कहानी- तस्वीर ©गुंजित जैन
नमन, माँ शारदे
नमन, लेखनी
"एक किताब ने हिलाकर रख दिया पूरा शहर।" सभी न्यूज़ चैनल इसी खबर से भरे पड़े थे। और हों भी क्यों न? किताब ही ऐसी थी। "बेस्ट सेलर तो यही होगी" आम आवाम में बस यही बातें चल रहीं थी। दीन दयाल जी, उस किताब के लेखक, रातों रात प्रसिद्ध हो गए। दीन दयाल जी हमेशा से एक उम्दा लेखक रहे हैं मगर उनकी प्रतिभा लोगों तक पहुँच नहीं पाई। जीवन के पैंसठ सावन बीत जाने के बाद उन्हें ये प्रसिद्धि मिली जिसकी उन्हें हमेशा से आशा रही थी। किन्तु कहा जाता है न, असल हुनर दबा दिया जाता है, कुछ वैसा ही हाल यहाँ था। लेकिन इतनी प्रसिद्धि पाने के बाद भी वे उदास थे। जाने क्या बात रही होगी, किसी को मालूम नहीं था। सिर्फ़ उस बूढ़े लेखक का दिल ही जानता था।
"रातों रात प्रसिद्ध हुए हैं, ज़रूरी तो नहीं अच्छे लेखक हों। इनका इंटरव्यू लेने की जगह और कुछ बेहतर शूट न किया जाए?" रिपोर्टर वाणी जी अपने चैनल के दफ़्तर में अपने सीनियर को बार-बार दीन दयाल जी का इंटरव्यू लेने से मना कर रही थी। "नहीं वाणी, इस बूढ़े ने शहर हिला दिया है। बढ़िया, गरम गरम खबर है। दुनिया को बेहतर खबरों से ज्यादा गरम खबरें रास आती हैं, और ये काम सिर्फ़ तुम ही कर सकती हो। समझो बात को, जाओ। और इंटरव्यू लेकर ही लौटना" कहकर, बड़ी मशक्कत कर के वाणी जी को इंटरव्यू लेने भेज दिया गया।
"पता नहीं कौन, कैसा बुड्ढा होगा।" मन ही मन ये सोचती हुई वाणी जी, दीन दयाल जी के घर पहुँची। पत्रकारिता में छः वर्ष का तजुर्बा और जीवन में तीस वर्ष का तजुर्बा लिए वाणी जी उस घर के बाहर खड़ी घर की स्थिति देख रही थी। "अब तक कई इंटरव्यू लिए, पर ऐसा खंडहर घर अब तक नहीं देखा। शायद सिर्फ़ किताब ही प्रसिद्ध हुई है, लेखक नहीं। सर ने भी कहाँ फँसा दिया यार!" कहकर अपने सीनियर को कोसने लगी। वाकई, घर खंडहर हो चुका था। पपड़ी मारती दीवारें, सीलन भरी छत, जंग लगे दरवाज़े... ये सब देखकर ही किसी का मन न करे अंदर जाने को। "यहाँ कोई कैसे रह सकता है" अपनी नाक पर सीलन की गंध और धूल से बचने के लिए दुपट्टा रख वाणी जी दरवाज़े को बजाने लगी। दो तीन बार बजाने के बाद अंदर से दरवाज़े की ओर बढ़ते धीमे कदम उन्हें सुनाई देने लगे। दरवाज़ा खुला। झुर्रियों भरा एक चेहरा, भूरे फ्रेम की एक एनक, पीले रंग की सादी आधे बाँह की शर्ट और ढीला सा सफेद पायजामा। सभी बुजुर्ग एक जैसे ही लगते हैं। एक ओर पत्रकार की आँखें उस बूढ़े लेखक को एकटक देखकर उसके स्वभाव का अनुमान लगाने की कोशिश कर रही थी और वहीं दूसरी ओर एक लेखक की आँखें जो एक नज़र में सब भाँप लेती हैं। काँधे पर चैनल के नाम वाले बैग को देखकर ही दीन दयाल जी जान गए थे कि एक पत्रकार है। चेहरे के हाव-भाव से स्पष्ट था कि यह पत्रकार अपनी इच्छा से यहाँ बिल्कुल नहीं आई है।
