ग़ज़ल ©रानी श्री

नमन, माँ शारदे

नमन लेखनी



अनोखे शौक़ हैं जो भी जँचा वो चाहिए उनको,

हमें तो नाम तक मालूम ना जो चाहिये उनको।


न ऐसी चीज़ की ख़्वाहिश सजा कर जो सज़ा दे दे 

अजी जो ठान लेते हैं ,मज़ा सो चाहिए उनको।


जिन्हे मालूम ही ना हो के मेहनत चीज़ ही क्या है ,

ज़रा पैसे उड़ाने का सुकूं तो चाहिए उनको ।


ज़माना नाचता फिरता रहे जिनके  इशारों पर ,

रिवायत या रियायत ,ज़िद्द कह लो चाहिए उनको ।


यहां शेरों पे तारीफ़ें नहीं मिलती हमें रानी,

वहां तारीफ़ सारी एक ही को चाहिए उनको । 


©रानी_श्री

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आञ्जनेय छंद - हनुमान वंदना ©रश्मि शुक्ल 'किरण'

वो दौर ©सूर्यम मिश्र

अक्सर भूल जाते हैं ©दीप्ति सिंह

लेखनी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ काव्य पाठ एवम मिलन समारोह ©अंजलि