सूर्य ©सौम्या शर्मा

 सूर्य रक्तिम लालिमा का,

खिल उठा देखो गगन में ।


नित्य अँधियारी निशा में,

अनवरत श्रमदान करता ।

शांत रहकर वह निरन्तर,

लक्ष्य हित संधान करता।

आज देखो जगमगाता,

वह ज्वलित हो निज अगन में ।


सौम्य पग को कंटकों ने ,

रक्तरंजित कर दिया था ।

किंतु था चट्टान सा वह,

पूर्ण प्रण उसने किया था।

है असम्भव कार्य सम्भव,

यदि पिपासा हो लगन में ।


थी लगन उसकी अनोखी,

यह स्वयं उसने किया था।

लक्ष्य हित तन-मन समर्पित  ,

लक्ष्य हित जीवन जिया था ।

यज्ञ जीवन को समझकर,

प्राण अर्पित हो हवन में ।


आज देखो खिलखिलाता,

तेज से चमका सुआनन ।

स्वेद जिसको शुष्क करते,

कर द्रवित सकते न पाहन!

वह नहीं रोता नियति पर ,

जो नहीं सोता भवन में ।


सूर्य रक्तिम लालिमा का!

खिल उठा देखो गगन में!

©सौम्या शर्मा

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