संदेश

सुख़नवर निकलेंगें © हेमा काण्डपाल

 अनवर,अव्वल और सुख़नवर निकलेंगें मेरे  बच्चे  मुझसे  बेहतर  निकलेंगें इक फूटी गागर से सागर निकलेंगें मेरे हर मिसरे से  लश्कर निकलेंगें कव्वा प्यासा मर जाएगा कलयुग में और घड़े में केवल कंकर निकलेंगें मिट्टी में मिल जाएगी जब ये दुनिया फिर इकबारी ओम से शंकर निकलेंगें ऊँचे लोगों की है ये फ़ीकी महफ़िल हम इक दो ग़ज़लें पढ़कर घर निकलेंगे  हँसते गाते सुंदर औ रंगीं चेहरे पास से देखोगे तो बंजर निकलेंगें बैठे  होंगे   रस्ते  में   दीदार  को  वो  हम भी घर से आज घड़ी भर निकलेंगे वर्षों पहले कोई शायर कहता था आने वाली नस्लों के पर निकलेंगें इतना विकसित हो जाएगा डी एन ए  देखना अब के पैरों से सर निकलेंगें   © हेमा काण्डपाल 'हिया'

शहर में आ रही हो ©गुंजित जैन

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 तुम शहर में आ रही हो, ट्रैन में इक, बैठकर के, कुछ नए लम्हें बनाकर, इस सफ़र में, इस सफ़र के। भा रही हैं ये हवाएँ, आज मौसम दिलकशी है, इस ख़बर को सुन के मेरे, सुर्ख़ गालों पर खुशी है। दिलनशीं सी खुशबुएँ हैं, बागबाँ दिल में खिला है, हर दुआ पूरी हुई है, फल ये सजदों का मिला है। धड़कनें धीमी रहेंगी, जब नज़र को तुम दिखोगी, साथ होगा अब तुम्हारा, हर छुअन महसूस होगी। मैं बखूबी जानता हूँ, तुम मुझे क्या मानती हो, घर सजा मैंने रखा है, बात ये क्या जानती हो? सोचकर तुमको ज़हन में, बेवजह मुस्का रहा हूँ, मुझको सब कुछ भा रहा है, मैं सभी को भा रहा हूँ। पेड़ के साये में चलकर, दूरियाँ हर नाप लेंगे, आसमाँ देखेंगे मिलकर, इन पहाड़ों पर चलेंगे। रख रखी है वो मिठाई, जो पसंदीदा तुम्हारी, हर कहीं खोजूँ तुम्हें मैं, हाय! कैसी बेक़रारी। चैन आएगा मुझे अब, सामने जब देख लूँगा, ज़िन्दगी के कुछ पलों में, ज़िन्दगी इक जी सकूँगा। रात की ये चाँदनी भी, रात-रानी सी खिलेगी, धड़कनें गुंजित के दिल की, आज गुंजित से मिलेगी। चंद हर्फ़ों की ज़मीं पर, बादलों सा छा रही हो, आज पहली बार मिलने, तुम शहर में आ रही हो। ©गुंजित जैन Click Here For Watch I...

बजरंग वंदना ©दीप्ति सिंह

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  छंद: मधुमालती  प्रत्येक चरण 14 मात्रा  पाँचवी एवं बारहवीं मात्रा लघु  चरणान्त रगण सुत केसरी सुत अंजना,करते तिहारी वंदना । बजरंग मारुति नंदना, करते तिहारी वंदना ।। श्री राम उर में सोहते, हनुमान हिय को मोहते। माँ जानकी प्रभु संग में, अंतर बसे बजरंग में । यह रूप दर्शन कामना, करते तिहारी वंदना ।। अपनी कृपा प्रभु दीजिये, संकट हमारो लीजिये। बजरंग अब तो रीझिये, स्वीकार विनती कीजिये। दारिद्र दुख भय भंजना,करते तिहारी वंदना ।। प्रभु आपका वरदान है,तो श्वास भी गतिमान है । हम आपकी संतान हैं, अंतर बसा अज्ञान है । कीजै प्रकाशित चेतना,करते तिहारी वंदना ।। तम जाल पर संधान हो,नव काल का निर्माण हो। प्रभु पथ प्रकाशित ज्ञान हो,सन्मार्ग पर उत्थान हो। है आपसे प्रभु याचना,करते तिहारी वंदना ।। © दीप्ति सिंह "दीया"

