गीत- मधुमास ©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

 

नमन, माँ शारदे

नमन, लेखनी

सरसी छंद( विषम पद मात्रिक छंद)

विधान- 

मात्रा-२७, 

यति - १६,११

चरणान्त - SI 

विशेष – सरसी = चौपाई(१६) + दोहा का सम चरण(११)

सार छंद (विषम पद मात्रिक छंद)

विधान-

मात्रा-२८, 

यति - १६,१२

चरणान्त - SS

(मुखड़ा, समांत सरसी छंद एवं अंतरा सार छंद आधारित) 

गीत-मधुमास


तिल-तिल सूरज संग सुलगता, सुधियों क़ा संत्रास l

पूरी रात बरसता टप-टप,...... नयनों से मधुमास l


अंतर पोखर उफ़नाता है,.......तप्त पीर का पानी,

मन की सोन मछरियाँ व्याकुल,पीड़ा से अनजानी l

दग्ध हृदय की लपटें देती,पर्वत का आभास l


गंगा जमुना धारा बहती,...आँखों क़े कोरों से l

स्वप्न चिता की राख टटोलें,ऊँगली क़े पोरों से l

अस्थि कलश नातों क़े,हाथों में छलता विश्वास l


दूर गगन उड़ गए पखेरू, कल कल कलरव करते l

चंदन बिरवा ठूँठ प्राण चढ़,.....सौ-सौ बार उतरते l

सोन चिरैया छिपी कहीं, जाकर बादल क़े पास l


मुरझाई क्यारी डाली-डाली में पतझड़ आया,

विकल भृंग गुन-गुन क्रंदन में,करुण विलाप समाया l 

उजड़ी पुष्प वाटिका खोई मोहक सुमन सुवास l


विकल प्राण सुधियों के सागर में डूबें उतराऐं,

भूले भटके पंछी पिंजड़े,में आ-आ उड़ जाऐं l

 पिंजरा रिक्त कपाट खुले हैँ,बीहड़ है आवास l

©संजीव शुक्ला 'रिक्त'

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आञ्जनेय छंद - हनुमान वंदना ©रश्मि शुक्ल 'किरण'

वो दौर ©सूर्यम मिश्र

अक्सर भूल जाते हैं ©दीप्ति सिंह

लेखनी स्थापना दिवस के उपलक्ष्य मेँ काव्य पाठ एवम मिलन समारोह ©अंजलि