ग़ज़ल ©धीरज दवे
नमन, माँ शारदे
नमन, लेखनी
2122 2122 212
आख़िरी उम्मीद तेरे नाम पर ,
और फिर अपना भरोसा राम पर।
इक तुम्हारी ओढ़णी के वास्ते ,
सब सितारे झुक गए हैं बाम पर।
नींद भी है याद भी है जोश भी ,
और कितना बोझ डालूं शाम पर।
एक इंसाँ के सिवा कुछ भी नहीं ,
बिक रहा है कौड़ियों के दाम पर।
इश्क का इल्ज़ाम गर है आपसे,
नाज़ क्यूँ ना हो हमें इल्ज़ाम पर।
दिख रही हैं आप खाली ग्लास में ,
लग गया है जाम अपने काम पर ।
©धीरज दवे
बेहद खूबसूरत एवं भावपूर्ण गज़ल 💐
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