"क्या चाहिए" उन्होंने पूछा।
"जी सर आपका इंटरव्यू लेना था" वाणी जी ने कहा।
"नहीं देना मुझे कोई इंटरव्यू। चले जाओ यहाँ से।" ज़रा खीझते हुए उन्होंने कहा और उनके मुँह पर ही दरवाज़ा बंद कर दिया।
"ये खुदको समझते क्या हैं? इस खंडहर मकान में इस खंडहर इंसान का इंटरव्यू लेने आई हूँ, और इनके तेवर तो देखो!! नहीं देना इंटरव्यू? ऐसा कौनसा अधिकारी है। इतने तेवर किस बात के??" वाणी जी भी ज़रा गर्म स्वभाव की थी। गुस्सा नाक पर ही चढ़ा रखा था जो बात-बात पर नाक से उतरकर जीभ पर आ जाता था। वापस लौटने ही वाली थी कि उन्हें अपने सर की बात याद आई कि इंटरव्यू लेकर ही लौटना। तो बिना मन के भी उन्हें फिर दरवाज़े पर दस्तक देनी पड़ी।
फिर कदमों की आहट सुनाई दी और दरवाज़ा खुला।
"कहा न नहीं देना इंटरव्यू, जाती क्यों नहीं?" ज़रा गुस्से में आते हुए वो बोले। "सर प्लीज़ सर। मेरी नौकरी का सवाल है। इंटरव्यू लेने दीजिए।" कहती हुई वाणी जी हाथ जोड़ने लगी। शब्दों की विनम्रता और वाणी जी की मजबूरी ने दीन दयाल जी के लेखक हृदय में संवेदना जगाई, और वो इंटरव्यू देने को तैयार हो गए।
एक कमरे और एक रसोई के उस खंडहर में ऐसा कोई कमरा नहीं था जिसे बैठक कहा जाए। अतः उसी एक बिखरे कमरे के सामान को अपने कमज़ोर हाथों से सरकाते हुए दो लोगों की बैठने की जगह कर दीन दयाल जी ने वाणी जी को वहीं बुला लिया।
"आपके सिवा घर में कौन-कौन हैं?" वाणी जी के पहले ही प्रश्न ने उनको उदास कर दिया। मानो किसी ने भरता हुआ ज़ख्म कुरेद दिया हो। "घर में? रहा ही कौन है घर में? हुआ तो करता था, मेरा पोता, कुछ दिन पहले तक। बेटा, बहु और पत्नी तो बहुत पहले ही चले गए। एक वही तो सहारा था। पर अब..." कहते हुए उनकी आँखें नम हो गईं।
"सुनकर बहुत दुख हुआ कि आपका पोता नहीं रहा।" कहती हुई वाणी जी की आवाज़ में भी दुख छा गया।
"मालूम नहीं, रहा है या नहीं!"
"मालूम नहीं? मतलब"
"मतलब मरा नहीं था। बीते सावन के मेले में उसके साथ गया था। खिलौने देखकर ज़िद करने लगा। बच्चो की ज़िद कहाँ तक रोकें? उसे कहा कि यहीं रुक मैं लेकर आता हूँ। खिलौने लेकर आया तब तक..." आवाज़ में दर्द स्पष्ट सुनाई दे रहा था।
"तब तक?"
