गीत- ज़िन्दगी ©दीप्ति सिंह "दीया"

 नमन, माँ शारदे 

नमन, लेखनी 



छुपाया है मैंने...बहुत अपने गम को 

मगर जिंदगी तेरा नाम आ रहा है 

लबों की हँसी से नज़र की नमी को 

छुपाना हमारे भी काम आ रहा है 

 

मैं अपने सफ़र में...अकेला चला था 

यूँ ही रास्ते में .... मुझे गम मिला था 

मेरा गम है साया.... मेरी जिंदगी का

मेरे साथ ग़म वो तमाम आ रहा है  


बनाया है मैंने...गमों को ही साथी 

मेरी जिंदगी में... हैं बस दर्द बाकी

हमारा सफर तो...यूँ ही चल रहा है 

जिकर गम का तो सुबहो शाम आ रहा है


निराशा के बादल... यूँ हमको हैं घेरे 

मेरे रास्तों पर  ....... घने  हैं  अंधेरे

कभी तो कहीं पे... सहर भी खिलेगी 

यही हौसला मेरे काम आ रहा है  


©दीप्ति सिंह 'दीया'

टिप्पणियाँ

  1. वाह, बहुत ही बेहतरीन सृजन 👏👏👌👌

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  2. सुंदर रचना!♥️🙌🙌♥️

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