ग़ज़ल ©गुंजित जैन

 मुहब्बत का ग़मगीन अंजाम करके,

अधूरी मिरी हर सहर-शाम करके।


वफ़ा की हवा अब महकती नहीं है,

शज़र जा चुका ख़ल्क़ बेनाम करके।


गया छोड़कर यूँ अकेला मुझे वो,

मिरे नाम हर एक इल्ज़ाम करके।


जहां में कमाई रक़म खूब उसने,

मुझे रोज़ महफ़िल में नीलाम करके।


तलाशे उसी को ज़माने में गुंजित,

मगर नाम अपना यूँ गुमनाम करके।

©गुंजित जैन

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