"आने के बाद वो नहीं मिला। आज तक नहीं मिला"
"नहीं मिला? तो आपने पुलिस में रिपोर्ट नहीं करवाई"
"नाम मत लो उनका। ये सरकार के और लोगों के सेवक होने का दावा करते हैं, पर सब के सब सिर्फ़ अमीरों के नौकर हैं।" अचानक दुख से भरी आँखों में गुस्सा भर आया।
"ऐसा क्या हुआ सर?" वाणी जी ने मन में दुविधा लिए पूछा।
दीन दयाल जी को वो दिन याद आ गया। पोते को खोए पूरा एक दिन हो चुका था। अपने स्तर पर वो हर प्रयास कर चुके थे। फिर आशा की ज्योत जला पुलिस थाने आये।
"साहब, मेरा पोता साहब। मेरा पोता साहब"
"अरे क्या हो गया चचा? क्यों दहाड़ रहे हो" एक मोटा हवलदार बोल पड़ा।
"साहब मेरा पोता...खो गया...मेरा पोता...साहब" हाँफते हुए वो बोले।
"हाँ ठीक है ठीक है, बैठ जाओ, थानेदार साहब खाना खाने गए हैं, आएंगे तब बताना। वहाँ बैठ जाओ" एक कोने में लगी बेंच की तरफ इशारा करते हुए हवलदार बोला। वो बैठ गए।
दोपहर के खाने से शाम की चाय का समय हो गया। चाय वाला चाय देने पहुँचा।
"साहब थानेदार साहब कब आएंगे?" उन्होंने सवाल किया।
"अरे चचा, सरकारी दफ्तरों में आदमी बाद में आते हैं, चाय पहले आ जाती है।" कहता हुआ हवलदार अपनी तोंद थिरकाते हुए हँसने लगा। दीन दयाल जी वैसे हँसमुख स्वभाव के थे। शायद इस बात पर हँसते, पर उस वक़्त इस मनोदशा में नहीं थे कि हँस पाएं।
दो तीन घण्टों के बाद मुँह में गुटखा चबाते हुए थानेदार साहब आ रहे थे। उनके हाव-भाव से स्पष्ट था कि वो शिकायत सुनने से ज्यादा गुटखा खाने को इच्छुक हैं।
"साहब मेरा पोता, खो गया साहब। मेले में साथ ही था, मैं दो मिनट कुछ लेने क्या गया। इतने में खो गया।" बुजुर्गों की काँपती आवाज़ में दुख और काँपता सा सुनाई देता है।
"उहहुँ! बच्चे को छोड़कर काहे जाते हो। कोई तस्वीर है?"
"हाँ साहब एक तस्वीर है। ये रही। ढूंढ दीजिए। मेरे जीने का सहारा वही है।" कहते हुए वो तस्वीर दिखाने लगे।
"हवलदार, ये लो तस्वीर, और एफ आई आर बना दो।" तस्वीर हवलदार की ओर करते हुए थानेदार साहब बोले।
"सुनो चचा, वो हम कह रहे थे कि ज्यादा जल्दी हो अगर खोजने की, तो तनिक जेब हल्की कर दो। हम अभी भेज देते हैं चार हवलदार बच्चे की खोज में। वरना शहर भर के इतने केस में आपका मामूली सा केस कब निकलेगा...समझ रहे हो न चचा?" थानेदार ने दीन दयाल जी से कहा। दीन दयाल जी वहीं बिखर गए। पूरे जीवन में उन्हें गरीबी उतनी नहीं काटी जितनी उस दिन। इस वक़्त उन्हें अपनी खाली जेब एक आँख नहीं भा रही थी। उन्होंने तुरंत हवलदार के हाथ से तस्वीर खींची और निकल गए।
"कैसा बदतमीज़, बेवकूफ बुड्ढा है। इसके ही फायदे की बात कर रहा था मैं तो। हवलदार, एफ आई आर फाड़ दो। और देखना दोबारा आने न पाए ये यहाँ" थानेदार बोला।
निकलते निकलते दीन दयाल जी सोचते रहे, कि ये कैसा लोकतंत्र, ये कैसी व्यवस्था जो सिर्फ़ अमीरों के लिए ही है। और अपने पोते की तस्वीर देखकर रोने लगे।
"सर...?" वाणी जी बोल पड़ी। दीन दयाल जी विचारों में जितना ज्यादा बोल रहे थे वास्तविकता में उतना ही कम। जाने कितनी देर से मौन पसरा हुआ था।
उन्होंने पूरी बात वाणी जी को बताई।
"ये तो वाकई बहुत गलत हुआ। ऐसा नहीं होना चाहिए था।
वैसे आपके पास तस्वीर थी तो आपने खबर अखबार में नहीं छपवाई?"
