।।


©️ प्रिया 'ओमर' (मुंबई)

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