ग़ज़ल ©दीप्ति सिंह 'दीया'

राधेश्याम 

नमन,माँ शारदे

नमन, लेखनी

बहर -122  122  122  122



तेरी नेमतों से शिकायत नहीं है,

मगर ख़ुश रहें ये भी हालत नहीं है।  


सज़ा बेक़सूरों को भी मिल रही है ,

जो उनपे तुम्हारी इनायत नहीं है। 


है महरूम इंसानियत आदमी से,

कि अब आदमी  से मुहब्बत नहीं है।  


शिकायत तुम्हारी कहाँ लेके जाएँ ,

कि तुमसे बड़ी तो अदालत नहीं है । 


सदा रौशनी हो जो "दीया" जलेगी,

कि ये तीरगी दिल की फितरत नहीं है।  


©दीप्ति सिंह 'दीया'

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