संदेश

ग़ज़ल ©प्रशान्त

 वो कहते हैं कुछ भी नया ही नहीं है । उन्हें इश्क़ अब तक हुआ ही नहीं है । लबों ने छुपाई, नज़र ने बताई , सुना दिल ने वो, जो कहा ही नहीं है । अगर मर्ज़ होता, तो ईलाज़ करता, मुहब्बत की कोई दवा ही नहीं है । तुम्हें लग रहा हूँ मैं मिश्री सा मीठा, मुझे तुमने अब तक सुना ही नहीं है । है शाहों सा रुतबा , मेरे बाद मेरा , विरासत मिली बादशाही नहीं है । क़लम अब नए हाथ में है मगर अब, क़लम में पुरानी सियाही नहीं है । समझदार सरकार चुनकर दिखाओ, ‘बला पाँच-साला’ , तिमाही नहीं है । वतन का सिपाही ग़ज़ल लिख रहा है, ‘ग़ज़ल’ बस ग़ज़ल का सिपाही नहीं है । ~ ©प्रशान्त ‘ग़ज़ल’

कोमल ©तुषार पाठक

 वह मेरी कोमल सी सास है,  वह मेरी कोमल अहसास हैं।  उसकी आँखे है कोमल,  और उसका मन है कोमल,  उसका गुस्सा हैं कोमल सा,  उसकी अदाय है कोमल सी उसकी आवाज़ है कोमल सी,  और उसका चेहरा हैं कोमल सा।  उसकी जुल्फे कोमल सी और उसके मुस्कुराहट कोमल सा।  वह कोमल पंख की तरह हैं,  और उसकी आत्मा कोमल पुष्प की तरह,  उसका नाम है कोमल!          © तुषार पाठक

पड़ता ©रजनीश सोनी

 दरपन  उन्हे  दिखाना  पड़ता। खुद से  भी  बतलाना पड़ता II रिश्ते    बने   रहें,   इससे   ही, मोती  सा   सहलाना   पड़ता। शिथिल काय निष्प्राण न होवे, इसीलिए ,   टहलाना   पड़ता। भौतिकता का बोझ न सम्हले, अब  मन को समझना पड़ता। भैंस  खुशी मन   दूध जो  देवे, उसको  भी  नहलाना  पड़ता। उनके  मन  को  ठेस  न पहुंचे, बुद्धू  भी   कहलाना   पड़ता। कुछ   ओछी   चतुराई   करते,  सबक उन्हें सिखलाना  पड़ता I बड़े  हुए, बच्चों की  ख्वाहिश, उनको  भी   बहलाना  पड़ता। अभी   नवांकुर   है,  प्यारे  हैं, उन  पर  छत्र  लगाना  पड़ता। जीवन   के,   झंझावातों   से, डटकर आंख मिलाना पड़ता। टंटपाल   घोड़ा   जो   बिगड़े, उस  पर  ऐड़  ल...

ग़ज़ल ©गुंजित जैन

 दिलों की कहानी मुहब्बत, हसीं ये बयानी मुहब्बत। जहां में कहाँ पर दिखेगी, मुक़म्मल सुहानी मुहब्बत। रहेगा नहीं एक दिन कुछ, यकीनन गँवानी मुहब्बत। जहां भर के लोगों के दिल में , हमें है बचानी मुहब्बत। बिखरकर कहीं आज फ़िर से, हुई पानी-पानी मुहब्बत। ग़ज़ल, शायरी से ही "गुंजित" सभी को बतानी मुहब्बत। © गुंजित जैन

नज़्म - सच नहीं ©अंशुमान मिश्र

  कि फिर से मैं चला वहांँ जो था तिरा मिरा जहांँ नजाकतों की बारिशें वो हुस्न की नवाजिशें, वो एक मैं, जो था तिरा वो एक तू, जो था मिरा, उन्हें बुला नहीं सका, मैं सब भुला नहीं सका, जो बात थी तेरी मेरी, जो रात थी तेरी मेरी, जो बस अधूरी रह गई, कि थी जरूरी, रह गई घरौंद ख्वाब का जो था महज अजाब का जो था, कि होना जब फना ही था, घरौंद क्यों बना ही था? जो ख्वाब बुन रहे थे हम जो साथ चुन रहे थे हम वो ख्वाब एक जाल था? वो साथ बस खयाल था? जो जाल था, वही सही, खयाल था, वही सही, मुझे उन्हीं में चूर रख, हकीकतों को दूर रख,  इधर निगाह फिर से कर! मुझे तबाह फिर से कर! जो सच न बन सका वही- मैं ख्वाब हूं, मैं सच नहीं, तू ख्वाब है , तू सच नहीं.                     - ©अंशुमान मिश्र

मां की स्तुति ©सौम्या शर्मा

 चारों दिशा में गूंजे, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! कोई दिल से बुलाए तो मैया दौड़ी आए! नमन किसी के भींगे तो मैया कृपा बरसाए! सब जन मिल के लगाएं,जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! दुर्गा,काली,भवानी,तू ही मां कल्याणी! चामुण्डा भी तू ही ,तू ही जग महारानी! हर लेगा दु:ख सारा, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! चारों दिशा में गूंजे, जयकारा मां का! भक्तों का है सहारा, जयकारा मां का! ©सौम्या शर्मा

ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

 भरोसा है जिन्हे खुद पर,खज़ाने छोड़ देते हैँ l परिंदे पेट भर जाए........तो दाने छोड़ देते हैँ l हवाएं नीम की,आँगन से अक्सर पूछ लेती है... घरों के लोग कैसे घर पुराने छोड़ देते हैँ l वो गलियाँ गाँव की,शादाब बचपन की हसीं यादें.. शहर की चाह मे मौसम सुहाने छोड़ देते हैं l वो जिनके आ चुके हैँ आग की ज़द में कभी दामन.. वो अक्सर दूसरों के घर जलाने छोड़ देते हैँ l कहाँ हैं,ज़िन्दगी में हर कदम जिनकी जरूरत है .... गुज़र जाते हैं दुनियाँ से,फ़साने छोड़ देते हैँ l बुलंदी की हवस में,'रिक्त' मैं हैरान हूँ कैसे ... न जाने लोग क्यूँ गुज़रे जमाने छोड़ देते हैँ l ©रिक्त