"अखबार? वही अखबार जिसके पास दुनिया भर की उल्टी-सीधी खबर छापने को जगह है पर एक गरीब की पुकार छापने को तिनका भर जगह नहीं?" कहते हुए उनके चेहरे पर गुस्से और निराशा के मिश्रित भाव आने लगे।
उन्हें पुलिस थाने से निकलने के बाद की घटना याद आ गई। तस्वीर देखकर वो रोने लगे, पर उनकी समझदारी ने इस मुश्किल परिस्थिति में भी दम नहीं तोड़ा था। उनके दिमाग में विचार आया कि क्यों न लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ, पत्रकारिता का सहारा लिया जाए। और पोते के खोने की खबर उसमें छपवाई जाए। निश्चित ही उसे देखकर कोई न कोई उनके पोते को उनके पास ले आएगा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। अपने आँसू पौंछते हुए वो शहर के सबसे चर्चित अखबार, "आम-जन पत्रिका" के दफ्तर पहुँचे। उन्होंने अपने पोते के खो जाने की बात वहाँ के मुख्य एडिटर को बताई। जानकर उन्होंने दुख प्रकट किया। और पोते की तस्वीर रख जाने को कहा, "कल के अखबार में हम इसे छापने का प्रयास करेंगे, आप फिक्र न करें" कहकर उन्हें जाने को कहा। दीन दयाल जी ने तस्वीर रखी और जाते हुए राहत की साँस ली, इस उम्मीद के साथ कि शायद जल्द ही उनका पोता उन्हें मिल जाए।
अगले दिन का अखबार खँगालने पर जब उन्हें पोते की खबर नहीं मिली तो दोबारा वो अखबार के दफ्तर पहुँचे। दरवाज़े से घुसे ही थे कि एक कागज़ का टुकड़ा उनके पैरों के नीचे आया। पैर हटाकर, उसे उठाकर देखा तो पाया कि यह उनके पोते की तस्वीर है। दीन दयाल जी फिर बिखर गए, और एडिटर साहब के पास वो जूतों के निशानों से भरी तस्वीर लेकर पहुँचे।
"साहब आपने तो कहा था कि खबर छपेगी..?"
"क्षमा करना दीन दयाल जी, दरअसल अखबार में जगह नहीं बची थी।" कहते हुए एडिटर साहब अपने कोरे कागज़ से दामन पर लगे धब्बे साफ़ करने लगे।
"सर, सर... कल जो हमने फ़िल्म अभिनेता के ढाई करोड़ के जूतों वाली खबर फ्रंट पेज पर बड़ी साइज में छापी थी न, वो और किसी अखबार में नहीं थी। देखना इसके कारण अपना अखबार सबसे ऊपर बना रहेगा!!" कहता हुआ एक कर्मचारी खुशी से एडिटर साहब के कमरे में घुसा आ रहा था। शायद उसे अनुमान नहीं था कि एडिटर साहब अकेले नहीं है। एडिटर साहब जिस दामन को साफ करने की कोशिश कर रहे थे, उसपर उस कर्मचारी ने मानो रंग भरी पिचकारी चला दी हो।
"कितनी बार कहा है नॉक करके अंदर आया करो।" कहकर एडिटर साहब कर्मचारी को फटकारने लगे।
दीन दयाल जी यह बात सुन एकदम शून्य भाव लिए, वो जूतों की निशान वाली तस्वीर लिए उठकर जाने लगे।
"रुकिए, दीन दयाल जी, रुकिए" एडिटर साहब के शब्द मानो दीन दयाल जी के कान तक पहुँच ही नहीं रहे थे।
अमीरों के जूते भी दुनिया माथे पर सजाकर रखती है, और गरीब... उसकी तस्वीर भी उसकी ही तरह पैरों तले रौंदी जाती है!! यही सब बातें सोचते हुए दीन दयाल जी अब हर उम्मीद खो चुके थे। अब वो ईश्वर से भी किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं कर रहे थे। क्या पता ईश्वर भी अमीरों का ही हो।
