ग़ज़ल ©सूर्यांश सिंह 'कालख'

 नमन माँ शारदे

नमन लेखनी

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212




चल पड़ा दरिया तो पीछे–पीछे बहकर आ गए,

खुद को जो पर्वत समझते थे ज़मीं पर आ गए।


मिल गया मुझको तो गाँधी सी वफादारी का फल,

मेरे आँगन में हर इक मज़हब के पत्थर आ गए।


ये मिजाज़–ए–मंज़िलत बेकार साबित हो गई,

क्यों जहां से हम चले थे फिर वहीं पर आ गए?


क्या बताएं रास्ता कैसा था वो मंज़िल थी क्या?

बस ये समझो शुक्र है हम लौट कर घर आ गए।


देख ‘कालख’ दोस्ती–यारी है ना यूं मसखरी,

वो उठा तो हम भी उस महफ़िल से बाहर आ गए।


©सूर्यांश सिंह ‘कालख’

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