गीतिका ©विपिन बहार

 जीवन मे तूफान बहुत है ।

जीने में नुकसान बहुत है ।।


सब दिखते बरसाती मेढक ।

कहने को इंसान बहुत है ।।


पीड़ा,आसूँ, चाहत,धोखा ।

मरने का सामान बहुत है ।।


भूख,गरीबी खालीपन की ।

आपस मे पहचान बहुत है ।।


खुद को समझे खुदा सरीखा ।

मानव को अभिमान बहुत है ।।


आओ बहनों रौशन कर दो ।

घर मेरा सुनसान बहुत है ।।


कौन सुनेगा भूखें मन की ।

वैसे तो दीवान बहुत है ।।

   ©विपिन बहार

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