"सर...? जगह नहीं मतलब? सर?" वाणी जी ने फिर उन्हें वर्तमान में ला दिया। पता नहीं कितनी देर मौन फिर से पसरा रहा था। दीन दयाल जी ने वाणी जी को पूरी बात बताई।
"ये तो बहुत बुरा हुआ सर आपके साथ।"
"और इन सबके बाद घर आकर मैंने अपने सब भाव कागज़ पर उतारने शुरू किए। और शीर्षक दिया 'गरीबों की तस्वीर'। किताब छपवाने के तो क्या ही पैसे होते मेरे पास! लिखकर इन कागजों को रद्दी में बेचने ही जा रहा था कि एक सज्जन मिले जो किसी प्रकाशन के अध्यक्ष थे। बेच ही रहा था कि उनकी नज़र इस शीर्षक पर पड़ी। देखते ही उन्होंने इन पन्नों को पढ़ने की इच्छा जताई। मेरे क्या ही काम के थे, उन्हें दे आया। फिर उन्होंने ही शायद इसे 'गरीबों की तस्वीर' नाम की किताब से छपवा दिया। मुझे कुछ नहीं पता।" दीन दयाल जी ने वो किताब जिस दुख की गागर के भर जाने पर लिखी थी, वो गागर मानो आकर किसी ने फोड़ दी हो और दुख रिसने लगा हो।
सुनकर वाणी जी की आँखें भी नम थीं। "आप अपने पोते की तस्वीर मुझे दीजिए, मैं यह खबर आपके इंटरव्यू की खबर के साथ हमारे चैनल पर दिखवाऊंगी। दीन दयाल जी के मन में आशा की एक और धुँधली किरण जागी। उन्होंने तस्वीर वाणी जी को दे दी।
इंटरव्यू समाप्त हो चुका था। वाणी जी को किताब के पीछे की कहानी मालूम पड़ चुकी थी। किताब के शीर्षक का अर्थ भी समझ आ चुका था। सभी बातें उन्होंने अपनी डायरी में नोट कर ली थी। अपने दफ्तर पहुंचकर उन्होंने अपने सीनियर को डायरी, उनके पोते की तस्वीर और छुट्टी की अर्जी सौंपी। दीन दयाल जी की कहानी सुनकर वाणी जी भाव विभोर थी, देश की व्यवस्था से हताश थी, कहीं न कहीं अपनी भी पुरानी सोच से हताश थी। कुछ दिन छुट्टी लेकर मन शांत करना चाहती थी।
अगले दिन शहर फिर हिला हुआ था। हालाँकि आज केवल एक ही न्यूज़ चैनल की हैडलाइन ने शहर हिला रखा था। "गरीबों की तस्वीर किताब के लेखक दीन दयाल जी से खास बात चीत। किया आम-जन पत्रिका का पर्दाफाश।" हर ओर अखबार की निंदा हो रही थी। लेकिन दीन दयाल जी के पोते की खबर हैडलाइन का हिस्सा नहीं थी। न ही उनके पोते की तस्वीर दिखाई जा रही थी। तस्वीर पड़ी होगी शायद इस चैनल के दफ्तर में, लोगों के जूतों के नीचे आती हुई।
©गुंजित जैन
अत्यंत ही संवेदनशील, मर्मस्पर्शी कहानी है 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻🤩🤩🤩🤩❣️❣️
जवाब देंहटाएंसादर आभार दीदी।
हटाएंअत्यंत हृदय स्पर्शी कहानी
जवाब देंहटाएंसादर आभार मैम।
हटाएंपूरी तरह झिंझोड़ कर रखती अत्यंत संवेदनशील कहानी 💐
जवाब देंहटाएंसादर आभार मैम।
हटाएंसादर आभार, नमन लेखनी।
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