ग़ज़ल ©संजीव शुक्ला

 


कोई टूटा हुआ गुलदान बनकर देख लेना ।

कभी बेकार सा सामान बनकर देख लेना ।


नसीहत हर कदम पर खुद-ब-खुद मिलने लगेंगी..

किसी दिन बस ज़रा नादान बन कर देख लेना ।


चले आएंगे पीछे लोग जितना दूर जाओ..

किसी सहरा में नखलिस्तान बन कर देख लेना ।


नए हर रास्ते पर जा-ब-जा काँटे मिलेंगे..

हमारी राह से अनजान बनकर देख लेना ।


नया मिसरा कोई जो भी सुनेगा जोड़ देगा..

अधूरी नज़्म का उन्वान बन कर देख लेना ।


मिलेगी तालियाँ हर बात पर ये सोचना मत..

सुखनवर हो कभी इंसान बन कर देख लेना ।

©संजीव शुक्ला 'रिक़्त'

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