ग़ज़ल ©सूर्यांश सिंह 'कालख'
नमन माँ शारदे
नमन लेखनी
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
चल पड़ा दरिया तो पीछे–पीछे बहकर आ गए,
खुद को जो पर्वत समझते थे ज़मीं पर आ गए।
मिल गया मुझको तो गाँधी सी वफादारी का फल,
मेरे आँगन में हर इक मज़हब के पत्थर आ गए।
ये मिजाज़–ए–मंज़िलत बेकार साबित हो गई,
क्यों जहां से हम चले थे फिर वहीं पर आ गए?
क्या बताएं रास्ता कैसा था वो मंज़िल थी क्या?
बस ये समझो शुक्र है हम लौट कर घर आ गए।
देख ‘कालख’ दोस्ती–यारी है ना यूं मसखरी,
वो उठा तो हम भी उस महफ़िल से बाहर आ गए।
©सूर्यांश सिंह ‘कालख’
वो उठा तो हम भी उस महफ़िल से बाहर आ गए...क्या कहने...। उम्दा ग़ज़ल है।
जवाब देंहटाएंवाह बेहतरीन ग़ज़ल 💐
जवाब देंहटाएंवाह, क्या ही बेहतरीन और शानदार ग़ज़ल 👏👏👌👌
जवाब देंहटाएंबेहतरीन गज़ल सूर्यांश जी
जवाब देंहटाएंवाह शानदार!
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत ग़ज़ल ✨👏
जवाब देंहटाएं