सलीका © रजनी सिंह

 अपनों की आग से छुपता मेरा सलीका ।

ड़रा सहमा सा है लुकता मेरा सलीका ।।


तसलसुल ख़िज़ां से उबता मेरा सलीका....

एतिमाद आंच पे पकता मेरा सलीका ।


पयम्बरों के सहीफे जैसा मेरा सलीका....

जहानें ज़ीस्त में फैलता मेरा सलीका ।


हनूज नहीं रो पाया जो मेरा सलीका....

रोज-ओ-शब है तड़पता मेरा सलीका ।


तुर्बत में अब ये जाएगा मेरा सलीका....

गर्दिश के कूचे निकलता मेरा सलीका ।।


तस्कीन से बंधे कब तक मेरा सलीका....

खालीक से सवाल पूछता मेरा सलीका ।।

                                                 @ रजनी सिंह 




टिप्पणियाँ

  1. आप सभी का हृदयतल से धन्यवाद

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