ग़ज़ल-नादाँ ©संजीव शुक्ला

 ज़िंदगी की जा-ब-जा फ़र्माइशों का क्या करें l वक्त की बेवक्त की इन..बारिशों का क्या करें ll साफगोई की बुरी फितरत से जो हासिल हुईं...  जा-ब-जा नाइत्तिफाकी,रंजिशों का क्या करें ll है हमारी ज़ुस्तज़ू ........... आवारगी नादानियाँ....  हैं अगर नादाँ तो हैं,हम दानिशों का क्या करें ll रास आता ही नही हमको कतारों का चलन....  साथ हैं पर कारवाँ की बंदिशों का क्या करें ll हैं परिंदे तो परिंदे...... गर कफस में हैं तो क्या... तिश्नगी परवाज़,उनकी ख्वाहिशों का क्या करें ll रास आयी जुगनुओं की मुख़्तसर सी रोशनी.... झील में  उतरे हज़ारों  महवशों का क्या करें ll "रिक्त"ठंडी बारिशों की.......चाहतें ले उम्र भर.... दम ब दम दिल में सुलगती आतिशों का क्या करें ll ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

बजरंग बली ©लवी द्विवेदी

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 जय कपीस जय वायु सुत जय आदिक अभिराम,  जय हनुमादिक रामप्रिय जय श्री कोटिहि काम।  मंगलमूरति राम को मानत पावन धाम,  जय बलवंतहि संतही जय जय जय प्रभु राम।  दुर्मिळ सवैया छंद बजरंग बली जिन तेज प्रताप महामुनि भक्ति सुधारस जे,  मुख कंज ललाट अलौकिक जे दृग देह विशाल कपी सुत के।  प्रभु प्रीति प्रतीति जगी मन सो प्रभु बाल कथा तिंहु अर्पण हे,  सुमिरौं पुनि बारमबार प्रभू जिन हीय बसे प्रभु राम सिये। सुत अंजनि कुंतल रूप रहे, प्रभु खेलत बेर कदम्बन में,  नित तोड़त थे मधु सस्य बली छिन हास्य रचे कपि आनन में। सहमित्र सखा लिय नित्य प्रभू रज रोज उचारत द्वारन में,  चलि चाल मनोहर पैजनि जे छनकार रही लय नूतन में।    प्रभु एक दिवा उठि भोर परे नहि मातु दिखी गृह आँगन में,  प्रभु केर क्षुधा अति तीव्र भई पर मातु नही जिंह भोजन दे।  सहि जात न भूख महाबलि से फल खोजि रहे दुइ नैनन से,  कछु लाल दिखा हिय आस जगी अति सुंदर सस्य कहाँ अरु हे।  प्रभु कीन्ह विचार मिलै फल जो घनघोर क्षुधा कर त्रास मिटै,  सकुचात नही कपि केरि क्षुधा बस कन्द मिलै भवबंद्ध...

चलना होगा ©शिवाँगी सहर

 सोच  कर घर  से  जब चला  होगा, जानता   ही  नहीं  कि  क्या  होगा। हो हक़ीक़त से  तुम  नहीं  वाकिफ़, ये  ग़लत  है  कि  सब  पता  होगा। जिसका  सच कटघरे  में  आया है, झूठ  शायद   कभी   कहा   होगा। यूँ  बहुत  सख़्त था वो  आदम पर, भावनाओं   में   बह   गया   होगा। दर्द   में   भी  जो   मुस्कराता    है, कितना अंदर  से  वो  भरा  होगा। मेरा   लिक्खा   हुआ  पढ़ा   उसने, ये   गलत    आपने   सुना   होगा। आँसुओ का  असर नहीं जिस पर, शख्श  पत्थर का फ़िर बना होगा। मील  पैदल  चला   सदा  सुनकर, कैसा  दिल को  भरम हुआ होगा। चाह  कर भी  न  माफ़ कर  पाए, उम्र  भर  एक  यही  गिला  होगा।   ...

छंद- श्रीकृष्ण ©रानी श्री

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 अदित्य नंदलाल विष्णु अच्युतं प्रियं भवं लला यशोमती च नंद श्याम वर्ण केशवं। हिरण्यगर्भ देवकी सुतं च देव नंदनं अनंतजीत माधवं नमामि प्रेम वंदनं। प्रियं मुखं प्रियं सुखं अनंत संग गोपिका  गृहं तु गोकुलं अनंतजीत राज्य द्वारिका। कलिंदजा तटे प्रमोद ग्वाल संग मोहनं चतुर्भुजं च धेनु दृश्य एक एव शोभनं।  कलादि षोडशं प्रवीण कृष्ण कांति सुंदरं मयूर पंख साज वेणु वाद रुक्मणी वरं। बकासुरं च पूतना च कंस काल तारकं निपात कालिया च पर्वतं कनिष्ठ धारकं। समीर अंबरं च पावकं जलं धरा सदा करं शुभं सुदर्शनं,सरोज,शंखकं गदा। वदामि सारथी रथं उपेन्द्र अर्जुनं कथा नमामि त्वं भजामि त्वं इदं परम् सुखं प्रथा। ©रानी श्री Click Here For Watch In YouTube